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देश में चीन का बहिष्‍कार, पर भारतीय स्‍टार्टअप के लिए वरदान बना ड्रैगन

चीनी सामानों का बहिष्‍कार करने संबंधी मेसेज वॉट्सऐप सहित तमाम सोशल साइट्स पर वायरल हो गए थे। चीन द्वारा एनएसजी में भारत की एंट्री का विरोध सहित कई मुद्दे थे, जिनसे चीन के खिलाफ गुस्‍से का माहौल था। लेकिन एक सेक्‍टर ऐसा हैं जहां भारत और चीन के बीच नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं। यह सेक्‍टर है स्‍टार्टअप का।

टाइम्स न्यूज नेटवर्क 20 Nov 2016, 3:56 am

हाइलाइट्स

• चीनी कंपनियां भारतीय स्‍टार्टअप्‍स में खूब पैसा निवेश कर रही हैं।
• यह निवेश बाकी एशियाई देशों की कंपनियों के मुकाबले काफी अधिक है।
• एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि चीनी कंपनियां भारतीय बाजार को अच्‍छी तरह समझती हैं।
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देश में चीन का बहिष्‍कार, पर भारतीय स्‍टार्टअप के लिए वरदान बना ड्रैगन
बेंगलुरु
दिवाली से पहले चीनी सामानों का बहिष्‍कार करने संबंधी मेसेज वॉट्सऐप सहित तमाम सोशल साइट्स पर वायरल हो गए थे। चीन द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की एंट्री का विरोध, आतंकी मसूद अजहर पर बैन को लेकर साथ नहीं देना सहित कई मुद्दे थे, जिनसे चीन के खिलाफ गुस्‍से का माहौल था। लेकिन एक सेक्‍टर ऐसा हैं जहां फिलहाल भारत और चीन के बीच नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं। यह सेक्‍टर है स्‍टार्टअप का।

चीन ने मिल रहा बड़ा निवेश
भारतीयों द्वारा शुरू किए जा रहे स्‍टार्टअप में चीनी फर्म और कंपनियां खूब पैसा निवेश कर रही हैं। अमेरिका की तरफ से निवेश में कमी आने के बाद चीनी कंपनियों की तरफ से मिल रहा यह निवेश काफी अहम भी है। चीन की बड़ी कंपनी पेइचिंग मितेनो कम्‍युनिकेशन टेक्‍नॉलजी ने इस साल टेक्‍नॉलजी स्‍टार्टअप के मामले में सबसे बड़ा अध‍िग्रहण किया है। उसने मुंबई स्थित कंपनी डायरेक्‍टी की सहायक कंपनी मीडिया डॉट नेट का 90 करोड़ डॉलर (करीब 6134 करोड़ रुपये) में अधिग्रहण किया है। इस कंपनी के संस्‍थापक दो भाई भवीन और दिव्‍यांक तुराखिया हैं।

यहां आया इतना निवेश
ईकॉमर्स के मामले में दुनिया की दिग्‍गज चीनी कंपनी अलीबाबा ने भारतीय स्‍टार्टअप पेटीएम और स्‍नैपडील में काफी बड़ा निवेश किया है। इसके अलावा अमेरिका के कैब सर्विस प्रवाइडर उबर की तरह ही चीन के डीडी चशिंग ने ओला में निवेश किया है। इंटरनेट की बड़ी कंपनी टेनसेन्‍ट ने हाल में ही मेसेजिंग ऐप हाइक में 17 करोड़ 50 लाख डॉलर (करीब 1158 करोड़ रुपये) का निवेश किया। इससे पहले उसने हेल्‍थकेयर सॉल्‍यूशन फर्म प्रैक्‍टो में 9 करोड़ डॉलर (करीब 613 करोड़ रुपये) का निवेश किया था। साथ ही उसने दक्षिण अफ्रीका के अपने जॉइंट वेंचर नैस्‍पर्स के जरिए ऑनलाइन ट्रैवल फर्म इबीबो ग्रुप में भी काफी पैसा निवेश किया था।

चीनी कंपनियों की अहम भूमिका
इबीबो के फाउंडर आशीष काश्‍यप ने कहा, 'दोनों देशों की जनसांख्यिकी में समानताएं हैं और दोनों ही देशों में डिजिटल फर्म्‍स के लिए उपभोक्‍ताओं की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है। इसके अलावा, चीनी प्‍लेयर्स मार्केट बनाने और डिजिटल कंपनियों को चलाने के मामले में काफी अनुभवी होते हैं। इसलिए, सिर्फ निवेशक बने रहने से इतर वे काफी अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।' इसे अलीबाबा के उदाहरण से समझा जा सकता है जो पेटीएम को कई मोर्चों पर मदद मुहैया करा रही है।

बाकी देशों से चीनी निवेश ज्‍यादा
भवीन तुराखिया ने कहा कि अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले चीनी कंपनियां भारतीय बाजार को अच्‍छी तरह समझती हैं। ऐसा इसलिए कि भारतीय बाजार कमोबेश चीनी बाजार की तरह की विकास के रास्‍ते पर है। भारतीय स्‍टार्टअप में चीनी कंपनियां जितना निवेश कर रही हैं, उसके मुकाबले बाकी एशियाई देशों की कंपनियों का निवेश कुछ भी नहीं है। जापान का सॉफ्टबैंक और सिंगापुर का तेमासेक सिर्फ वैसी गिनी-चुनी नॉन चाइनीज कंपनियां हैं जिन्‍होंने भारत में निवेश किया है।

यह है वजह
चीनी कंपनियां भारतीय बाजार में इतना क्‍यों निवेश कर रही हैं, इसके पीछे संभवत: दो कारण हो सकते हैं। पहला, चीन की बहुत सारी कंपनियां ऐसी हैं जो अपने देश में जबर्दस्‍त मुनाफा कमा रही हैं। दूसरा, चीनी अर्थव्‍यवस्‍था में गिरावट आई है। इसलिए वे अपनी सरप्‍लस कमाई को भारत में निवेश कर रहे हैं जो आने वाले दिनों में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा डिजिटल मार्केट बनने की राह पर है।

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