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कोरोना का कहर: देश में कफन की मांग 30 गुना बढ़ी, अंतिम संस्कार का खर्च भी कई गुना हुआ

कोरोनावायरस महामारी (Covid-19 pandemic) ने देश के हर हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक रोजाना औसतन 4,000 लोगों की कोरोना से मौत हो रही है। इससे देश में कफन की मांग 30 गुना बढ़ गई है।

नवभारतटाइम्स.कॉम 17 May 2021, 2:20 pm

हाइलाइट्स

  • रोजाना औसतन 4,000 लोगों की कोरोना से मौत हो रही है
  • इससे पूरे देश में कफन की मांग 30 गुना बढ़ गई है
  • शवों के अंतिम संस्कार का खर्च भी कई गुना बढ़ गया है

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नवभारतटाइम्स.कॉम रोजाना औसतन 4,000 लोगों की कोरोना से मौत हो रही है।
रोजाना औसतन 4,000 लोगों की कोरोना से मौत हो रही है।
नई दिल्ली
कोरोनावायरस महामारी (Covid-19 pandemic) की दूसरी लहर ने पूरे देश में कोहराम मचा रखा है। इसने देश के हर हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक रोजाना औसतन 4,000 लोगों की कोरोना से मौत हो रही है। इससे देश में कफन की मांग 30 गुना बढ़ गई है। इस दौरान शवों के अंतिम संस्कार का खर्च भी कई गुना बढ़ गया है। यही वजह है कि कई स्थानों पर शवों को जलाने के बजाय दफनाने की घटनाएं सामने आई हैं।
पायनियर की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन दिनों बिहार और उत्तर प्रदेश में छोटी हैंडलूम और मशीन लूम यूनिट्स कफन का कपड़ा बनाने में बिजी हैं। मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ाया गया है। ये यूनिट्स एक महीने में 10,000 कफन बनाते हैं लेकिन आजकल उन्हें एक दिन में ही इतने कफन बनाने पड़ रहे हैं। हालत यह है कि बिहार के गया में लूम्स को दिन-रात काम करना पड़ रहा है। कामगारों को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। यहां से बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और यहां तक कि पूर्वोत्तर राज्यों की भी कफन का कपड़ा भेजा जा रहा है।

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गुजरात से आता है कच्चा माल
उत्तर प्रदेश के हैंडलूम्स एंड टेक्सटाइल विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि वाराणसी को लोहता इलाके, मऊ और आजमगढ़ में हर महीने एक लाख कफन बनाए जाते हैं लेकिन आजकल मांग लगभग तिगुनी हो गई है। यहां से पूरे उत्तर भारत यानी पूर्वांचल से लेकर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, राजस्थान, गुजरात और यहां तक कि दक्षिणी राज्यों को भी कफन की आपूर्ति की जाती है। अधिकारी ने कहा कि इन दिनों यह काम पावरलूम पर होता है। अब यह हैंडलूम मटीरियल नहीं रह गया है। इसके लिए कच्चा माल गुजरात से आता है।

अधिकारी ने बताया कि इस काम में ज्यादा मुनाफा नहीं है। अमूमन यह काम उन स्थानों पर होता है जहां मजदूरी कम है। जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल। गया के मानपुर इलाके को पूर्वी बिहार का मैनचेस्टर कहा जाता है। यहां कामगार मांग को पूरा करने के लिए रोजाना 50,000 कफन तैयार कर रहे हैं। यहां कॉटन के अलावा पॉलीस्टर और सिल्क के कफन भी बनाए जाते हैं। गया के पटवाटोली में एक छोटी यूनिट चलाने वाले द्वारिका ने कहा कि हम दिन-रात काम कर रहे हैं। मांग बहुत ज्यादा है लेकिन हमने कीमतें नहीं बढ़ाई हैं। कफन में कालाबाजारी नहीं होती। उन्होंने कहा कि हर धर्म में कफन की जरूरत पड़ती है। कीमत हर जगह अलग हो सकती है। यह कफन के साइज पर भी निर्भर करता है।

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कई गुना बढ़ा अंतिम संस्कार का खर्च
केंद्र ने रविवार को यूपी और बिहार को निर्देश दिया कि शवों को गंगा और दूसरी नदियों में फेंकने पर रोक लगाई जाए। शवों के अंतिम संस्कार पर जोर दिया जाए। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में शवों को रेत में दफनाने की तस्वीरें सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि अंतिम संस्कार का खर्च तीन गुना बढ़कर 1500 रुपये हो गया है। इसके अलावा लकड़ी ठेकेदारों ने भी लोगों से दाह संस्कार के लिए ज्यादा पैसे वसूलने शुरू कर दिए हैं। इसके बाद से लोगों ने दाह संस्कार की जगह शवों को दफनाना शुरू कर दिया।

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