फिल्‍म रिव्‍यू: अनेक

आयुष्मान खुराना,एंड्रिया केविचुसा,मनोज पाहवा,जेडी चक्रवर्ती,कुमुद मिश्रा
Hindi, Political, Thriller, Action2 Hrs 28 Min
क्रिटिक रेटिंग3.5/5पाठको की रेटिंग4.5/5
Authored byरेखा खान | नवभारतटाइम्स.कॉम 27 May 2022, 12:41 pm
'इंडियन कैसे होता है आदमी कैसे डिसाइड होता है' फिल्म 'अनेक' (ANEK Movie Review) का यह डायलॉग अपने आप में बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। 'अनेक' आपको मेन स्ट्रीम इंडिया और अलगाव की अंतर्धाराओं के साथ आमने-सामने लाता है जो पूर्वोत्तर के विभिन्न हिस्सों में मौजूद है। फिल्मकार के रूप में अनुभव सिन्हा (Anubhav Sinha) एक अरसे से अनछुए विषयों पर फिल्में बुनते है, जिनका सामाजिक सरोकार तो होता ही है, मगर उसमें कोई न कोई ऐसा मुद्दा जरूर होता है, जिसे अनदेखा किया गया हो। 'मुल्क', 'आर्टिकल 15' और 'थप्पड़' के बाद इस बार सिन्हा नॉर्थ ईस्ट के उन तमाम राज्यों की और हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं, जो सालों से अलगाववादी राजनीति से प्रभावित रहे हैं। फिल्म में अनुभव हमें यहां के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव, सरकार का रवैया और अलगाववादी ताकतों के चित्रण के साथ उस दुनिया में ले जाते हैं, जिसके बारे में हमारी जानकारी सीमित है। फिल्‍म में आयुष्‍मान खुराना (Ayushmann Khurrana) लीड रोल में हैं। मौजूदा वक्‍त में एक ऐसे ऐक्‍टर, जिनका पर्दे पर होना ही कुछ नया और अलग की गारंटी लगती है।

कहानी (ANEK Story)
'अनेक' की कहानी एक अलगाववादी समूह के साथ नॉर्थ ईस्ट में शांति संधि पर बातचीत करने के प्रयासों पर आधारित है, एक ऐसी प्रक्रिया जो बिना किसी निष्कर्ष के दशकों से चली आ रही है। जोशुआ उर्फ अमन (आयुष्मान खुराना) एक अंडरकवर एजेंट है, जो गुप्त रूप से एक समानांतर अलगाववादी शख्स तैयार करता है।असल में उसे उसके सीनियर अबरार बट्ट (मनोज पाहवा) की ओर से वहां ऐसे हालात पैदा करने के लिए भेजा जाता है, जिसके आधार पर अलगाववादी ताकतें सरकार से शांति वार्ता के लिए मजबूर हो जाएं। उसका मुख्य मिशन है बागी नेता टाइगर संघ (लोइटोंगबाम डोरेंद्र) को बातचीत के लिए तैयार करना, मगर इस पूरी प्रक्रिया में अमन को अहसास होता है कि सब कुछ उतना काला और सफेद नहीं है जितना उसने शुरू में सोचा था। वह वहां मुद्दों ही नहीं बल्कि स्थानीय लोगों से भी खुद को जज्बाती रूप से जुड़ा हुआ पाता है, जो एक एजेंट के रूप में उसे अपने मिशन से अलग राह पर ले जा सकता है।


जोशुआ एडो (एंड्रिया केविचुसा) की ओर आकर्षित हो जाता है। भेदभाव होने के बावजूद एंड्रिया को इंडिया के लिए विश्व स्तर पर मुक्केबाजी के लिए मेडल जीतना है, जबकि अलगाववादी विचारधारा रखने उसके पिता का मानना है कि इतने भेदभाव के बाद वो खुद को इंडियन कैसे मान सकता है? अपने फर्ज और जज्बात की लड़ाई के बीच अमन किसका साथ देगा? क्या सरकार नॉर्थ ईस्ट में शांति वार्ता में सफल होगी? क्या एडो इंडिया के लिए गोल्ड मेडल ला पाएगी? इन तमाम सवालों का जवाब आपको फिल्म देखने के बाद मिलेगा।

रिव्‍यू (ANEK Review)
निर्देशक के रूप में अनुभव सिन्हा अलग तरह के नैरेटिव के साथ पेश होते हैं। देश के लिए काम करने वाले अंडरकवर एजेंट आयुष्मान के जरिए वे लगातार एक के बाद एक सवाल करते जाते हैं? जो हमें कई बार बेचैन भी कर देते हैं। एक प्रश्न जो आपको कोंचता जरूर है, ' क्या आप नॉर्थ ईस्ट के सभी राज्यों को मैप पर पहचान सकते हैं यदि नाम हटा दिए गए तो? फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा धीमा है। निर्देशक के रूप में अनुभव सिन्हा ने फिल्म में अपने किरदारों के माध्यम से कहानी को कई परतें दी हैं, जो वहां के स्थानीय और राजनैतिक संघर्ष को दर्शाती हैं। निर्देशक ने क्षेत्रीय बोली, बैकग्राउंड स्कोर, लोक गीतों और सिनेमाटोग्राफी के जरिए कहानी को और ज्यादा मजबूत बनाया है। फिल्म का विजुअल टोन कमाल का है। मगर हां, फिल्म आपको बहुत ध्यान से देखनी होगी वरना यह आपको जटिल लग सकती है। क्लाईमैक्स का डायलॉग विचार प्रेरक है, 'ये पीस किसी को चाहिए ही नहीं, वरना सालों से इतनी छोटी प्रॉब्लम सॉल्व नहीं हुई होती?'

अमन उर्फ जोशुआ के रूप में आयुष्मान खुराना को एक ऐसे एंग्री यंग मैन के रूप में देखा जा सकता है, नॉर्थ ईस्ट को लेकर उनके सवाल परेशान करते हैं। हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर अमन की कश्मकश कमाल की है। अपनी इस भूमिका में अपनी बॉडी लैंग्वेज, एक्सप्रेशन और संवादों के जरिए आयुष्मान बाजी मार ले जाते हैं। नॉर्थ ईस्ट की अभिनेत्री एंड्रिया को बॉलिवुड मूवी में मेन लीड में देखना सुखद लगता है। उन्होंने अपने आक्रोश के जरिए खुद के साथ होने वाले भेदभाव और इंडिया का प्रतिनिधित्व करने वाले जूनून को बखूबी निभाया है। मनोज पाहवा अबरार बट्ट की भूमिका में अलग रंग पेश करते हैं। कुमुद मिश्रा, लोइटोंगबाम दोरेंद्र और जेडी चक्रवर्ती जैसे कलाकारों ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है।
क्यों देखें-नॉर्थ ईस्ट के अंदरूनी संघर्ष और सामाजिक राजनीतिक मुद्दों को जानने के लिए ये फिल्म देखनी चाहिए।
लेखक के बारे में
रेखा खान
रेखा खान टाइम्स समूह के नवभारत टाइम्स में फीचर्स एंड एंटरटेनमेंट एडिटर हैं। उन्हें प्रसिद्ध प्रकाशनों, पत्रिकाओं और रेडियो में काम करते हुए दो दशक से भी ज्यादा का समय हो गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए उन्हें स्त्री शक्ति पुरस्कार, पावर ऑफ पेन, मोस्ट इंस्पायरिंग वुमन इन जर्नलिज्म, मोस्ट पावरफुल वुमन इन मीडिया जैसे कई पुरस्कारों से नवाजा गया है। जर्नलिज़म के अलावा रेखा को लिखना और पढ़ना भी बहुत पसंद है। उन्होंने 'कोई सपना न खरिदो' नामक एक गुजराती उपन्यास लिखा है। वह एक बहुत अच्छी वक्ता और एंकर हैं। टीवी शोज की एंकरिंग के साथ-साथ वह अभिनय में भी अपना हुनर दिखा चुकी हैं।... और पढ़ें

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