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सिर में तेल लगाने से मकरूह हो जाएगा रोजा

रोजा, नमाज, तरावीह, जकात समेत किसी भी मसले पर आमफहम सवालों का जवाब हासिल किया जा सकता है...

नवभारत टाइम्स 19 Jun 2016, 2:35 pm
लखनऊ रमजान से जुड़े दीनी मसलों की जानकारी देने के लिए रमजान हेल्पलाइन चलाई जा रही है। इस पर रोजा, नमाज, तरावीह, जकात समेत किसी भी मसले का जवाब हासिल किया जा सकता है। हेल्पलाइन पर शनिवार को आए कुछ सवाल।
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सिर में तेल लगाने से मकरूह हो जाएगा रोजा


शिया-
सवाल: अगर कोई व्यक्ति रोजा रखकर नाक से पानी अंदर खींच ले तो क्या रोजा टूट जाएगा?
जवाब:
क्योंकि नाक से पानी हल्क में जाता है, इसलिए रोजा टूट जाएगा।

सवाल: क्या खुम्स का पैसा फकीर को दिया जा सकता है?
जवाब:
खुम्स का पैसा फकीर को नहीं दिया जा सकता है। इसके दो हिस्से होते हैं। एक हिस्सा गरीब सैयद को और एक हिस्सा हाकिमे शरीअत को दिया जाएगा।

सवाल: क्या नमाजे आयात में एक सूरह को पांच बार पढ़ा जा सकता है?
जवाब:
नमाजे आयात में एक सूरह को पांच बार पढ़ा जा सकता है और एक सूरह को पांच हिस्से करके भी पढ़ सकते हैं।

सवाल: अगर कोई व्यक्ति रोजा रखकर सिर पर तेल लगाए, तो क्या रोजा टूट जाएगा?
जवाब:
रोजा रखकर सिर पर तेल लगाना मकरूह है, लेकिन इससे रोजा नहीं टूटेगा।

सवाल: जिन चीजों पर जकात वाजिब है, क्या उनमें हर एक का निसाब एक होगा?
जवाब:
नहीं! जिन चीजों पर जकात वाजिब है, उन सब का निसाब (हिस्सा) एक नहीं है, बल्कि हर एक चीज का निसाब अलग-अलग है।

सुन्नी-
सवाल: मैं एक मेडिकल स्टोर चलाता हूं। दुकान में बहुत सारी दवाइयां पड़ी हैं, तो क्या उस पर भी जकात वाजिब है या सिर्फ उसकी आमदनी पर जकात होगी?
जवाब:
दवाइयों की कीमत पर भी जकात वाजिब है।

सवाल: अगर किसी ने मन्नत मान रखी है तो क्या उसे पूरा करना जरूरी है?
जवाब:
जब कोई मन्नत माने तो उसे पूरा करना जरूरी है, पूरी न की गई तो वह गुनहगार होगा।

सवाल: मैंने जकात की रकम से दीनी किताबें खरीदकर गरीब लड़कियों को दे दीं, तो क्या जकात अदा हो जाएगी?
जवाब:
जकात अदा हो जाएगी।

सवाल: अगर किसी ने आधी रात के बाद सहरी की नीयत से कुछ खा लिया, तो क्या सहरी की सुन्नत अदा हो जाएगी?
जवाब:
आखिरी रात के बाद कुछ भी खा लें तो सुन्नत अदा हो जाएगी, लेकिन सहरी में देर करना अच्छा है।

सवाल: क्या सख्त गर्मी की वजह से इशा की नमाज और तरावीह मस्जिद की छत पर पढ़ी जा सकती है?
जवाब:
गर्मी की वजह से मस्जिद की छत पर नमाज पढ़ना मकरूह है। अगर मस्जिद में जगह न हो तो छत पर पढ़ सकते हैं।

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