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ममता बनर्जी के 'गुडलक' नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी कितने बाहुबली? यूं समझें पूरा किस्सा

कभी टीएमसी की सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले शुभेंदु अधिकारी आज ममता बनर्जी के खिलाफ बीजेपी के साथ मिलकर रणनीति तैयार करने में जुटे हैं। वजह है टीएमसी में उनकी घटती इज्जत। शुभेंदु अब बीजेपी में हैं। उनका दावा है कि ममता बनर्जी को वह नंदीग्राम से हरा देंगे।

Authored byहिमांशु तिवारी | नवभारतटाइम्स.कॉम 6 Mar 2021, 4:49 am

हाइलाइट्स

  • पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है
  • नंदीग्राम में बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी का वर्चस्व माना जाता है, 2016 में हासिल की थी जीत
  • पूर्वी मेदिनीपुर के अंतर्गत आती है नंदीग्राम सीट, यहां अधिकारी परिवार का काफी असर है
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कोलकाता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के रण के लिए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है। ममता बनर्जी नंदीग्राम (Mamata Banerjee From Nandigram) से चुनावी मुकाबले में हैं। कभी ममता के बेहद करीबी रहे और अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि वह नंदीग्राम से चुनाव लड़ें या ना लड़ें लेकिन ममता बनर्जी को हरा देंगे।
नंदीग्राम में कभी ममता बनर्जी के लिए मजबूत रणनीति तैयार करने वाले शुभेंदु अधिकारी आज 'दीदी' के खिलाफ हैं। वहीं, शुभेंदु के समर्थकों ने 'आमरा दादार अनुगामी' के नारे को उठापटक के बीच बुलंद किया। आमरा दादार अनुगामी मतलब: हम दादा के अनुयायी हैं। वर्चस्व की जंग बन चुकी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की लड़ाई में ममता बनर्जी कमजोर पड़ती हुई नजर आ रही हैं। वजह उनके ही लोगों का बीजेपी के साथ जुड़ जाना है। अब जरा पूरा मामला वर्ष 2007 से जान लेते हैं।

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शुभेंदु का वह 'प्लान' और TMC की एंट्री
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में तत्कालीन वाम मोर्चे की सरकार के खिलाफ भूमि अधिग्रहण को लेकर प्रदर्शन चल रहा था। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बस एक मौका तलाश रही थी जिसके जरिए सत्ता की राह तय की जा सके। आंदोलन की रणनीति ने वाम मोर्चे की सरकार को चरमरा कर रख दिया। इस उलटफेर की कल्पना भी नहीं की गई थी लेकिन राजनीति है तो कुछ भी संभव है। शुभेंदु अधिकारी ने सरकार के खिलाफ लोगों को एकजुट करते हुए आंदोलन के चेहरे के रूप में ममता बनर्जी को चमका दिया। इस चमक ने सत्ता में टीएमसी की एंट्री कराई। फिर क्या, शुभेंदु अधिकारी का भी पॉलिटिकल करियर रफ्तार भरने लगा।

मुकुल रॉय ने कहा- बीजेपी वर्कर्स चाहते हैं...
नंदीग्राम में दूसरे चरण के दौरान 1 अप्रैल को चुनाव होना है। अब तस्वीर अलग है। शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के खिलाफ हैं। गुरुवार को बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद एक अहम बात कही थी कि पार्टी के कार्यकर्ता चाहते हैं कि शुभेंदु नंदीग्राम से चुनाव लड़ें। इस बीच लोगों के जेहन में शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक मजबूती को लेकर भी सवाल होगा।

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फिर शुरू हुआ जीत का सिलसिला
शुभेंदु अधिकारी ने अपना सियासी करियर कांग्रेस से शुरू किया था। पश्चिम बंगाल में कांथी पूर्वी मेदिनीपुर की एक लोकसभा सीट है। यहां प्रभात कुमार कॉलेज में शुभेंदु छात्र संघ के जनर सेक्रटरी नियुक्त हुए। राजनीतिक में बढ़ते कदमों के साथ उन्होंने पार्षदी में किस्मत आजमाई। उन्हें महज 25 साल की उम्र में सफलता मिली। 1988 में जब टीएमसी बनाई गई तो शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी भी पार्टी के साथ जुड़ गए थे। शुभेंदु को पहले 2001 में विधानसभा चुनाव और फिर 2004 में तामलुक लोकसभा सीट पर शिकस्त का सामना करना पड़ा। इन दो शिकस्तों ने उन्हें और हौसला दिया। वह अपने पिता शिशिर की सीट ओल्ड कांथी विधानसभा से विजयी हुए और विधानसभा पहुंचे। यह सफर महज तीन साल का था, फिर वह तामलुक लोकसभा सीट से जीत गए और सांसद बन गए।

इस तरह शुभेंदु ने जीती नंदीग्राम सीट
तामलुक सीट से ही शुभेंदु फिर से सांसद बने। इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु पूर्वी मेदिनीपुर जिले की नंदीग्राम सीट से चुनाव में उतरे। शुभेंदु ने सीपीआई के अब्दुल कबी को शिकस्त दी। शुभेंदु को 1 लाख 34 हजार 623 वोट मिले जबकि अब्दुल कबी को महज 53 हजार 393 वोट ही मिले। जीत का अंतर 40.3 फीसदी का था। इस जीत के इनाम के तौर पर शुभेंदु को कैबिनेट मंत्री का पद दिया गया। कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ शुभेंदु टीएमसी को बंगाल में मजबूत करने में जुट गए। फिर अचानक एक-एक कर उन्हें झटके मिलने लगे। पार्टी में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का कद बढ़ाया जाने लगा। वहीं, दूसरे नंबर पर रहे शुभेंदु को यह उपेक्षा लगने लगा। प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव को लेकर जब शुभेंदु ने सवाल उठाए तो उन्हें कई पदों से हटा दिया गया। शुभेंदु ने टीएमसी का साथ छोड़ दिया। अब यह देख लेते हैं कि यह सीट कब किसके पास रही है:

वर्षनामपार्टी
1967-1972भूपल चंद्र पांडासीपीआई
1977प्रबीर जानाजनता पार्टी
1982भूपल चंद्र पांडासीपीआई
1987शक्ति बालसीपीआई
1991शक्ति बालसीपीआई
1996देवी शंकर पांडाकांग्रेस
2001 से 2006 तकशेख इलियास मोहम्मदसीपीएम
2009 उपचुनावफिरोज बीबीटीएमसी
2011फिरोज बीबीटीएमसी
2016शुभेंदु अधिकारीटीएमसी

नंदीग्राम का यह खास किस्सा सुना आपने
नंदीग्राम की धरा को आंदोलन की धरा माना जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व में नंदीग्राम में उग्र आंदोलन हुआ, जिसकी वजह से ब्रिटिश शासन को झुकना पड़ा। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता से पहले तामलुक क्षेत्र को सुशील कुमार धारा, सतीश चंद्र सामंत, अजय मुखर्जी समेत उनके दोस्तों और नंदीग्राम के लोगों ने अंग्रेजों से आजाद कराया था। फिर इस क्षेत्र को ब्रिटिश शासन से मुक्त करा लिया गया। यह बात प्रचलित है कि नंदीग्राम आधुनिक भारत का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जिसे दो बार आजादी मिली।

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