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J&K: राज्यपाल शासन लागू होने से आतंक के खिलाफ सेना को होगी खुली छूट

जम्मू-कश्मीर में रमजान सीजफायर खत्म करने और गठबंधन राजनीति की बाध्यता खत्म होने के बाद राज्यपाल शासन लागू होने से सुरक्षा बलों के पास आतंकियों के खिलाफ मोर्चा खोलने की पूरी छूट होगी।

टाइम्स न्यूज नेटवर्क 20 Jun 2018, 9:29 am
नई दिल्ली
नवभारतटाइम्स.कॉम Untitled design (3)

जम्मू-कश्मीर में रमजान सीजफायर खत्म करने और गठबंधन राजनीति की बाध्यता खत्म होने के बाद राज्यपाल शासन लागू होने से सुरक्षा बलों के पास आतंकियों के खिलाफ मोर्चा खोलने की पूरी छूट होगी। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर पुलिस पर भी स्थानीय नेताओं के दबाव में अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने का दबाव होता है, ऐसे में स्थानीय पुलिस भी स्वतंत्रता के साथ काम कर सकती है। साथ ही सुरक्षा बल और पुलिस इंटेलिजेंस इनपुट्स साझा कर बेहतर ढंग से काम करेंगे। यह जानकारी हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया को केंद्र सरकार के सीनियर अधिकारी ने दी है।

CASO, SADO फिर से लागू
सेना को उम्मीद है कि स्थानीय नेताओं का दबाव खत्म होने से स्थानीय पुलिस ज्यादा सक्रियता के साथ आतंक विरोधी गतिविधि में सेना का साथ दे सकती है। एक अधिकारी ने बताया कि गवर्नर रूल लागू होने के साथ ही जम्मू-कश्मीर पुलिस बिना किसी राजनीतिक प्रभाव के बेहतर स्थिति में होगी। पुलिस का खुफिया तंत्र बेहतर ढंग से काम करेगा और प्राप्त जानकारियों को सुरक्षा बलों के साथ शेयर किया जा सकेगा। अधिकारी ने बताया, 'रियल टाइम इन्फॉर्मेशन मिलने से आतंक के खिलाफ तेजी से कार्रवाई की जा सकती है।' सेना ने अपने अति सक्रिय CASO (कार्डन ऐंड सर्च) और SADO (सीक ऐंड डेस्ट्रॉय) ऑपरेशन को जम्मू कश्मीर में फिर से लागू कर दिया है। सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि अब इंटेलिजेंस इनपुट्स बेहतर तरीके से साझा हो सकेंगे। इसके अलावा घनी आबादी वाली जगहों पर सुरक्षा बलों की सक्रियता बढ़ाई जाएगी।

अक्रामक ऑफिसर आएंगे आगे
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'कुछ राजनेताओं की तरफ से पत्थरबाजों, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों को समर्थन मिलता है। कोई राजनीतिक दबाव न होने से सुरक्षा बल ज्यादा अक्रामकता से काम करेंगे।' माना जा रहा है कि अति संवेदनशील वाली जगहों पर 'समर्थ' ब्यूरोक्रेट्स और सुप्रींटेंडेंट्स ऑफ पुलिस की तैनाती की जाएगी, ताकि वे बगैर दबाव में आए आतंक विरोधी गतिविधियों का नेतृत्व कर सकें। अधिकारी ने बताया, 'फिलहाल कई ऐसे काबिल ऑफिसर हैं, जो साइड लाइन कर दिए गए हैं। आतंकी बुराहन वानी की मौत के बाद घाटी में स्थिति और खराब हो गई थी। ऐसे में अब उन ऑफिसरों को आगे लाकर आतंकियों को काउंटर करने की रणनीति पर काम हो सकता है।'

अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा होगी केंद्र बिंदु
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को सुरक्षा को लेकर उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की। केंद्र सरकार के सीनियर अधिकारी ने बताया, 'इस तरह के इनपुट्स हैं कि आतंकी अमरनाथ यात्रियों को निशाना बना सकते हैं। आशंका है कि आतंकी आईईडी अटैक कर सकते हैं। यदि ऐसा कुछ होता है तो बीजेपी को सरकार में की वजह से काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है। राज्यपाल शासन में केंद्र सरकार मजबूत सुरक्षा प्रबंध कर सकती है, साथ ही गठबंधन की राजनीति भी इसके आड़े नहीं आएगी।' लंबे समय से कश्मीर में रहने वाले गवर्नर एनएन वोहरा का कार्यकाल अगले महीने के अंत में खत्म हो रहा है, इसके बावजूद वे अपने पद पर बने रहेंगे। सूत्रों का कहना है कि गवर्नर श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड के चेयरमैन भी हैं, उनसे यात्रा खत्म होने तक पद पर बने रहने के लिए कहा गया है।

पत्थरबाजों पर और सख्ती
सेना के इन ऑपरेशंस के अलावा दक्षिण कश्मीर में पत्थरबाजों पर बड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है। अगर अतीत पर गौर करें तो यह देखने को मिलता है कि 2016 की हिंसा के दौरान कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार के दौरान 9 हजार से अधिक पत्थरबाजों पर केस दर्ज हुए थे। गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद महबूबा सरकार ने सैकड़ों पत्थरबाजों पर से मुकदमे वापस ले लिए थे। सरकार का कहना था कि युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए यह कदम उठाए गए हैं, जबकि विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि महबूबा ने श्रीनगर और अनंतनाग सीटों पर होने वाले उपचुनाव के मद्देनजर लोगों के समर्थन के लिए ऐसा किया था। इस फैसले के बाद बीजेपी सरकार को कई मोर्चों पर विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अब यदि राज्यपाल शासन की स्थितियां बनती हैं तो फिलहाल 2019 के चुनाव तक पत्थरबाजों पर कार्रवाई पर कोई सियासी दखलंदाजी नहीं होगी। इसके साथ-साथ ऐसे फैसले की स्थिति में देशभर में बीजेपी को इससे फायदा भी मिल सकेगा।

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