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सवाल जवाब: जानिए मंत्रों का फल क्यों नहीं मिलता और क्यों करना चाहिए 'जय' शब्द का प्रयोग

शनि यदि कुंडली अष्टम भाव में हो, तो उत्तराधिकार में संपत्ति प्रदान करता है। शनि अष्टम में बैठकर अशुभत्व का नाश करता है। ऐसे व्यक्ति दीर्घायु होते हैं। यह शनि आयुष्य कारक होता है। यह शनि बवासीर व वात से पीड़ित करता है। शुभ होने पर इस भाव का शनि विद्वता, वाक्‌पटुता और वीरता देता हैं।

Edited byपराग शर्मा | नवभारतटाइम्स.कॉम 27 Jun 2022, 12:42 pm
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जानिए मंत्रों के जपने का फल क्यों नहीं मिलता?

‘जय’ शब्द का बारंबार प्रयोग आपके हाथों नए सकारात्मक कर्मों की रचना करके आपको विजय की ओर ले जाता है, ऐसा मंत्र विज्ञान के सूत्र कहते हैं।

बात पते की
शनि यदि कुंडली अष्टम भाव में हो, तो उत्तराधिकार में संपत्ति प्रदान करता है। शनि अष्टम में बैठकर अशुभत्व का नाश करता है। ऐसे व्यक्ति दीर्घायु होते हैं। यह शनि आयुष्य कारक होता है। यह शनि बवासीर व वात से पीड़ित करता है। शुभ होने पर इस भाव का शनि विद्वता, वाक्‌पटुता और वीरता देता हैं। ऐसे लोग निर्भय, चतुर और उदार होते हैं। गूढ़विद्या की ओर ये आकर्षित होते हैं। इनके विचार संकुचित होते हैं। इनमें संतोष का अभाव होता है। पुण्य कर्मों के अभाव में यह शनि धनहीनता का कारक बनता है। इन्हें आरंभ में अक्सर अपने मित्रों की उपेक्षा झेलनी पड़ती है। यह शनि क्रोध, उत्साहहीनता के साथ चातुर्य में बढ़ोतरी करता है। यह स्थिति आलस्य की वजह भी बनती है। दूसरों की गलतियों पर ये सूक्ष्म दृष्टि रखते हैं। अपने जन्म स्थान से ये लोग दूर रहते हैं। अशुभ होने पर यह शनि झूठे आरोप व मुकदमे की भी वजह बनता है। इन्हें अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है।

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प्रश्न: मंत्रों का फल क्यों नहीं मिलता?-राजीव नेगी
उत्तर: सद्‌गुरुश्री कहते हैं कि मंत्रों ऋषि एवं छंद का ज्ञान न होने पर मंत्र का फल नहीं मिलता और विनियोग न करने पर मंत्र दुर्बल हो जाते हैं, ऐसा गौतमीय तंत्र कहता है। मंत्रों को फल का दिशा-निर्देश देने की प्रक्रिया को ही ‘विनियोग’ कहते है। विनियोग में ऋषि, छंद, देवता, बीज एवं शक्ति के साथ एक और तत्व होता है, जिसे बीजक कहते हैं। बीजक ‘मंत्र शक्ति’ को संतुलित रखने वाला तत्व है। इसका सर्वांग न्यास मंत्र सिद्धि की अनिवार्य शर्त है।

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प्रश्न: लतामणि क्या है?-विशाल सिंह
उत्तर: सद्‌गुरुश्री कहते हैं कि लतामणि एक रत्न है, जिसे अंग्रेजी में कोरल और हिंदी में मूंगा कहते हैं। पुराने समय में इसे प्रवाल कहा जाता था। यह समुद्र की तलहटी में पाई जाने वाली अद्‌भुत वनस्पति है। यह मंगल के रत्न के रूप में इस्तेमाल की जाती है। मंगल को साहस, शक्ति, बल व ऊर्जा का स्वामी कहा जाता है। यह रत्न राजनीति, नेतृत्व, प्रशासन, सेना, पुलिस, ज्योतिष, आध्यात्म, पथॉलॉजी, हड्डी के डॉक्टर के साथ तेल, गैस, प्रॉपर्टी, ईंट-भट्टे के काम इत्यादि कारोबार का कारक है।

अगर, आप भी सद्गुरु स्वामी आनंदजी से अपने सवालों के जवाब जानना चाहते हैं या किसी समस्या का समाधान चाहते हैं तो अपनी जन्मतिथ‍ि, जन्म समय और जन्म स्थान के साथ अपना सवाल saddgurushri@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। सद्‌गुरुश्री (डा. स्वामी आनंदजी)
लेखक के बारे में
पराग शर्मा
"पराग शर्मा धार्मिक विषयों और रेमेडियल ज्योतिष पर 7 साल से भी अधिक समय से काम कर रहे हैं। वेद पुराण, वैदिक ज्योतिष, मेदनी ज्योतिष, अंक ज्योतिष, टैरो और आर्थिक करियर राशिफल पर इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है और अपने ज्ञान से यह प्रतिकूल ग्रह दशाओं और परेशानी में चल रहे लोगों को उचित सलाह देकर उन्हें संकट से निकलने में मदद करते हैं। खाली समय में राजनीतिक और धार्मिक विषयों पर अध्ययन और चिंतन करना पराग को बहुत पसंद है। शोर शराबे की बजाय एकांत में ध्यान करना भी पसंद है, इसलिए जब कभी भी पराग को खाली एकांत समय मिलता है, आत्मचिंतन करते हैं और कहानी एवं कविताएं लिखते हैं।"... और पढ़ें

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