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कंपनियों के विदेशी कर्ज चुकाने और तेल में तेजी से 72 तक जा सकता है रुपया

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के करंसी मार्केट में दखल देने से रुपये में गिरावट रुक गई, लेकिन यह अस्थायी राहत साबित हो सकती है। भारतीय कंपनियों के शॉर्ट टर्म कर्ज चुकाने की वजह से जल्द ही रुपया नए लो लेवल पर पहुंच सकता है।

इकनॉमिक टाइम्स 10 Jul 2018, 8:40 am
गायत्री नायक, मुंबई
नवभारतटाइम्स.कॉम rupee

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के करंसी मार्केट में दखल देने से रुपये में गिरावट रुक गई, लेकिन यह अस्थायी राहत साबित हो सकती है। भारतीय कंपनियों के शॉर्ट टर्म कर्ज चुकाने की वजह से जल्द ही रुपया नए लो लेवल पर पहुंच सकता है। पिछले दो महीनों में देश के विदेशी मुद्रा भंडार में पीक लेवल से 20 अरब डॉलर की कमी आ चुकी है। इस दौरान आरबीआई ने रुपये में गिरावट रोकने के लिए बाजार में डॉलर बेचे हैं। कहा जा रहा है कि रिजर्व बैंक ने फॉरवर्ड मार्केट में और 20 अरब डॉलर की बिक्री की है।

देश का शॉर्ट टर्म कर्ज 222 अरब डॉलर का है, जो उसके विदेशी मुद्रा भंडार के आधे से अधिक है। यह वह पैसा है, जिसे भारतीय कंपनियों ने विदेश से कम रेट पर लिया था। इनमें से कुछ कंपनियों ने कर्ज की हेजिंग की थी और दूसरों ने इसके भुगतान के लिए एक्सपोर्ट इनकम पर दांव लगाया था। इनमें से कई कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी में रुपये में गिरावट की वजह से कमी आने का भी खतरा है। आने वाली कुछ तिमाहियों में तेल के दाम में बढ़ोतरी, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में कमी और लोन चुकाने के लिए डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया 72 के लेवल तक गिर सकता है।

इस बारे में बार्कलेज के चीफ इंडिया इकनॉमिस्ट सिद्धार्थ सान्याल ने कहा, 'तेल के दाम बढ़ रहे हैं। इसके साथ इंपोर्ट में भी तेजी आ रही है। ऐसे में हमें करेंट एकाउंट डेफिसिट के बढ़कर जीडीपी के 2.6 पर्सेंट तक पहुंचने के आसार दिख रहे हैं।' उन्होंने कहा कि एफडीआई से इसकी एक हद तक ही भरपाई हो रही है और एफआईआई निवेश को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसलिए 2018 के अंत तक डॉलर के मुकाबले रुपया 72 के लेवल तक जा सकता है।

इस साल की शुरुआत से इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी के साथ रुपये पर दबाव बना हुआ है। अमेरिका ने मॉनेटरी पॉलिसी को नॉर्मल बनाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी शुरू की है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ है। इसका इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी पर बुरा असर पड़ा है। इससे निपटने के लिए इंडोनेशिया और तुर्की सहित भारत के सेंट्रल बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है।

भारत के पास 406 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। इस बीच, इंपोर्ट बिल बढ़ने से भी इसमें कमी आ रही है। कच्चे तेल की कीमत दो साल पहले के लो लेवल से 90 पर्सेंट बढ़ चुकी है। भारत को इसके आयात पर काफी पैसा खर्च करना पड़ता है क्योंकि वह 75 पर्सेंट से अधिक तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है।

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