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सरकारी उपायों, रेट कट से बाजार में आएगी बहार: BNP पारिबा

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक सिर्फ भारतीय शेयर बाजार को लेकर बेरुखी नहीं दिखा रहे हैं। उनमें सभी इमर्जिंग मार्केट्स (EM) को लेकर उदासीनता बनी हुई है। ...

इकनॉमिक टाइम्स 17 Sep 2019, 9:00 am

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक सिर्फ भारतीय शेयर बाजार को लेकर बेरुखी नहीं दिखा रहे हैं। उनमें सभी इमर्जिंग मार्केट्स (EM) को लेकर उदासीनता बनी हुई है। बीएनपी पारिबा इंडिया में ग्लोबल मार्केट्स के हेड संजय सिंह ने निशांत वासुदेवन को दिए इंटरव्यू में यह बात कही। सिंह ने बताया कि रुपये में आगे कुछ मजबूती आ सकती है और गोल्ड कुछ और महंगा हो सकता है। पेश हैं इस इंटरव्यू के खास अंश:

आप विदेशी निवेशकों से बातचीत करते रहते हैं। भारत को लेकर उनका क्या रुख है?

विदेशी निवेशक अभी उदासीन हैं, लेकिन ऐसा सिर्फ भारत को लेकर नहीं है। बजट के बाद फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टर्स (FPI) ने भारत में 4.8 अरब डॉलर के शेयर बेचे हैं, लेकिन इस बीच दूसरे EM से भी उन्होंने निकासी की है। पिछले दो हफ्तों में इस क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ा है। उसकी वजह यह है कि उन्हें एशियाई देशों में कंपनियों की अनुमानित प्रॉफिट ग्रोथ में कटौती का सिलसिला थमने की उम्मीद है। हमें दुनिया भर में ब्याज दरों में भी कमी बने रहने की उम्मीद है। अमेरिका में हम 2020 के मध्य तक और चार बार ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं। यूरोप में और दो बार दरों में कटौती हो सकती है।

भारत में हमने इस साल के अंत तक नीतिगत दर (रेपो रेट) में और 0.40 प्रतिशत की कमी किए जाने की उम्मीद है। हमें लगता है कि इमर्जिंग मार्केट की करेंसी में स्थिरता लौटनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो भारत जैसे देशों में विदेशी निवेश बढ़ सकता है। पिछले कुछ हफ्तों में एनडीए सरकार ने अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। इनसे जमीनी हालात बेहतर होंगे।

क्या यह सच है कि विदेशी निवेशक लंबी अवधि के लिए भारतीय बाजार में निवेश करने से कतरा रहे हैं?

कुछ समय के लिए शायद यह बात सच हो। विदेशी निवेशक पहले इकनॉमी में सुधार के संकेत और कंपनियों की प्रॉफिट ग्रोथ में अपग्रेड देखना चाहते हैं। हर सेगमेंट में निवेशकों के सेंटीमेंट को धक्का लगा है और स्थिति सुधरने में वक्त लगेगा। इस बीच, डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड में लगातार निवेश हो रहा है। ऐसे में अगर बाजार में रिकवरी होती है तो विदेशी निवेशक उसका फायदा उठाने से चूक जाएंगे। उन्हें भी इसका अहसास है।

किस बात से विदेशी निवेशक भारत पर बुलिश हो सकते हैं?

हाल के महीनों में विदेशी निवेश कम रहने की वजह कंपनियों की कमजोर प्रॉफिट ग्रोथ और अर्निंग डाउनग्रेड्स का जारी रहना है। पॉजिटिव बात यह है कि भारत की समस्या घरेलू है, वैश्विक नहीं। भारत की जीडीपी ग्रोथ एशिया के दूसरे देशों की तरह निर्यात या मैन्युफैक्चरिंग पर बहुत आश्रित नहीं है। विदेशी निवेशकों को पता है कि भारत अभी स्ट्रक्चरल रिफॉर्म के दौर से गुजर रहा है। यहां संगठित क्षेत्र का विस्तार हो रहा है। इसलिए विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी भारतीय शेयर बाजार में बनी रहेगी।

हालिया गिरावट के बाद रुपये में कुछ मजबूती दिख रही है। क्या इसका सबसे बुरा दौर खत्म हो गया है?

हमें लगता है कि EM में जीडीपी ग्रोथ, महंगाई और ब्याज दरों में नरमी आएगी। अभी डॉलर और युआन का इन देशों की करेंसी पर असर हो रहा है। अमेरिका में रियल यील्ड में तेज गिरावट आई है और इसमें शॉर्ट टर्म में मजबूती आने के आसार नहीं दिख रहे। मार्च 2018 के बाद युआन में 10 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है और इसके मौजूदा स्तर के करीब बने रहने की संभावना है। इक्विटी और बॉन्ड मार्केट में विदेशी निवेश बढ़ने से रुपये में मजबूती आएगी। हमें लगता है कि यहां से डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होगा और साल के अंत में यह 69-70 के बीच रह सकता है।

क्या आपको बॉन्ड यील्ड में और गिरावट आने की उम्मीद है? कुछ लोगों का कहना है कि रिजर्व बैंक से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये मिलने के बाद भी फिस्कल डेफिसिट लक्ष्य से अधिक रह सकता है...

अगले साल मार्च तक 10 साल की बॉन्ड यील्ड 6.25 प्रतिशत को पार कर जाएगी। हाल में इसमें 0.30 प्रतिशत की मजबूती आई है। उसकी वजह यह है कि बाजार को फिस्कल डेफिसिट टारगेट पूरा होने का भरोसा नहीं है। हालांकि, हमारा मानना है कि सरकार इस टारगेट को हासिल करेगी और साथ ही, वह आर्थिक विकास दर बढ़ाने के उपाय भी जारी रखेगी।

क्या गोल्ड में बुल रन जारी रहेगा?

हमें लगता है कि रियल रेट्स गहरे नेगेटिव जोन में जा रहे हैं। इससे गोल्ड में और तेजी आ सकती है। दुनिया भर में लोग आज सुरक्षित निवेश के ठिकाने की तलाश में हैं। इससे भी गोल्ड का आकर्षण बढ़ सकता है।

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