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वेस्ट यूपी के कई नेताओं की साख दांव पर, टूटेगा हार का सिलसिला या फिर मिलेगी मायूसी?

इस लोकसभा चुनाव में देशभर के कई दिग्गजों की साख दांव पर लगी है। वहीं, पश्चिमी यूपी के कई नेता ऐसे हैं, जो अपने पिछले चुनाव हार चुके हैं और उनके प्रासंगिक बने रहने के लिए इस बार जीतना बहुत जरूरी है।

नवभारत टाइम्स 18 May 2019, 8:03 pm
शादाब रिजवी, मेरठ
नवभारतटाइम्स.कॉम elections
कई चुनाव हार चुके हैं पश्चिमी यूपी के ये नेता

लोकसभा चुनाव के बाद वोटों की काउंटिग से साफ होगा कि लगातार हार का सामना कर रहे वेस्ट यूपी के नेताओं को जीत नसीब होगी या एकबार फिर मायूस होना पड़ेगा। ऐसे नेताओं के यहां अपने हक में फैसला आने के लिए आंकड़ेबाजी पर मंथन तेजी से चल रहा है। चौधरी अजित सिंह, जयंत चौधरी, इमरान मसूद और हाजी याकूब कुरैशी जैसे नेता भी अपने पिछले चुनावों में हार का मुंह देख चुके हैं।

दरअसल, वेस्ट यूपी में कई नेता लगातार चुनाव में हार रहे हैं। बीएसपी के चर्चित नेता पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी मेरठ लोकसभा सीट से एसपी-बीएसपी गठबंधन से कैंडिडेट हैं। वह कई बार विधाचक रहे। मायावती और मुलायम सिंह यादव की सरकार मे मंत्री रहे लेकिन काफी वक्त से उन्हें जीत नसीब नहीं हुई। 2012 के विधानसभा चुनाव में मेरठ की सरधना विधानसभा सीट से वह एमएलए का चुनाव हार गए। 2014 में बीएसपी के टिकट पर मुरादाबाद से एमपी के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। 2017 में मेरठ दक्षिण विधानसभा सीट से पराजित हुए। इस बार मेरठ लोकसभा सीट से गठबंधन का उम्मीदवार होने के कारण उनके करीबी चुनाव मजबूत मान रहे हैं।

हार का सिलसिला तोड़ पाएंगे इमरान मसूद?

इसी तरह सहारनपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार, पूर्व विधायक और बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले इमराम मसूद को भी जीत की दरकार है। वह 2014 में एमपी का चुनाव लड़े थे लेकिन मजबूत दस्तक देने के बाद भी मोदी लहर में टिक नहीं सके थे और हार गए थे। 2017 का विधानसभा चुनाव भी वह चुनाव हार गए। इस बार सहारनपुर सीट से प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की अगुवाई में जीत की उनको आस तो है लेकिन काउंटिग से यह सब साफ होगा।

बिजनौर से लोकसभा चुनाव में बीएसपी से गठबंधन उम्मीदवार मलूक नागर भी जीत के लिए तरस रहे हैं। वह मेरठ लोकसभा सीट से 2007 और बिजनौर लोकसभा सीट से 2014 में चुनाव हार चुके हैं। बुलंदशहर लोकसभा सीट से गठबंधन प्रत्याशी योगेश वर्मा भी 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। इस बार लोकसभा में किस्मत आजमा रहे हैं।

अजित और जयंत चौधरी को भी चाहिए जीत का टॉनिक
आरएलडी मुखिया अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी की निगाहें भी 23 को आने वाले रिजल्ट पर हैं। जाटलैंड में अपनी पार्टी का जनाधार होने का दावा करने वाले पिता-पुत्र 2014 में लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते हार गए थे। अजित सिंह बागपत में पूर्व पुलिस अफसर सत्यपाल सिंह और जयंत चौधरी मथुरा से सिने तारिका हेमा मालिनी से पराजित हो गए थे। अजित फिलहाल मुजफ्फरनगर और जयंत बागपत लोकसभा सीट से इस बार गठबंधन के कैंडिडेट हैं। उनके सामने कांग्रेस ने भी अपनी उम्मीदवार नहीं उतारे हैं।

काउंटिंग का प्लान

इस बार मतगणना प्रक्रिया में थोड़ा बदलाव होने से रुझान और परिणाम में देरी मुमकिन है। काउंटिग के एक राउंड की घोषणा और शीट चस्पा होने के बाद ही दूसरे राउंड की गिनती शुरू होगी। इससे एक लोकसभा सीट का नतीजा आने में 10 से अधिक घंटे लग सकते हैं। हर विधानसभा क्षेत्र के पांच-पांच बूथों की वीवीपैट की पर्ची गिनने में भी वक्त लगेगा। जिला निर्वाचन अधिकारी अनिल डींगरा के मुताबिक, पोस्टल बैलेट में क्यूआर कोड की स्कैनिंग, वीवीपैट की पर्चियों की गिनती और मिलान होगा।

दरअसल, चुनाव आयोग चाहता है कि काउटिंग में जल्दबाजी न हो। प्रत्याशियों या एजेंट की हर शंका दूर की जाए। दरअसल, सबसे पहले पोस्टल बैलेट गिने जाएंगे। पहली बार क्यूआर कोड का इस्तेमाल होगा। सबसे पहले 13-सी फिर 13-ए और अंत में 13-बी लिफाफा खोला जाएगा। उसके बाद ईवीएम खोली जाएगी। माना जा रहा है कि पहले राउंड में 40 से 45 मिनट और अन्य राउंड में 20 से 30 मिनट लग सकते हैं।

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