ऐपशहर

बुआई के सीजन में भरोसे और उधारी पर हो रही खेती

[ जयश्री भोसले | पुणे ] महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव के किसान दयानेश्वर गवंडे के पास नकदी नहीं है, लेकिन वह अपने आठ एकड़ के खेत में चने की बुआई ...

नवभारतटाइम्स.कॉम 5 Dec 2016, 9:00 am

[ जयश्री भोसले | पुणे ]

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव के किसान दयानेश्वर गवंडे के पास नकदी नहीं है, लेकिन वह अपने आठ एकड़ के खेत में चने की बुआई करने में सफल रहे हैं। खेती के लिए जरूरी इनपुट की कीमत 35,000 रुपये थी जिस पर उन्हें उधार मिल गया। ग्रामीण खेतों में काम करने वाले श्रमिकों को बिना नकद भुगतान दिए रख रहे हैं। वे गांव में किराना दुकान के मालिक से व्यक्तिगत गारंटी पर श्रमिकों को ग्रॉसरी दिलवा रहे हैं।

गवंडे ने बताया, 'चने के बीज काफी महंगे थे, लेकिन मेरे चचेरे भाई के पास बीज थे जिन्हें उधार लेकर मैंने बुआई की है।' पंजाब, पश्चिम बंगाल या उत्तर प्रदेश चाहे जिस भी राज्य की बात करें देशभर में गांवों में कुछ ऐसी ही स्थिति है। किसान भरोसे और उधारी के दम पर समय पर बुआई करने में सफल हो रहे हैं। इसका सबूत फसलों की बुआई के आंकड़े से भी मिल रहा है। एग्रीकल्चर मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, 25 नवंबर तक के सप्ताह में बुआई में 35 पर्सेंट और इसके बाद के सात दिनों में और 27 पर्सेंट की बढ़ोतरी दर्ज की गई। फसलों की कुल बुआई पिछले वर्ष के मुकाबले नौ पर्सेंट अधिक है।

ग्रामीण भारत के बहुत से लोग नकदी के बिना जीना सीख गए हैं और वे बड़े मूल्य के नोटों को वापस लिए जाने के कदम के समर्थन में भी हैं। हालांकि, अभी तक बहुत से ग्रामीण बैंकिंग सिस्टम से दूर हैं। वे सदियों पुरानी उधारी व्यवस्था पर निर्भर करते हैं जिसमें लोग एक-दूसरे को नाम से जानते हैं और उनके पास उधार पर खरीदारी करने और कटाई के समय उसका भुगतान करने की सुविधा होती है। इसी वजह से किसानों को बीज और अन्य इनपुट भी उधार पर मिल रहे हैं।

जिन लोगों के पास अपने इलाके में उधारी लेने की क्षमता नहीं है, उनके लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनकी बुआई में देरी हुई है और इनपुट की कमी की वजह से वे खड़ी फसल की देखभाल भी नहीं कर पा रहे।

कुछ किसान अधिक ब्याज के कारण उधारी नहीं लेना चाहते। किसानों का कहना है कि आमतौर पर स्थानीय दुकानदार अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) से कुछ डिस्काउंट पर चीजें बेचते हैं। लेकिन अगर उधार पर सामान खरीदा जाता है तो डिस्काउंट कम मिलता है।

ज्योति देशमुख के परिवार के तीन लोगों ने हाल के वर्षों में कर्ज की वजह से आत्महत्या की थी। अब ज्योति अकेले ही परिवार के 29 एकड़ के खेत में बुआई करती हैं। परिवार के तीन लोगों को खोने के बाद वह उधार नहीं लेना चाहती। उन्होंने बताया, 'मेरे पास कुछ बचे हुए बीज थे, लेकिन मुझे फर्टिलाइजर उधार पर लेना पड़ा है।'

किसानों का कहना है कि उधारी और भरोसे पर आधारित कैशलेस सोसाइटी के लिए एक कीमत चुकानी पड़ती है। अकोला में किसानों के हितों के लिए काम करने वाले मनोज तयादे ने बताया, 'जब हम उधार पर खरीदारी करते हैं तो हमसे अधिक कीमत वसूली जाती है। इंटरेस्ट का बोझ भी बढ़ जाता है।'

अगला लेख

Businessकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर
ट्रेंडिंग