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डेट म्यूचुअल फंड्स का क्या है नफा-नुकसान, जानें सबकुछ

बॉन्ड, गवर्नमेंट सिक्यॉरिटी या नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर जैसे किसी एक इंस्ट्रूमेंट के मुकाबले डेट म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो बेहतर होता है।

इकनॉमिक टाइम्स 25 Dec 2019, 1:47 pm
जो लोग छोटी बचत योजनाओं और फिक्स्ड डिपॉजिट्स की ब्याज दरों से खुश नहीं हैं, वे डेट फंड्स में निवेश कर सकते हैं। आइए जाने ंकि डेट म्यूचुअल फँड की क्या खासियतें हैं और इनमें निवेश से क्या-क्या फायदे हो सकते हैं।
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बॉन्ड से बेहतर है डेट म्यूचुअल फंड?
बॉन्ड, गवर्नमेंट सिक्यॉरिटी या नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर जैसे किसी एक इंस्ट्रूमेंट के मुकाबले डेट म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो बेहतर होता है। किसी भी डेट फंड के पोर्टफोलियो में 8-10 अलग-अलग बॉन्ड्स होते हैं, जिनसे किसी एक पक्ष से जुड़े रिस्क का असर घटता है। डेट म्यूचुअल फंड्स बैंकों के कन्वर्टिबल डिबेंचर, कमर्शल पेपर, गवर्नमेंट सिक्यॉरिटीज या कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में निवेश करते हैं।

पेपरवर्क की कितनी जरूरत?
म्यूचुअल फंड स्कीम से जुड़ा पेपरवर्क उलझाऊ नहीं होता है। आप म्यूचुअल फंड स्टेटमेंट की सॉफ्ट कॉपी हासिल कर सकते हैं। अगर आप इसे खो भी दें तो कोई फर्क नहीं पड़ता। आप रिडेम्प्शन स्लिप पर दस्तखत करें और फंड हाउस उसे में जमाकर अपना पैसा वापस ले लें। इसके मुकाबले बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट रिसीट अगर खो जाए तो आपको काफी पेपरवर्क करना पड़ सकता है।

क्या हैं बेनिफिट्स?
डेट म्यूचुअल फंड्स में टीडीएस नहीं लगता है। अगर इनमें निवेश तीन साल तक बनाए रखा जाए तो इंडेक्सेशन बेनिफिट मिल सकता है और आपकी टैक्स देनदारी घट सकती है। अगर पैसा निकालना हो तो डेट म्यूचुअल फंड को 1 रुपये की यूनिट्स में तोड़ा जा सकता है और निवेशक जरूरी रकम निकाल सकता है। स्मॉल सेविंग प्रॉडक्ट या एफडी के मामले में आपको पूरा डिपॉजिट तोड़ना पड़ता है।

ब्याज दरों का कितना जोखिम?
डेट फंड में निवेश से जुड़े जोखिम की बात करें तो जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बॉन्ड प्राइसेज गिरती हैं। दरें घटें तो बॉन्ड प्राइसेज चढ़ती हैं। सभी डेट फंड्स के साथ ब्याज दर वाला जोखिम होता है, लेकिन असर अलग-अलग हो सकता है। किसी भी डेट सिक्यॉरिटी पर डिफॉल्ट का खतरा तब पैदा होता है, जब उसे जारी कर पैसे जुटाने वाली संस्था जरूरी भुगतान न कर पाए। फंड के पास जिन कंपनियों के बॉन्ड हों, उनमें से कोई भी अगर रीपेमेंट के शेड्यूल के मुताबिक पेमेंट न कर पाए तो फंड की एनवीए को झटका लग सकता है। फंड मैनेजर को यह पक्का करना होता है कि स्कीम इस हद तक लिक्विड रहे कि फंड वैल्यू या प्राइस पर असर डाले बगैर स्कीम में निवेश या निकासी कर सके।

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