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अगर हमारे भीतर है यह बात तो जीवन में शांति के मायने अपने आप समझ आ जाएंगे

सोचने की बात है कि जब हम कहते हैं मनुष्य ने जीवन में शांति प्राप्त कर ली है, तो इस शांति के मायने क्या हैं? जब हम कहते हैं कि हम सभी शांतिपूर्ण वातावरण चाहते हैं, तो इसका क्या अर्थ है? क्या यह किसी प्रकार का शारीरिक विश्राम है? नहीं। यदि ऐसा होता, तो वह विश्राम भौतिक-मानसिक होता। लेकिन सौंदर्य विज्ञान में आनंद की सूक्ष्म अनुभूति मनो-भौतिक है। अब प्रश्न यह है कि क्या यह आनंद केवल मनो-भौतिक है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। यह मानसिक-शारीरिक और मानसिक-आध्यात्मिक दोनों है।

Edited byगीतिका दुबे | नवभारत टाइम्स 14 Sep 2022, 11:31 am
श्री श्री आनंदमूर्ति
नवभारतटाइम्स.कॉम happiness


सौंदर्यशास्त्र का विज्ञान पूरे ब्रह्मांड में सूक्ष्म जगत की एक विशेष अभिव्यक्ति है। असल में सभी इकाई मन अपने विकास के लिए पूरी तरह से अनुकूल वातावरण खोज रहे हैं। यह विकास मानसिक संतुलन की स्थिति की ओर ले जाता है, जो सभी कार्यों और प्रतिक्रियाओं के परिणाम के रूप में प्राप्त होता है। इसलिए मानसिक संतुलन की इस स्थिति को प्राप्त करने की कोशिश में मनुष्य ने सौंदर्यशास्त्र के विज्ञान का आविष्कार किया।

हमारे इस ब्रह्मांड में सब कुछ चल रहा है और यह पूरा ब्रह्मांड भी ईश्वरीय केंद्र के चारों ओर घूम रहा है। यह गति अपूर्णता से पूर्णता की ओर है और गतिशीलता का यह तत्व सौंदर्यशास्त्र का सार है। इस गतिशीलता की प्रकृति का विश्लेषण करते हुए, कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि सौंदर्यशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान है, क्योंकि यह निश्चित और स्व-निर्मित नियमों के अनुसार चलता है। लेकिन सौंदर्य की अनुभूति कोई विज्ञान नहीं है। यह एक उच्च कोटि की कला है।

सोचने की बात है कि जब हम कहते हैं मनुष्य ने जीवन में शांति प्राप्त कर ली है, तो इस शांति के मायने क्या हैं? जब हम कहते हैं कि हम सभी शांतिपूर्ण वातावरण चाहते हैं, तो इसका क्या अर्थ है? क्या यह किसी प्रकार का शारीरिक विश्राम है? नहीं। यदि ऐसा होता, तो वह विश्राम भौतिक-मानसिक होता। लेकिन सौंदर्य विज्ञान में आनंद की सूक्ष्म अनुभूति मनो-भौतिक है। अब प्रश्न यह है कि क्या यह आनंद केवल मनो-भौतिक है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। यह मानसिक-शारीरिक और मानसिक-आध्यात्मिक दोनों है।

जब मन अपने कर्म के फल की अपेक्षा किए बिना सूक्ष्म आनंदानुभूति की तलाश करता है, तो यह निश्चित रूप से मनो-भौतिक है, लेकिन जब आनंद का यह अनुभव एक लक्ष्य की ओर अच्छी तरह से परिभाषित तरीके से बढ़ता है तो यह निश्चित रूप से मनो-आध्यात्मिक है। चाहे वह मनो-शारीरिक हो या मनो-आध्यात्मिक, टकराव अपरिहार्य है। यह टकराव स्थिर, परिवर्तनशील और संवेदनशील सिद्धांतों के बीच होता है। इस टकराव के कारण, जब आंदोलन संवेदनशील बल की ओर होता है, यानी जब परिवर्तनीय बल स्थिर बल पर हावी हो जाता है और संवेदनशील बल परिवर्तनीय बल पर हावी हो जाता है, उस स्थिति में चैत्य आंदोलन को मनो-आध्यात्मिक कहा जाता है। इस प्रकार का आंदोलन सच्ची कला और विज्ञान को जन्म देता है। ध्यान रहे, वह ज्ञान जो मानव समाज के लिए समस्याएं उत्पन्न करता है, वास्तविक ज्ञान नहीं, केवल मन की तुच्छ प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति है। इसलिए मैंने कहा कि टकराव चलता रहता है। यह न केवल मानव मन के भीतर होता है, बल्कि पूरे ब्रह्मांड की सभी इकाई और सामूहिक दिमागों के भीतर भी होता है। सत्यम, शिवम और सुंदरम (सत्य, चेतना और सौंदर्य)- तीन बाध्यकारी सिद्धांतों के बीच यह टकराव अनंत काल तक जारी रहेगा, इसे कभी रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह अपने स्वभाव से ही अनंत है। रोका भले नहीं जा सके, इसे एक विशेष दिशा में निर्देशित जरूर किया जा सकता है।

जाहिर है इन तीन बाध्यकारी सिद्धांतों के दायरे में समाज को उचित योजना और उचित संघर्ष के माध्यम से सच्ची प्रगति की दिशा तय करनी होगी। इसके बिना मानवता का भविष्य अंधकारमय है। लेकिन आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि निराशावाद या निराशा का परिसर इस ब्रह्मांड का सार नहीं है। आशावाद सार्वभौमिक मानवता का लक्ष्य है।

प्रस्तुति : दिव्यचेतनानन्द अवधूत
लेखक के बारे में
गीतिका दुबे
गीतिका दुबे का बतौर पत्रकार करियर 11 साल का है। वह ज्योतिष विद्या में ग्रह गोचर, टैरो, अंक ज्योतिष पर 6 साल से काम कर रह रही हैं। धार्मिक विषयों पर भी इनका ज्ञान समृद्ध है। इन्होंने गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, शिव पुराण, मत्स्य पुराण, भविष्य पुराण सहित वास्तु विज्ञान का गहरा अध्ययन किया है। और अब इससे जनमानस को लाभ दिला रही हैं। खाली वक्त में इन्‍हें यात्रा करना और संगीत सुनना पसंद है। प्रेरक कथाएं पढ़ना भी इनको पसंद है। भगवान शिव और भगवान राम की लीला कथाओं का अध्ययन और उनका विश्लेषण करना इनका प्रमुख और प्रिय विषय है।... और पढ़ें

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