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Union Budget 2022: बजट से कारोबारियों को कैसी उम्मीदें? बोले- निकले राहत पैकेज, ना बढ़े कोई टैक्स

केंद्रीय बजट 2022 से कारोबारी वर्ग को बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना ने काम-धंधे चौपट कर दिए हैं। कारोबार जैसे-तैसे पटरी पर आना शुरू होता है, फिर कोरोना की नई लहर आ धमकती है। हम तो बजट में यही चाहेंगे कि हो सके तो सरकार कारोबारियों के लिए कुछ राहत पैकेज की घोषणा करे।

Reported byमनीष अग्रवाल | नवभारतटाइम्स.कॉम 1 Feb 2022, 6:26 am
नई दिल्ली: इस बार के बजट से कारोबारियों को बहुत उम्मीदें हैं, कोरोना ने काम-धंधे चौपट कर दिए हैं। कारोबार जैसे-तैसे पटरी पर आना शुरू होता है, फिर कोरोना की नई लहर आ धमकती है। हम तो बजट में यही चाहेंगे कि हो सके तो सरकार कारोबारियों के लिए कुछ राहत पैकेज की घोषणा करे। अगर इस तरह की घोषणा नहीं की जाती है तो कम से कम कोई नया टैक्स नहीं लगाया जाए। यह कहना है कारोबारी रमेश रूस्तगी परिवार का, जिन्होंने आगामी आम बजट को लेकर एनबीटी से बात की।
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बजट से उद्यमियों को बहुत उम्मीदें


संयुक्त परिवार में कौन-कौन हैं
विवेक विहार में रहने वाले रमेश रूस्तगी परिवार में 10 सदस्य हैं। इनमें परिवार के मुखिया रमेश रूस्तगी (70) और इनकी पत्नी कमलेश रूस्तगी (69) हैं। दो बेटे प्रवीण रूस्तगी (50) और मनीष रूस्तगी (47) और इनका परिवार है। बड़े बेटे प्रवीण रूस्तगी के परिवार में इनकी पत्नी प्रीति रूस्तगी (46), बेटा कार्तिक (21) और बेटी हिमांशी (17) हैं। जबकि छोटे बेटे मनीष रूस्तगी के परिवार में इनकी पत्नी वंदना रूस्तगी (45), बेटी गौरवी (21) और बेटा सक्षम (18) हैं। 10 सदस्यों के परिवार में खाना एक ही रसोई में बनता है।

कारोबार और कमाई
रमेश रूस्तगी परिवार का चांदनी चौक में लहंगे-साड़ियों का बिजनेस है। पूरा परिवार इसी कारोबार में लगा है। दोनों बेटों की पत्नियां भी बिजनेस में मदद करती हैं। लहंगे के इस बिजनेस से रूस्तगी परिवार को सालभर में करीब 30 लाख रुपये की आमदनी हो जाती थी। लेकिन कोरोना काल में इसमें जबरदस्त गिरावट आई।

बचत और खर्चे
बचत के नाम पर तो पिछले दो सालों में कुछ नहीं बचा, बल्कि जमा पूंजी भी खत्म होती जा रही है। दो सालों से कोई नई एफडी या शेयर में पैसा इन्वेस्ट नहीं किया। इसे अगर आप बचत कहना चाहें तो जरूर कह सकते हैं कि अब हम ना तो कहीं घूमने जाते हैं और ना ही बाहर खाना खाने। हां, खर्चों की बात की जाए तो सब कुछ मिलाकर साल में कम से कम 10 लाख रुपये का खर्चा हो जाता है। इसमें अधिकतर खर्चा रसोई का है। गाड़ी और मकान की किस्त तो कोई नहीं है लेकिन रसोई में महीने में आराम से 40 से 50 हजार रुपये लग जाते हैं। बड़ा परिवार होने की वजह से रसोई गैस सिलेंडर भी अधिक आते हैं। पेट्रोल की कीमत भी बढ़ गई। बच्चों की पढ़ाई में भी पैसा खर्च हो रहा है।

बजट से उम्मीदें
सीधे तौर पर कहा जाए तो सरकार को बजट में कारोबारियों को कुछ ना कुछ राहत जरूर देनी चाहिए। कभी लॉकडाउन तो कभी ऑड-ईवन। इस सब ने कारोबार की कमर तोड़ कर रख दी है। सरकार ऐसा बजट लाए जिससे हर वर्ग को कुछ ना कुछ राहत मिले। टैक्स में रियायत दी जानी चाहिए। किसी भी रॉ मैटेरियल पर कोई नया टैक्स नहीं लगना चाहिए, बल्कि हो सके तो इस पर कुछ राहत मिल जाए तो बेहतर है। राहत केवल बिजनेसमैन को नहीं बल्कि वेतनभोगी वर्ग को भी मिलनी चाहिए, तभी तो बिजनेस में जान आएगी। रसोई गैस सिलेंडर और पेट्रोल की कीमतें कम करनी चाहिए। बस, सरकार ऐसा बजट लाए कि डूबे हुए कारोबार में फिर से नई जान आ जाए।
लेखक के बारे में
मनीष अग्रवाल
मनीष अग्रवाल, नवभारत टाइम्स में असिस्टेंट एडिटर हैं। वह केंद्रीय गृह मंत्रालय, रेलवे और एविएशन मिनिस्ट्री के अलावा केंद्रीय सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, पैरामिलिट्री फोर्स, सीबीआई, एनआईए, ईडी और भारतीय चुनाव आयोग भी कवर करते हैं। इससे पहले वह क्राइम, कस्टम और तिहाड़ जेल कवर करते थे। वह एनबीटी में 20 साल से भी अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।... और पढ़ें

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