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'हिंदी में फिल्म स्क्रिप्ट मांगने पर आप हंसी के पात्र बन जाते हैं'

अगर मैं हिंदी की स्क्रिप्ट की डिमांड करता, तो मुझे डांट पड़ जाती। हिंदी की स्क्रिप्ट मांगने पर आप हंसी के पात्र बन जाते हैं, तो इस डर से मैं हिंदी में स्क्रिप्ट मांगता ही नहीं था...

नवभारत टाइम्स 15 Mar 2016, 1:25 pm
Shubham.Tripathi@timesgroup.com
नवभारतटाइम्स.कॉम interview with pankaj tripathi
'हिंदी में फिल्म स्क्रिप्ट मांगने पर आप हंसी के पात्र बन जाते हैं'


'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बाद ऐक्टर पंकज त्रिपाठी के करियर ने रफ्तार पकड़ी और फिर उन्होंने 'फुकरे', 'मसान', 'मांझी' और 'दिलवाले' जैसी कई बड़ी और बेहतरीन फिल्मों में काम किया। खास बात यह है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए पंकज कभी फिल्मों में काम नहीं करना चाहते थे। इस बातचीत में पंकज ने हमसे अपने जीवन के संघर्षों से जुड़ी कई बातें साझा कीं :

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ऐक्टिंग की ट्रेनिंग ईश्वर ने करवाई

मुझे सिनेमा, ग्लैमर, थिऐटर, ऐक्टर वगैरह का बचपन से कोई शौक नहीं था और न ही मैं फिल्में देखता था। मेरा कोई ड्रीम ही नहीं था ऐक्टर बनने का। जब मैं दसवीं क्लास में था, तब तो मैंने पहली बार ट्रेन देखी थी। दसवीं के बाद परिवार ने मुझे पटना भेज दिया, ताकि मैं आगे की पढ़ाई करते हुए डॉक्टरी की कोचिंग ले सकूं। पटना की दुनिया गांव से काफी अलग थी। वहां मैं कुछ सामाजिक किस्म का आदमी बन गया और एक छात्र संगठन से जुड़ गया। उसमें मुझे भीड़ जुटाने का काम दिया गया था। मैं गांव में खेलकूद भी करता था, कॉलेज के स्पोर्ट्स इवेंट्स में भी हिस्सा लेता रहता था। शूटिंग में मैंने नैशनल लेवल पर खेला है। स्पोर्ट्स में मेरी फिजिकल ट्रेनिंग चल रही थी और छात्र संगठन में बोलने की ट्रेनिंग चल रही थी। एक ऐक्टर के लिए ये दोनों ट्रेनिंग काफी मायने रखती हैं। अब तो लगता है कि मेरी ट्रेनिंग खुद ईश्वर ही करवा रहे थे।

जेल में मिला नुक्कड़-नाटक वालों से

एक छात्र आंदोलन के दौरान मैं जेल गया, जहां मुझे कुछ लड़के मिले, जो नुक्कड़-नाटक करते थे। उनके साथ दोस्ती हो गई और फिर उन्हीं के साथ पहली बार इन सब चीजों के बारे में जानकारी मिली। पटना में पहली बार नाटक देखा और वह इतना अच्छा लगा कि मुझे रोना आ गया। उसके बाद तो पटना में होने वाला कोई भी थिऐटर शो मैंने नहीं छोड़ा और फिर उसी दौरान मेरा ऐक्टिंग की ओर झुकाव होने लगा। फिर घरवालों का दवाब आया कि रोजी-रोटी के लिए कुछ कर लो, तो वहीं एक इंस्टिट्यूट से होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर लिया। उसके बाद पटना के एक बड़े होटल में कुक बन गया, लेकिन वहां भी कुछ मजा नहीं आया।

फिल्मों में काम नहीं करना चाहता था

होटल में जॉब के दौरान मुझे अहसास हुआ कि ऐक्टिंग में मैं अपने इमोशंस जाहिर कर सकता हूं। तब तक मैं थोड़ी-थोड़ी ऐक्टिंग करने लगा था, तो एनएसडी (नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) में भी सिलेक्शन हो गया। वहां से सीखने के बाद पटना लौटा, क्योंकि मेरा पहला शौक थिऐटर ही था। मैं फिल्मों में काम नहीं करना चाहता था, मगर हिंदी क्षेत्र में आप सिर्फ थिऐटर करके अपनी रोजी-रोटी नहीं चला सकते हैं और यह बात जल्द ही मेरी समझ में आ गई थी। तब मुझे मुंबई आना पड़ा ताकि ऐक्टिंग के जरिए अपनी रोजी-रोटी चला सकूं।

बस में जाता था ऑडिशंस देने

शुरुआत में मैं मुंबई आया, तो सीखने में वक्त लगा कि यहां का चाल-चलन कैसा है। यहां माथे पर नहीं लिखा होता है कि आप टैलंटेड हो। जब आपको कोई मौका मिलेगा, तभी आपका टैलंट दिखेगा। दूसरी बात, मौका भी ऐसा होना चाहिए जिसमें टैलंट दिखाने की कुछ पॉसिबिलिटी हो। तो मेरी भी यही लड़ाई थी। मैं दर-दर भटकता था, लेकिन मैं इस स्ट्रगल के लिए तैयार था। मैं जब ऑडिशन पर जाता था, तो कुछ लोग लंबी गाड़ियों में मेकअप करके आते थे, जबकि हम तो बस में जाते थे, पसीने से लथपथ होकर पहुंचते थे और कपड़े भी इतने अच्छे नहीं होते थे, लेकिन जिसके पास प्रतिभा, मेहनत और डेडिकेशन है और जो अपने काम को लेकर फोकस्ड हैं, वे अपनी प्रतिभा दिखा ही लेते हैं। मेरे साथ जो हुआ मैं उसके लिए तैयार था और मुझे उससे किसी तरह की शिकायत नहीं है। हालांकि, पहले चांस के लिए मुझे ज्यादा पापड़ तो नहीं बेलने पड़े। मुंबई आकर भी छोटा-मोटा रोल मिल जाया करता था, लेकिन जल्दी से कुछ बड़ा काम मिल नहीं रहा था।

किरदारों की वजह से निगेटिव इमेज बनी

ज्यादा फिल्मों में नेगेटिव किरदार निभाने की वजह से मेरी इमेज ही नेगेटिव बन गई है। कई बार मुझे ऐसे लोग मिलते हैं, जो उस इमेज की वजह से मुझसे बात करने में भी संकोच करते हैं। फ्लाइट में लोग मिलते हैं, तो शुरू में तो बात ही नहीं करते। फिर धीरे-धीरे बात शुरू करते हैं और जर्नी खत्म होने तक कहते हैं कि आपके बारे में हमने क्या सोचा था और आप उससे कितने अलग निकले। अभी होटल में मैं एक फैन से मिला। वह मुझसे बोला कि जब आप बात कर रहे थे, तो लग रहा था कि अभी थोड़ी देर में आप अपनी जेब से बंदूक निकाल कर गोली चला दोगे। तब मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैं तो ऐक्टर हूं, मगर मेरी ऐसी इमेज क्यों बन रही है। आप मेरी फिल्म 'ग्लोबल बाबा' देखेंगे, तो आपका नजरिया ही बदल जाएगा। 'मसान' में भी मैं एक सीधा-सादा क्लर्क बना हूं। यह जरूरी नहीं है कि अभिनेता जैसा पर्दे पर नजर आए, असल जिंदगी में भी वैसा ही हो।

हिंदी में स्क्रिप्ट मांगने वाला हंसी का पात्र

बॉलिवुड का हाल तो यह है कि आमतौर पर यहां हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट भी रोमन लैंग्वेज में लिखी जाती है, जबकि मुझे हिंदी फॉन्ट में पढ़ना ज्यादा अच्छा लगता है। मेरे हाथ में इस समय न्यूटन की स्क्रिप्ट देवनागरी लिपि में है, लेकिन यह सिर्फ पूरी यूनिट में मेरे पास ही है। बाकी सबके पास रोमन में लिखी हुई स्क्रिप्ट ही है। मैं हिंदी की स्क्रिप्ट जल्दी समझ लेता हूं, याद कर लेता हूं। हालांकि, अब मेरी वह पोजिशन बन गई है कि मैं हिंदी में लिखी स्क्रिप्ट की डिमांड कर सकूं। शुरू में तो यह हाल था कि अगर मैं हिंदी की स्क्रिप्ट की डिमांड करता, तो मुझे डांट पड़ जाती। हिंदी की स्क्रिप्ट मांगने पर आप हंसी के पात्र बन जाते हैं, तो इस डर से मैं हिंदी में स्क्रिप्ट मांगता ही नहीं था, लेकिन तब रोल छोटे-छोटे मिलते थे, तो स्क्रिप्ट में अपना रोल नोट करके उसे खुद ही हिंदी में लिख कर याद कर लिया करता था। यह सच है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले ज्यादातर ऐक्टर्स हिंदी में बात करने में कन्फर्टेबल महसूस नहीं करते, मगर उन्हें पता है कि मैं हिंदी फिल्म में काम कर रहा हूं और हिंदी ऑडियंस को ही फिल्म हिट करवानी है, तो इसलिए हिंदी ही बोलनी पड़ेगी। इंग्लिश को लेकर अपना डर दूर करने के लिए मैंने हाल ही में एक फिल्म 'मैंगो ड्रीम्स' में काम किया है।

जल्द बदलेगी मेरी इमेज

अभी मेरी कई फिल्में आ रही हैं जिनमें 'निल बटे सन्नाटा', 'लाइफ बिरयानी' और 'गुड़गांव' आदि शामिल है। इन सब फिल्मों में मैं बहुत अलग काम कर रहा हूं। सभी में मेरे किरदार अच्छे हैं। अभी 'न्यूटन' की शूटिंग कर रहा हूं, जिसमें मेरे साथ राजकुमार राव भी हैं। इसकी शूटिंग हम छत्तीसगढ़ में कर रहे हैं। 'न्यूटन' में मेरा किरदार बहुत अलग है। इसमें मैं सीआरपीएफ का कमांडेंट बना हूं।

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