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Bihar Election : क्या उपेंद्र कुशवाहा को गले लगाएंगे नीतीश कुमार ? कभी घर का सामान बाहर फिंकवा दिया था

उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha ) विधानसभा चुनाव ( Bihar Assembly Election 2020 ) से पहले बिहार की राजनीति में एक बार फिर अपना वजन तौलने पर मजबूर हो गए हैं। राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होने की स्थापित परिभाषा के बावजूद उनके लिए नया ठौर पाना टेढी खीर है। एकला चलो की हैसियत तो किसी में नहीं है। 2005 के पहले विधानसभा चुनाव के बाद ही सत्तालोलुप किसी भी दल के लिए ऐसा करना आत्मघाती माने जाना लगा। तब रामविलास पासवान सत्ता का चाबी झुनझुनाते रह गए थे।

Authored byआलोक कुमार | नवभारतटाइम्स.कॉम 25 Sep 2020, 8:57 am

हाइलाइट्स

उपेंद्र कुशवाहा - नीतीश कुमार के बीच अदावत की कहानी पुरानी है
नीतीश ने 2004 में कुशवाहा को विपक्ष का नेता बनाया, अगले साल ही उनके बंगले से सामान फिंकवा दिया
उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में चौथी बार एंट्री मारने की कोशिश कर रहे हैं
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नवभारतटाइम्स.कॉम Upendra-Kushwaha
उपेंद्र प्रसाद कुशवाहा
अब सवाल उठता है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में चौथी बार एंट्री ले पाएंगे और क्या नीतीश कुमार ( Nitish Kumar ) इसकी इजाजत देंगे? लालू यादव - तेजस्वी खेमे से जीतनराम मांझी पहले ही एनडीए में आ चुके हैं। रामविलास पासवान ( Ram Vilas Paswan ) के बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के नेता चिराग पासवान (Chirag Paswan News ) बीजेपी-जेडीयू की उम्मीदों से कहीं ज्यादा सीटें मांग रहे हैं। ऐसे में क्या कुशवाहा का इस्तेमाल नीतीश कुमार-सुशील मोदी की जोड़ी कर सकती है? इसके कयास बीजेपी और जेडीयू कैंप में लगाए जा रहा हैं।

नीतीश कुमार ( Nitish Kumar News) से कुशवाहा की अदावत और आव-भगत की कहानी पुरानी है। 2013 में जब नीतीश ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिगुल बजाते हुए एनडीए से हटने का ऐलान कर दिया तो उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) बीजेपी के साथ अलायंस में आ गई। 2014 के मोदी लहर में रालोसपा ने भी सभी तीन सीटों पर जीत हासिल की और कुशवाहा केंद्र में मंत्री बनाए गए। तब बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग में लगभग तीन फीसद कुशवाहा वोट अहम था। ऊपर से रालोसपा नेता नरेंद्र मोदी के दुश्मन नीतीश कुमार के खिलाफ लगातार जहर उगल रहे थे। बीजेपी के लिए ये इससे अच्छा और क्या हो सकता था।

लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार और लालू यादव ने हाथ मिलाया तो बीजेपी-लोजपा-रालोसपा का सूपड़ा साफ हो गया। लोकसभा में प्रचंड मोदी लहर के कुछ महीने बाद ही बिहार में एनडीए को करारी शिकस्त मिली। कुर्मी-कोईरी वोट पॉकेट के रखने का दावा करने वाले कुशवाहा 23 सीटों पर लड़े और जीत हासिल हुई दो पर। दलितों के नेता रामविलास 40 सीटों पर लड़ कर भी दो सीट हासिल कर पाए। महादलितों के नेता मांझी 20 में सिर्फ अपनी सीट निकाल पाए। इसने सोशल इंजीनियरिंग की सारी थ्योरी पर सवाल उठा दिए।


2015 के चुनाव परिणाम के बाद उपेंद्र कुशवाहा बिना वोट बैंक वाले नेता बन कर रह गए। हालांकि दिल्ली में मंत्री की कुर्सी बनी रही। बिहार में महागठबंधन सरकार दो साल भी पूरा नहीं कर पाई और नीतीश कुमार ने अचानक बीजेपी का दामन थाम लिया। 17 साल की दोस्ती के बाद 2013 में जो रिश्ता टूटा वो 2017 में फिर कायम हो गया। नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की लोकप्रिय जोड़ी ने कुशवाहा को असहज कर दिया। कुशवाहा को अचानक नीतीश कुमार में तानाशाह की शक्त दिखी और उन्हें कुशासन बाबू ठहराते हुए वो एनडीए से विदा हो गए।

2015 के विधानसभा चुनाव की तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कुशवाहा लव-कुश वोट बैंक तेजस्वी के लिए ट्रांसफर नहीं करा सके। महागठबंधन बुरी तरह मात खा गया। ऐसे में 2020 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी के लिए आरजेडी का वजूद बचाने की लड़ाई है। जब महासमर के गिने चुने दिन बचे हैं तभी उपेंद्र कुशवाहा को तेजस्वी में खोट नजर आने लगा। अब वो महागठबंधन को अलविदा कह रहे हैं। जेडीयू-बीजेपी इस पर सिर्फ चुटकी ले रही है। तेजस्वी को कोसा जा रहा है लेकिन एनडीए में कुशवाहा के स्वागत वाला एक भी बयान नहीं आया है। दरअसल कुशवाहा अब एनडीए के लिए पॉलिटिकल मजबूरी नहीं रहे।

कुशवााहा का बंगला जबरन कराया खाली

इसके अलावा नीतीश कुमार को टार्गेट करने के बाद गुंजाइश कम रह जाती है। दोनों के मीठे - कड़वे रिश्ते की शुरुआत समता पार्टी के समय ही हो गई थी। लालू के खिलाफ राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे नीतीश को तब कुशवाहा ने काफी मदद की। इसका इनाम भी मिला। 2004 में नीतीश ने उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दिया। ये जानते हुए भी कि कुशवाहा पहली बार विधायक बने हैं। लेकिन 2005 में ही कुशवाहा के सुर बदल गए। जब अक्टूबर में हुए चुनाव के बाद नीतीश को कुर्सी मिली तो फरमान निकला कि सदन में विपक्ष के नेता होने के नाते कुशवाहा को जो बंगला मिला था वो खाली कराया जाए। जब नोटिस की तालीम नहीं हुई तो पटना प्रशासन ने कुशवारा की गैर मौजूदगी में उनके बंगले से सारा सामान बाहर निकाल दिया।

2007 में कुशवाहा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके बाद उन्होंने छगन भुजबल की मदद से एनसीपी जॉइन की। कुछ दिन वहां रहे फिर राष्ट्रीय समता पार्टी बनाई। दो साल बाद ही वो नीतीश के पाले में आ गए। 2009 में हुई इस वापसी से नीतीश के सिपहसालार ललन सिंह नाराज भी हुए थे। फिर भी नीतीश ने 2010 में जेडीयू की तरफ से उन्हें राज्यसभा भेज दिया। इसी साल राजगीर में पार्टी का सम्मेलन था। इसमें नीतीश की मौजूदगी में कुशवाहा ने उन पर सवाल उठाए। उन्होंने राम लखन महतो , बीमा भारती, श्रीकांत निराला, श्याम रजक जैसे नेताओं को आरजेडी से जेडीयू में लाने पर सवाल उठाया। दरअसल राम लखन महतो ने ही कुशवाहा को विधानसभा चुनाव में हराया था।

दरअसल कुशवाहा को अपने कद का अंदाजा कभी नहीं रहा। वरिष्ठता के मुताबिक राजनीति में अपेक्षित ऊंचाई न हासिल कर पाने से वो खिन्न दिखाई देते रहे। 2012 के दिसंबर में जब मल्टी ब्रांड रीटेल में एफडीआई का जेडीयू ने विरोध किया तब कुशवाहा ने राज्यसभा में बिल के समर्थन में वोट दे दिया। 12 दिसंबर, 2012 को उन्होंने एक बार फिर नीतीश को तानाशाह बताते हुए जेडीयू से विदाई ली और 2013 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाई।
लेखक के बारे में
आलोक कुमार
नवभारत टाइम्स डिजिटल के संपादक। पत्रकारिता में यूनिवार्ता, बीबीसी, नेटवर्क18, सहारा, टीवी 9 जैसी संस्थाओं के बाद टाइम्स इंटरनेट तक 20 साल का सफर जो रांची से शुरू होकर, एनसीआर, पटना और फिर एनसीआर तक पहुंचा है पर दिल जन्मस्थली मुजफ्फरपुर, बिहार में बसता है. देश-विदेश, खेल और बिज़नस जगत में खास रुचि। डिजिटल माध्यम के नए प्रयोगों में दिलचस्पी के साथ सीखने की सतत इच्छा... Twitter Handle - @dmalok... और पढ़ें

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