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आदमखोर बाघ और बाघखोर आदमी!

हम जितने भी सौम्य, शालीन और अहिंसक हों, क्या किसी मच्छर या तिलचट्टे को मारने से पहले यह सोचते हैं कि यह भी उस जीव के खिलाफ हिंसा है? अपने फर्नीचर या दरवाजे, खिड़कियों में लगी दीमक के घर उजाड़ने में हमें जरा भी वक्त नहीं लगता। यहां तक कि केरल में आवारा कुत्तों, महाराष्ट्र में जंगली सुअरों और गोवा में मोरों को मारने का आदेश भी पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से हाल ही में जारी किया गया है...

नवभारत टाइम्स 30 Oct 2016, 8:04 am
आदमखोर बाघ और बाघखोर आदमी!
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आदमखोर बाघ और बाघखोर आदमी!

चैतन्य नागर

हम जितने भी सौम्य, शालीन और अहिंसक हों, क्या किसी मच्छर या तिलचट्टे को मारने से पहले यह सोचते हैं कि यह भी उस जीव के खिलाफ हिंसा है? अपने फर्नीचर या दरवाजे, खिड़कियों में लगी दीमक के घर उजाड़ने में हमें जरा भी वक्त नहीं लगता। यहां तक कि केरल में आवारा कुत्तों, महाराष्ट्र में जंगली सुअरों और गोवा में मोरों को मारने का आदेश भी पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से हाल ही में जारी किया गया है। साफ है, ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि इन जीवों से हम ज्यादा ‘ताकतवर’ हैं, क्योंकि ये हमारे सामान को नुकसान पहुंचा रहे हैं, ‘हमारे इलाके’ में बिन बुलाए आकर हमारा नुकसान कर रहे हैं। यह कमजोर और ताकतवर के बीच होने वाली मुठभेड़ है जिसमें स्वाभाविक रूप से वही जीतता है जो ताकतवर होता है, यानी कि हम इंसान।
अभी पिछले हफ्ते उत्तराखंड में एक बाघिन को मारा गया क्योंकि वह ‘आदमखोर’ हो चुकी थी। गौरतलब है कि बाघ को रहने के लिए करीब 30 से 60 वर्गमील का इलाका चाहिए। साइबेरिया के बाघ को तो 100 वर्ग मील के क्षेत्र में रहते हुए पाया गया है। शेर, तेंदुए और लकड़बग्घे की तरह बाघ इंसानी बस्तियों में घुस कर सोते हुए लोगों और निरीह मवेशियों को नहीं मारता। बाघ उन लोगों पर हमला करता है जो उसके इलाके में बिन बुलाए घुस जाते हैं। इंसान पर बाघ के हमले आमतौर पर तभी होते हैं, जब वह घायल होता है या जब बाघिन गर्भ से होती है और शिकार पकड़ने के लिए लंबी दौड़ नहीं लगा पाती। हम जैसे दीमक और मच्छरों को असुरक्षित समझकर मारते हैं, वैसे ही बाघ भी हमें ‘अपने घर’ में देख कर असुरक्षित महसूस करता है और असुरक्षा के साथ भय और आक्रामकता का गहरा संबंध है।
बाघ अपने भौतिक अस्तित्व को बचाने के लिए शिकार करता है। किसी विचारधारा या धर्म के असर में आकर नहीं। क्या उत्तराखंड में मारी गई बाघिन को नशीली दवाओं का इंजेक्शन देकर बेहोश नहीं किया जा सकता था? उसे मारने के लिए किस तरह एक करोड़ रुपये खर्च हुए? क्यों उसे बेहोश करके किसी चिड़ियाघर में नहीं ले जाया जा सका? आखिरकार चिड़ियाघरों का यही तो एक सही उपयोग है, जहां कुछ खतरनाक समझे जाने वाले वन्य जीवों को रखा जा सके। ऐसा पहले भी किया जा चुका है। बस अपने नए माहौल में ‘आदमखोर’ पशु को अडजस्ट करने में थोड़ा वक्त लगता है, पर आखिरकार वह खुद को स्थापित कर लेता है।
फरवरी 2015 में केरल और तमिलनाडु की स्पेशल टास्क फोर्स ने एक ‘आदमखोर’ बाघ को मारा और इस बात पर कई सवाल उठे क्योंकि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के नियमों का इसमें उल्लंघन हुआ था। इससे पहले दिसंबर 2012 में वायनाड के कॉफी बगान में एक बाघ को मारा गया तो मेनका गांधी ने कहा था कि यह बाघ ‘आदमखोर’ नहीं था और अब वन्य जीवन विभाग को ही बंद कर देना चाहिए। अमेरिका जैसे देश में फांसी की सजा पाए कई कैदियों के बारे में सजा दिए जाने के बरसों बाद यह पता चला है कि वे असल में दोषी थे ही नहीं। ऐसे में कैसे मान लिया जाय कि इस देश के सरकारी अधिकारी एक बाघ को ‘आदमखोर’ घोषित करने में संवेदनशीलता बरतेंगे। जीवन के 40 बरस एक दफ्तर में फाइलें पलटने वाले यांत्रिक सरकारी बाबू एक बाघ की गरिमा, उसकी शान और उसकी विराट ऊर्जा का सम्मान करेंगे, इसकी उम्मीद की ही नहीं जा सकती! उनका तो समूचा जीवन ही ‘बाघपन’ की उलटी दिशा में बह रहा है।
अगस्त 2013 में हिमाचल प्रदेश के थुनाग में दो तेंदुओं और तेंदुए के एक बच्चे को आदमखोर होने के संदेह में मारा गया। बाद में साबित हुआ कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के नियमों का इसमें साफ उल्लंघन किया गया था। इन नियमों में साफ कहा गया है कि किसी बाघ या तेंदुए को मार डालना ‘अंतिम उपाय’ माना जाना चाहिए। यह काम किसी निजी शिकारी को नहीं सौंपा जाना चाहिए क्योंकि उसके अपने स्वार्थ हो सकते हैं। पशु को मारने के लिए कोई पुरस्कार घोषित नहीं किया जाना चाहिए। सबसे पहले इस बात की पूरी कोशिश की जानी चाहिए कि बाघ को बेहोश किया जाए और ऐसी जगह ले जाया जाए, जहां उसे ठीक से रखा जा सके। नियमों में यह भी कहा गया है कि आदमखोर पशु की पहचान कैमरों, पंजों के निशान और डीएनए परीक्षण से की जानी चाहिए। सारी कोशिशें नाकाम होने के बाद ही उसे मारने के आदेश दिए जाने चाहिए। जिस देश में इंसान की जान कौड़ियों में बिकती हो, क्या आप मानेंगे कि किसी बाघ को मारने के आदेश में इतनी सतर्कता बरती जाती होगी। आदमखोर बाघ या तेंदुए को मारने के मामले में अक्सर स्थानीय लोगों का दबाव भी बहुत काम करता है। उत्तराखंड की बाघिन को मारने के समूचे मामले की भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
गौरतलब है कि बाघों की संख्या घटती जा रही है और अब इस देश में करीब 1500 बाघ ही बचे हैं। ऐसे में एक बाघ की मौत या उसे मारे जाने के आदेश को एक असाधारण मुद्दा समझ कर उस पर बातचीत होनी चाहिए। इसमें पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। अखबारों में उत्तराखंड की बाघिन के मारे जाने के जो समाचार मिले उनमें तो सिर्फ बाघ के शव को लादे, हाहाकार करते, नाचते-कूदते लोग ही दिखाए गए। इन खबरों में न कोई संवेदना थी, न कोई गहरी समझ।
जंगल कटे जा रहे हैं। बाघ जैसे जीवों के रहने की जगह कम होती जा रही है। उन्हें लोभ के लिए मारा जा रहा है। बाघ के अवैध शिकार के बाद उसके टुकड़े-टुकड़े बेचे जाते हैं। भू-माफिया पहाड़ों पर फैले समूचे जंगलों को ही जला कर राख कर देते हैं। बाघ बेघर हो जाते हैं। लोग उनके इलाकों में जाते हैं और पहले से ही असुरक्षित बाघ उन पर हमला कर बैठते हैं। उन्हें कोई शौक नहीं इंसानों को मारने का। उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि जिसे वे मार रहे हैं, वह इंसान है और वह धरती का सबसे खतरनाक पशु भी है। आदमखोर शब्द तो हमारा ईजाद किया हुआ है। बाघ को आदमखोर हम ही तो बना रहे हैं और फिर उसे बेदर्दी से मार कर जश्न मना रहे हैं। बाघ ताकतवर है, पर ऊपर से आने वाले कागजी आदेश की ताकत के सामने बेबस भी तो है।
वैसे, जंगल में अकेला टहलता बाघ या रात के अंधेरे में जलती हुए आंखें लिए शून्य में घूरता हुआ बाघ आखिरकार एक पहेली ही है - सुंदर, अद्भुत, असाधारण। बाघ के शिकार हुए इंसानों के प्रति गहरी सहानुभूति होनी चाहिए, पर किसी भी कीमत पर बाघ को भी बचाना चाहिए।

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