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Gujarat Election Ground Report: चुनावी प्रचार के 'बुखार' के बीच सेक्स वर्कर्स के गांव में सन्नाटा

गुजरात चुनाव की घोषणा के साथ ही आयोग ने कहा था कि रेड लाइट एरिया में वोटिंग को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। लेकिन बनासकांठा के थराद तालुका स्थित गांव वाडिया में तस्वीर कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही है। यहां पर आयोग के अधिकारी तो दूर पार्टी के लोग तक अब तक नजर नहीं आए।

Reported byBharat Yagnik | Produced byराघवेंद्र सिंह | टाइम्स न्यूज नेटवर्क 29 Nov 2022, 1:59 pm

हाइलाइट्स

  • चुनावी प्रचार के बीच सेक्स वर्कर्स के गांव में पसरा सन्नाटा
  • आयोग ने वोटिंग को लेकर जागरूकता की कही थी बात
  • किसी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता तक नहीं आया झांकने
  • गांव वालों का आरोप- हमेशा से की गई हमारी उपेक्षा

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नवभारतटाइम्स.कॉम Vadiya village red light area
वाडिया गांव की तस्वीर
अहमदाबाद: रेड लाइट इलाकों में मतदाताओं की जागरूकता को लेकर बात हवा-हवाई साबित हो रही है। कमोवेश बनासकांठा के थराद तालुका में तो ऐसा ही होता नजर आ रहा है। दरअसल बीती 3 नवंबर को जब चुनाव आयोग ने गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा की तो कहा गया कि रेड लाइट क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। लेकिन जागरुकता अभियान तो दूर की बात यहां तो आयोग के साथ-साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता तक नदारद दिख रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या ये वायदे महज औपचारिकता महज हैं या फिर हकीकत में इसकी कोई सुध लेने वाला कोई नहीं है।

700 आबादी वाला गांव, देह व्यापार पर निर्भर 50 परिवार
थराद सीट से कांग्रेस विधायक गुलाब सिंह राजपूत के खिलाफ पूर्व मंत्री और बीजेपी प्रत्याशी शंकर चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं। वाडिया गांव की आबादी करीब 700 है। जिसमें 50 परिवार परंपरागत रूप से देह व्यापार पर ही निर्भर हैं। यहां की प्रथा को खत्म करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं कि जरिए कई असफल प्रयास किए गए हैं। 30 वर्षीय दिनेश सरानिया नाम के एक ग्रामीण ने कहा कि यह उदासीनता इस चुनाव के लिए अनोखी नहीं है। उन्होंने कहा, 'पहले के चुनावों में भी हमारी उपेक्षा की गई। हम आस-पास के गांवों में लाउडस्पीकर, ढोल और नारे सुनते हैं। लेकिन उम्मीदवार हमारे गांव तक कभी नहीं आते हैं।'

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कल्याणकारी योजनाओं से वंचित
ग्रामीणों के सामने आने वाली कुछ समस्याओं का जिक्र करते हुए सरानिया ने कहा कि गांव में रहने वालों के घर उनके नाम पर पंजीकृत नहीं हैं। इसलिए वे कई कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। गांव के निवासी ने कहा कि 'हमारे गांव में सड़क या स्वास्थ्य केंद्र जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। कोई भी हमारे मुद्दों को उठाने की हिम्मत नहीं करता है। हालांकि इस दौरान सरानिया ने यह नहीं बताया कि वह जीने के लिए किस जीविका का इस्तेमाल करता है।

गांव के एक शिक्षक ने कहा कि स्कूल में कमरे नहीं हैं और छात्र खुले में पढ़ते हैं। उन्होंने कहा कि असली समस्या वर्जित है जो सरकारी अधिकारियों और बुनियादी सुविधाओं को वडिया से दूर रखती है। “कभी-कभी जो लोग सेक्स वर्कर्स से संपर्क करना चाहते हैं वे अधिकारियों के रूप में थराद-धनेरा राजमार्ग से गांव के लिए दिशा-निर्देश मांगते हैं। शिक्षक ने कहा कि वास्तविक सरकारी अधिकारी, सार्वजनिक पदाधिकारी या राजनीतिक नेता कभी इस जगह पर नहीं आते हैं।

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वडिया और वडगामदा गांवों को एक समूह पंचायत के जरिए प्रशासित किया जाता है। सरपंच जगदीश असल ने कहा कि वह कुछ दिन पहले वाडिया गए थे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी के पास मतदाता पहचान पत्र हो। असल ने कहा, "एकमात्र समस्या यह है कि ग्रामीणों को वोट देने के लिए वडगामदा जाना पड़ता है। हालांकि जिला कलेक्टर आनंद पटेल कई प्रयासों के बावजूद इस मामले पर अपनी टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं मिले।
लेखक के बारे में
Bharat Yagnik
Bharat Yagnik is special correspondent at The Times of India, Ahmedabad, and reports on education-related issues, including primary school and higher and technical education. His interest areas include travelling and has recently been to Mansarovar.... और पढ़ें

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