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SP-BSP से टूटा गठजोड़: ...तो इसलिए जोखिम उठाने को तैयार है कांग्रेस

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस-बीएसपी और कांग्रेस-एसपी गठजोड़ के टूटने की खबरों के बीच कांग्रेसी रणनीतिकारों के दो योजनाओं पर काम करने की संभावना है। पहली, वह सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे बीजेपी के किले को गिराने की कोशिश करेंगे। वहीं, दूसरी योजना के तहत कांग्रेस, क्षेत्रीय पार्टियों को उभरने का मौका नहीं देना चाहती।

नवभारत टाइम्स 11 Oct 2018, 3:47 am
सीएल मनोज, भोपाल
नवभारतटाइम्स.कॉम फाइल फोटो
फाइल फोटो

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस-बीएसपी और कांग्रेस-एसपी गठजोड़ के टूटने की खबरों के बीच कांग्रेसी रणनीतिकारों के दो योजनाओं पर काम करने की संभावना है। पहली, वह सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे बीजेपी के किले को गिराने की कोशिश करेंगे। वहीं, दूसरी योजना के तहत कांग्रेस, क्षेत्रीय पार्टियों को उभरने का मौका नहीं देना चाहती। पार्टी मध्य प्रदेश में बीएसपी को ज्यादा से ज्यादा 10 और एसपी को 3 सीटें देने के लिए तैयार हो सकती है।

कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि एसपी और बीएसपी उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ की वजह से जरूरत से ज्यादा सीटों पर हक जताती हैं। ऐसे में उन्हें कांग्रेस की पकड़ वाले राज्यों में उदारता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस को लगता है कि अगर वह इस समय एसपी और बीएसपी की बात मान लेती है तो दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव के दौरान और मोलभाव करेंगी। वे उत्तर प्रदेश के लिए होने वाले गठबंधन में कम सीटें देंगी।

कांग्रेस लोकसभा चुनाव से पहले चुनावी राज्यों में अपना प्रदर्शन सुधारना चाहती है। इसके लिए वह ऐसे जोखिम लेने के लिए भी तैयार है। कांग्रेस के एक नेता ने बताया, 'हमें लगता है कि एसपी, बीएसपी, तृणमूल, एनसीपी जैसी कई गैर-एनडीए पार्टियां चाहती हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस कमजोर पार्टी रहे। फिर वे कांग्रेस से 2019 लोकसभा चुनाव में और बेहतर तरीके से मोलभाव कर सकेंगी।'

...तो यह है रणनीति
हालांकि, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल से सत्ता से बाहर रहने के बाद भी कांग्रेस को लगता है कि वह इन दोनों राज्यों के साथ राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, गोवा और यहां तक असम में भी बीजेपी को सीधे टक्कर दे सकती है। इसीलिए वह इन राज्यों में किसी तीसरे या चौथे दल को नहीं उभरने देना चाहती। कांग्रेस की यह सोच आधारहीन नहीं है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को ओबीसी-एससी-एसटी वोटरों का अच्छा-खासा समर्थन हासिल है। देश की सबसे पुरानी पार्टी को डर है कि अगर उसने किसी तीसरी पार्टी के लिए रास्ते खोले तो वह बीएसपी और एसपी की तरह बड़ी क्षेत्रीय पार्टी बन जाएगी और वहां उसका अस्तित्व संकट में आ जाएगा। उत्तर प्रदेश और बिहार इसकी मिसाल हैं।

इन आंकड़ों के कारण दावे
कांग्रेसी नेता इसके लिए आंकड़ों का हवाला देते हैं। मध्य प्रदेश 2013 विधानसभा चुनाव में बीएसपी कुल 227 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें से 194 पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी। उसे 4 सीटों पर जीत के साथ कुल 6.42 पर्सेंट वोट मिले थे। एसपी की 165 सीटों में से 161 पर जमानत जब्त हुई थी और 0.51 पर्सेंट वोट मिले थे। वह एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। वहीं, कांग्रेस को 36.38 पर्सेंट वोट मिले थे। पार्टी नेताओं की दलील है कि कांग्रेस और बीजेपी के बीच 8.5 पर्सेंट वोटों का अंतर था। बीएसपी और एसपी को मिलाकर करीब 7 पर्सेंट वोट मिले थे और वही आखिर में निर्णायक साबित हुए।

एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बताया, राजनीति में 4 और 3 जुड़कर 7 नहीं होते। कांग्रेस का मध्य प्रदेश के पिछले तीन चुनावों में वोट शेयर उसकी स्वाभाविक ताकत से कम था। इसकी वजह हमारी आपसी फूट थी। हालांकि, इस बार एकसाथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे सीटों के साथ हमारा वोटर शेयर भी बढ़ेगा।'

'बीएसपी से ईमानदारी की बात नहीं हो सकती थी'
छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी को 4.27 और एसपी को 0.64 पर्सेंट वोट मिले थे। वहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच वोटों का अंतर महज 0.75 पर्सेंट था। कांग्रेसी नेता का कहना है, 'हमें पूरा भरोसा है कि बीजेपी अजित जोगी और बीएसपी के अलायंस को स्पॉन्सर कर रही है। ऐसे में बीएसपी के साथ ईमानदारी से कोई बात ही नहीं हो सकती थी।'

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