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Ingvar: डिस्लेक्सिया से पीड़ित इस बालक ने कैसे खड़ी कर दी दुनिया की सबसे बड़ी फर्नीचर कंपनी?

Ikea Ingvar: स्वीडन के एक छोटे से गांव में गरीब किसान परिवार में 23 मार्च 1926 को जन्मे एक बच्चे का नाम इंग्वार रखा गया। गरीबी और बदहाली के दौर से गुजर रहे स्वीडन में पैदा हुए इंग्वार डिस्लेक्सिया नाम की बीमारी से पीड़ित थे।

Curated byAmit Tyagi | नवभारतटाइम्स.कॉम 27 Sep 2021, 1:21 pm
20 साल की उम्र तक इंग्वार अपने छोटे से बिज़नेस को आगे बढ़ाना चाहते थे जिसके लिए उन्हें अधिक समय देना था, इसी के चलते इंग्वार ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
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Ingvar: डिस्लेक्सिया से पीड़ित इस बालक ने कैसे खड़ी कर दी दुनिया की सबसे बड़ी फर्नीचर कंपनी?


इंग्वार बने रोल मॉडल

आइकिया के संस्थापक इंग्वार

डिस्लेक्सिया बीमारी के शिकार इंग्वार को बचपन में ताने सुनने को मिलते थे कि तू जीवन मे कुछ नहीं कर पाएगा, लेकिन आज उस इंसान की जिद के चलते उसके कई देशों मे हज़ारों स्टोर, शोरूम हैं। इंग्वार 91 साल की उम्र मे स्वर्ग सिधार गए, लेकिन आज उनके बेटे-पोते इनके फर्नीचर बिज़नेस को आगे बढा रहे हैं, इंग्वार के फर्नीचर्स IKEA के नाम से जाने जाते हैं जो दुनिया के कई देशों में काफी लोकप्रिय हैं।

बचपन गरीबी में बीता

स्वीडन के एक छोटे से गांव में गरीब किसान परिवार में 23 मार्च 1926 को जन्मे एक बच्चे का नाम इंग्वार रखा गया। गरीबी और बदहाली के दौर से गुजर रहे स्वीडन में पैदा हुए इंग्वार डिस्लेक्सिया नाम की बीमारी से पीड़ित थे। इंग्वार के पिता किसान थे, अपनी जमीन पर खेती करके परिवार चलाते थे। इंग्वार जब बड़े हुए तो वह भी अपने पिता के साथ खेत में काम करने के साथ जंगल से लकड़ी काट कर लाने लगे। इसी वजह से उन्हें लकड़ियों की परख हुई।

1953 में पहला शोरूम

इसके बाद भी इंग्वार ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक पोलिश सप्लायर से माल लेना शुरू कर दिया। यहां उन्हें पहले से भी कम दाम पर मिलता था क्योंकि वहां कच्चा माल और लेबर दोनों ही बहुत सस्ती मिलती थी। इसके बाद इंग्वार ने दूसरे देशों से कई ऐसे सप्लायर ढूंढ़ लिए जहां से बहुत सस्ते रेट में माल बन सकता था। इंग्वार ने अपने फर्नीचर्स ब्रांड का नाम रखा IKEA फर्नीचर्स। इंग्वार ने 1953 में अपना पहला शोरूम खोला था और आज दुनिया भर में उनके शोरूम हैं।

डिस्लेक्सिया को हराया

पांच साल के होने पर इंग्वार का स्कूल में एडमिशन कराया गया। इंग्वार को लेकर कुछ महीने बाद यह बात सामने आई कि इंग्वार डिस्लेक्सिया नाम की एक बीमारी से पीड़ित हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमे शब्दों को पढ़ने, समझने और याद रखने में परेशानी आती है। कड़ी मेहनत के बल पर इंग्वार ने इस बीमारी से छुटकारा पाया। 6 साल की उम्र से इंग्वार पढ़ाई भी करता और अपने पिता के साथ लकड़ियां लाने जंगल भी चला जाता।

बचपन से ही निकाले जेब खर्च

इंग्वार अपने पिता के साथ जंगल जाते तो लौटते हुए रास्ते से लकड़ी के कुछ सरकंडे चुन कर उठा लाते। उन सरकंडे की कलम बना कर स्कूल के बच्चों को बेच कर खुद का जेब खर्च निकाल लेते थे। यहीं से इंग्वार अपनी छोटी सी उम्र से ही पैसा कमाने के और भी बेहतर अवसर तलाशने लगे। 7 साल की उम्र में अपने पिता की बनाई तीन पहियों वाली लकड़ी की साइकल पर इंग्वार माचिस बेचने जाने लगे, इससे उनके स्कूल के खर्चे निकलने लगे।

थोक खरीदारी का फंडा

10 साल की उम्र में इंग्वार के पिता ने एक साइकल दे दिया, जिस पर वह अपने आस पास के गांव मे भी माचिस बेचने जाने लगे। उन्हें पता चला कि अगर यह माचिस स्टॉकहोम शहर से होलसेल में खरीद ली जाए तो काफ़ी सस्ती पड़ेगी। इस तरह वे अधिक माचिस लोगो को बेच पाएंगे और अधिक मुनाफा कमा सकेंगे। इसके बाद इंग्वार ने स्टॉकहोम शहर में अपने एक रिश्तेदार की मदद से इंग्वार ने बहुत सारी माचिस मंगवा ली।

इंग्वार का हुआ बहिष्कार

सस्ते फर्नीचर बेचने की इंग्वार की नीति से अन्य कंपनियों के रेट खराब हुए और डिमांड कम हो गई। इंग्वार के फर्नीचर्स की बढ़ती डिमांड से नामी गिरामी कंपनियों के फर्नीचर्स की डिमांड बाजार मे गिरने लगी जिससे कंपनियों को बहुत नुकसान होने लगा। इसी के चलते स्वीडिश फर्नीचर और वुड इंडस्ट्री ने इंग्वार की कम्पनी का बहिष्कार कर दिया जिसके चलते सबने इंग्वार के लिए माल बनाने तथा बेचने से मना कर दिया।

पहले जानकारी जुटाई

20 साल की उम्र तक इंग्वार अपने बिज़नेस को आगे बढ़ाना चाहते थे जिसके लिए उन्हें अधिक समय देना अनिवार्य था। इसी के चलते इंग्वार ने पढ़ाई छोड़ दी। अभी तक इंग्वार साइकल पर घूम घूम कर माचिस, बॉल पेन और डेकोरेशन जैसे कई सामान बेच चुके थे और उनके पास काफ़ी जानकारी इकठ्ठा हो गई थी। इंग्वार ने अपने आस पास लकड़ी का समान बेचने वाले कुछ लोगो से बात की जिसमे उसने अच्छे से उनके रेट जैसी कई अन्य जानकारियां इकट्ठा कर ली।

कारोबारी रणनीति बदली

इसके बाद इंग्वार ने आसानी से मिलने वाले ऐसे ही सामानो के लिए कैटेलॉग छपवाया। इंग्वार बहुत काम मार्जिन पर बिज़नेस करने मे विश्वास रखते थे। इससे ऑर्डर ज्यादा आते और मैनुफेक्चरर से अधिक माल खरीदने पर अधिक डिस्काउंट मिलता। धीरे धीरे इंग्वार की इसी रणनीति से बिज़नेस अच्छा चलने लगा। इसके बाद इंग्वार के कैटेलॉग मे फर्नीचर जैसे बड़े सामान शामिल होने लगे और बॉल पेन जैसे छोटे सामान लिस्ट से गायब होने लगे।

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लेखक के बारे में
Amit Tyagi
बिजनेस रिपोर्टिंग में 15 साल से अधिक का अनुभव. दिल्ली के लोकल मार्केट से लेकर एनसीआर से इंडस्ट्रियल क्लस्टर और एसएमई से लेकर रियल एस्टेट कारोबार तक की रिपोर्टिंग. साल 2014 से डिजिटल या न्यू मीडिया में बिजनेस, सक्सेस स्टोरी, मनी-मैटर, ट्रेंडिंग स्टोरी से जुड़ा कामकाज.... और पढ़ें

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