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OPINION : एक वर्ग की कट्टरता का समर्थन और दूसरे की आस्था का मजाक...दवा के नाम पर जहर घोल रहे लिबरल कब लेंगे सबक

सऊदी अरब और यूएई जैसे कट्टर इस्लामिक देश भी अब सुधारों की राह पर चलने लगे हैं लेकिन भारत में ऐसा क्यों नहीं हो रहा? इसके लिए लिबरल्स का पाखंड भी कम गुनहगार नहीं है। तीन तलाक से लेकर हिजाब जैसे मामले में इनका पाखंड जगजाहिर है।

Written byचन्द्र प्रकाश पाण्डेय | नवभारतटाइम्स.कॉम 19 May 2022, 10:56 pm
ज्ञानवापी सर्वे का मामला सुर्खियों में है। उसके हवाले से हिंदू पक्ष दावा कर रहा है कि ज्ञानवापी मस्जिद के वजूखाने में शिवलिंग मिला है। मस्जिद के भीतर हिंदू संस्कृति के तमाम प्रतीक मिले हैं। दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष का दावा है कि जिसे शिवलिंग बताया जा रहा, वह तो एक फव्वारा है। इन सबके बीच सोशल मीडिया पर बेहद भौंडेपन का परिचय देते हुए शिवलिंग का उपहास उड़ाने वाली तस्वीरें धड़ाधड़ शेयर की जाने लगी।
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ज्ञानवापी में शिवलिंग पाए जाने के दावे को खारिज करने के नाम पर हिंदू आस्था और करोड़ों लोगों के आराध्य महादेव का मजाक उड़ाने में सिर्फ वे नहीं थे जिन्हें जाहिल कहकर खारिज किया जा सके। इनमें प्रोफेसर भी थे तो पत्रकार भी। इंजीनियर भी थे तो अन्य प्रोफेशनल्स भी। वे लोग जिन्हें समाज बुद्धिजीवी कहता था, उनकी ये हरकतें! ये पूरा एपिसोड तथाकथित लिबरल्स के दोमुंहेपन का आईना है। अयोध्या से लेकर ज्ञानवापी मुद्दे तक लिबरल सबक लेने को तैयार नहीं। एक वर्ग की कट्टरता का समर्थन और दूसरे की आस्था का मजाक इनका मंत्र बन चुका है। एंटी-हिंदू होना जैसे लिबरलिज्म का पैमाना बन चुका है।

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सोचिए, शिवलिंग का मखौल उड़ाने वालों में ज्यादातर लोग तो वे थे जो भारत तो छोड़िए दुनिया के किसी भी कोने में अपनी आस्था पर हल्के से भी आघात को लेकर सड़कों पर उतरकर 'सर धड़ से जुदा-सर धड़ से जुदा' का राग अलापने लगते हैं। इससे भी ज्यादा शर्मनाक ये रहा कि ऐसे कुत्सित सोच वाले लोगों के समर्थन में लिबरल कहे जाने वाले कई लोग भी उतर गए और हिंदू आस्था का सार्वजनिक अपमान करने लगे।

भारत का दुर्भाग्य है कि उदारवादी यानी लिबरल अपने नाम के ठीक उलट काम कर रहे हैं। जिनका काम समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाना होना चाहिए, वो एक वर्ग को कट्टरता के दलदल में धंसे रहने को मजबूर करने का यतन करते दिखते हैं। आजादी के नाम पर कुरीतियों तक का समर्थन करते हैं। स्कूलों में हिजाब का समर्थन आखिर क्या है? क्या इसके हिमायती लिबरल पर्दा प्रथा को जायज ठहराएंगे? घूंघट अगर स्त्रियों पर पुरुषवादी प्रभुत्व का प्रतीक है, बुराई है तो स्कूली बच्चियों का बुर्का पहनना प्रगतिशीलता कैसे? ऊपर से चॉइस का कुतर्क, जिसे जो पहनना हो, उसे चुनने की आजादी!

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सती और पर्दा प्रथा खत्म करने से लेकर विधवा पुनर्विवाह तक...हिंदू धर्म में कुरीतियों के खिलाफ धार्मिक सुधार आंदोलन का इतिहास रहा है। लेकिन दुर्भाग्य से इस्लाम में कोई धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं देखने को मिलता। सऊदी अरब और यूएई जैसे कट्टर इस्लामिक देश भी अब सुधारों की राह पर चलने लगे हैं लेकिन भारत में ऐसा क्यों नहीं हो रहा? इसके लिए लिबरल्स का पाखंड भी कम गुनहगार नहीं है। तीन तलाक से लेकर हिजाब जैसे मामले में इनका पाखंड जगजाहिर है। कानून की नजर में सभी नागरिक एक समान हो, पेनल कोड हो या सिविल कोड...सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हों, इससे बड़ी प्रगतिशीलता क्या हो सकती है, लेकिन लिबरल समान नागरिक संहिता तक का विरोध करते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर अलग-अलग पर्सनल लॉ क्यों?

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मजहबी कट्टरता का राजनीतिक पोषण भी एक बड़ी समस्या है। अगर एक खास वर्ग में धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं हो रहा तो इसके लिए उन राजनीतिक दलों का स्वार्थ भी कम जिम्मेदार नहीं जो बदलाव की कोंपले निकलने से पहले ही उसे नोच देती है। इन दलों की चिंता है कि अगर मुस्लिम जागरूक हो गए, मजहबी कट्टरता की बेड़ियों को तोड़ने लगे तो ये दल उन्हें अपने हिसाब से नहीं हाक सकेंगे। मुस्लिम समुदाय का सबसे ज्यादा नुकसान उनके तथाकथित हमदर्दों ने किया है। वरना समुदाय शैक्षिक और आर्थिक क्षेत्र में आखिरी पायदानों पर नहीं होता। मुस्लिम कट्टरपंथियों के राजनीतिक पोषण का सबसे बड़ा उदाहरण ऐतिहासिक शाह बानो प्रकरण है। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के पति को हर महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इस कदम ने सेकुलरिज्म की पवित्रता ही खत्म कर दी। सेकुलरिज्म और मुस्लिम कट्टरपंथियों के तुष्टीकरण की विभाजन रेखा ही मिटा दी। आज भी तमाम राजनीतिक दल और लिबरल उसी पाखंडी ढर्रे पर चल रहे हैं। अतीत से सबक लेने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं।

(डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
लेखक के बारे में
चन्द्र प्रकाश पाण्डेय
चन्द्र प्रकाश पाण्डेय अगस्त 2016 से नवभारतटाइम्स.कॉम में कार्यरत हैं। टीवी पत्रकारिता से शुरुआत कर डिजिटल जर्नलिज्म में कदम रखा। पूर्वी यूपी के एक गांव से ताल्लुक रखते हैं। सीखने-समझने का क्रम जारी है।... और पढ़ें

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