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अपने लिए जगह

यदि व्यक्ति चाहे तो कष्ट और संघर्ष से लड़कर न सिर्फ अपने लिए एक खास जगह बना सकता है बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेरणास्रोत भी बन सकता है।

नवभारत टाइम्स 14 Mar 2016, 10:40 am
रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की का शुरुआती जीवन बहुत दुखद रहा। जब वह मात्र 13 वर्ष के थे तभी उनकी मां की मृत्यु हो गई। 18 वर्ष के हुए तो नौकरों ने उनके पिता की हत्या कर दी। इसके बाद दोस्तोयेव्स्की को मिरगी के दौरे पड़ने लगे। एक दिन एक दौरे में उनकी दायीं आंख फूट गई। उनके सामने न परिवार था और न ही कोई प्रेरणा। कुछ समय बाद उन्हें मिलिट्री इंजीनियर की नौकरी मिल गई। लेकिन उन्हें बार-बार लगता कि उनकी मंजिल यह नौकरी नहीं बल्कि कुछ और है।
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उन्हें लिखने का शौक था। नौकरी के कारण उन्हें लेखन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। उन्होंने एक दिन नौकरी छोड़ दी और पूरे समय लिखने का मन बना लिया। उनका पहला उपन्यास ‘पुअर फोक’ बहुत लोकप्रिय हुआ। लेकिन कुछ समय बाद ही उन पर क्रांतिकारी षडयंत्र रचने का आरोप लगाकर उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। मृत्युदंड देने से कुछ मिनट पहले उनकी सजा को बदल दिया गया और उन्हें साइबेरिया जाने की सजा दी गई। 10 साल बाद लेनिनग्राद लौटकर दोस्तोयेव्स्की ने फिर से लिखना शुरू कर दिया।

खराब स्वास्थ्य, गरीबी और कष्टों से भरे जीवन के बाद भी उन्होंने अमर कृतियां रचीं। अपने जेल-जीवन में उन्होंने कैदियों को बहुत करीब से देखा था। इसका वर्णन उनकी महान कृति ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में मिलता है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास के जनक दोस्तोयेव्स्की पाठकों के हृदय को छूने में सफल इसलिए रहे क्योंकि उन्होंने जिन कष्टों को भोगा था, उन्हीं को लेखन में उतारा। उन्होंने अपने लेखन से पूरे विश्व के समक्ष यह साबित कर दिया कि यदि व्यक्ति चाहे तो कष्ट और संघर्ष से लड़कर न सिर्फ अपने लिए एक खास जगह बना सकता है बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेरणास्रोत भी बन सकता है।

संकलन: रेनू सैनी

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