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रसोई पवित्र है तो लड़ाई की वजह भी: एसोसिएट प्रफेसर खालिद जावेद

'मैं यह भी सोचता रहा हूं कि घरों के बंटवारे के वक्त चूल्हा अलग हो जाता है। यानी रसोई के अलग हो जाने से घर बंट जाते हैं। तो मुझे लगा कि इतनी पवित्र जगह कहीं न कहीं लड़ाई और हिंसा की जड़ भी है।' पढ़ें जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उर्दू के एसोसिएट प्रफेसर खालिद जावेद का इंटरव्यू...

Edited byसरोज सिंह | नवभारत टाइम्स 3 Dec 2022, 11:24 am
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उर्दू के एसोसिएट प्रफेसर खालिद जावेद ऐसे अफसानानिगार हैं, जिन्होंने अपने लेखन से नई लीक बनाई है। फलसफे में गहरी दिलचस्पी उनकी साहित्यिक आलोचना और सृजन दोनों में झलकती है। 'गैब्रियल गार्सिया मार्केज' और 'मिलान कुंदेरा' पर आलोचना की किताबों के साथ ही उनकी कहानियों के तीन संग्रह और तीन उपन्यास छप चुके हैं। पिछले दिनों 'नेमतखाना' के अंग्रेजी अनुवाद 'पैराडाइज ऑफ फूड' को जेसीबी साहित्य पुरस्कार मिला। उनसे बात की प्रभात ने। पेश हैं अहम अंश:
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एसोसिएट प्रफेसर खालिद जावेद


'नेमतखाना' की रचना प्रक्रिया से ही बात शुरू करते हैं।
नेमतखाना नॉवेल सिर्फ नेमत यानी खाने के बारे में नहीं है, बल्कि कहना चाहिए कि यह पूरा नॉवेल एक तरह से फूड डिस्कोर्स भी है। खाना जिस तरह हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक या सामूहिक जीवन पर असर डालता है, उसके बारे में मैं लंबे समय से सोचता रहा हूं। रसोई मुझे हमेशा से हॉन्ट करती थी, मेरे बचपन से। छिपकर रसोई में जाता और कुछ न कुछ खाता रहता। चीनी हो, गुड़ हो, बासी रोटी का टुकड़ा हो या कुछ और। बार-बार यह महसूस होता था कि हमारी रसोई में जितने तरह के सामान रखे रहते हैं, वे एक तरह से बहुत ही बेदर्द किस्म के औजार भी हैं, कि ये सामान तो किसी किस्म की हिंसा के लिए भी बहुत आसानी से काम आ सकते हैं। रसोई एक तरह से जिंदगी की अहम जरूरत है, इतनी पवित्र जगह भी है कि हम नहा-धोकर वहां दाखिल होते हैं। हमारे भारतीय दर्शन में, वेदों-उपनिषदों में अच्छे और बुरे खानों के प्रभाव के बारे में बात की गई है। खाना अगर प्रेमभाव से पकाया और परोसा जाए तो यह खाने वाले की सेहत के लिए तो बेहतर होता ही है, मानसिक सुख भी देता है। मैं यह भी सोचता रहा हूं कि घरों के बंटवारे के वक्त चूल्हा अलग हो जाता है। यानी रसोई के अलग हो जाने से घर बंट जाते हैं। तो मुझे लगा कि इतनी पवित्र जगह कहीं न कहीं लड़ाई और हिंसा की जड़ भी है। दूसरी बात यह कि खाते वक्त हमारी जो इन्द्रियां काम करती हैं, बोलते समय भी हम उन्हीं का इस्तेमाल करते हैं। शायद जिसे हम दुनिया की सार्वभौमिक भाषा कह सकते हैं, वह भूख है। यही कुछ चीजें थीं, जो इस उपन्यास का आधार बनीं।

आपका यह उपन्यास कुछ आठ बरस पहले आया, पर इस विमर्श पर ताजा सिलसिला अंग्रेजी अनुवाद आने के बाद तेज हुआ है। भाषा और विमर्श के इस रिश्ते के बारे में आप क्या सोचते हैं?
'नेमतखाना' 2014 में छपा। उस जमाने में उर्दू में तो इस पर काफी चर्चा हुई। पाकिस्तान में यह उपन्यास अलग से छपा और वहां छपते ही इसके दो एडिशन खत्म हो गए। यहां भी इसके कई एडिशन छपे। बारां फारूकी ने बड़े मन और मेहनत से इसका अंग्रेजी तजुर्मा किया। आप यह भी कह सकते हैं कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है। जर्मन, फ्रेंच, चीनी या जापानी जबान के नॉवेल का जब तक अंग्रेजी अनुवाद नहीं होता, वह उस तरह से हमारी निगाह में नहीं आता। दोस्तोयव्स्की या टॉलस्टॉय को हमने रूसी भाषा में नहीं पढ़ा। मुझे लगता है कि 'नेमतखाना' के अंग्रेजी में आने के बाद इस पर ज्यादा चर्चा स्वाभाविक है।

'नेमतखाना' के अनुवाद का ख्याल किस तरह आया? बारां फारूकी ने इसे खुद चुना, या यह फैसला आपका था?
इसके उर्दू में छपने के बाद शम्सुर्रहमान फारूकी साहब ने इसे बहुत पसंद किया। उन्होंने एक सेमिनार में भी 'नेमतखाना' के हवाले से कहा और एक जगह लिखा कि 'नेमतखाना' जैसा नॉवेल उर्दू तो उर्दू, अंग्रेजी जबान में भी नहीं लिखा गया। एक बार उन्होंने कहा कि 'मौत की किताब' का भी अनुवाद होना चाहिए, लेकिन 'नेमतखाना' का इसलिए होना चाहिए कि मैंने बाहर की किसी भाषा में भी इस थीम के हवाले से इतनी गहराई के साथ कहीं लिखा नहीं पाया। उन्होंने ही कहा कि बारां को अच्छी उर्दू आती है, वह इसे कर सकती हैं। तो इस तरह से फारूकी साहब के कहने से उनकी बेटी बारां ने इस प्रॉजेक्ट को लिया।

आपकी कहानियों का तर्जुमा पहले भी होता रहा है, 'मौत की किताब' का भी अंग्रेजी तर्जुमा हुआ ही है। मगर 'नेमतखाना' की तरह की चर्चा उस पर देखने में नहीं आई।
अनुवाद तो मेरी लगभग सभी कृतियों का हो चुका है। केवल आलोचना की किताबें रह गई हैं। 'मौत की किताब' को लेकर आप यह जरूर कह सकते हैं कि उसमें कुछ कमियां रह गईं, हालांकि वो काम बड़ी मेहनत से किया गया। कमियां कुछ मेरी ओर से थीं और संभव है कि कुछ अनुवादक की ओर से रह गई हों। फिर उसको पब्लिशर अच्छा नहीं मिला। अब हम और हमारे अनुवादक उसे फिर से देख रहे हैं।

आपके किस्सों में कोई एक सूत्र तलाशना चाहे तो अंधेरा, उदासी और अकेलापन आसानी से मिल सकते हैं। ऐसी कहन के पीछे कोई खास वजह है या यह तारीकी अपने आप चली आती है?मेरी रुचि मनुष्य के अस्तित्ववादी आयामों में रही है। सुकरात ने कहा था कि अपने अंदर झांको। तो उस परम सत्य की ओर जाने वाला वाला रास्ता आप के अंदर से होकर ही गुजरता है। दुनिया का कोई दीन धर्म हो, अगर आप उसे अपने अंदर नहीं जगाते तो वह परम सत्य नहीं है। तो कोई रचना हो, वह आवश्यक रूप से अस्तित्ववादी तो होती ही है। सत्यम शिवम सुंदरम की बात यूं ही नहीं कह दी गई। दूसरी बात यह कि मैं न तो खुद तफरीह के लिए लिखता हूं और न ये चाहता हूं कि दूसरे लोग भी इसे तफरीह के लिए पढ़ें। मैं बने बनाए सौंदर्य बोध को थोड़ा-सा डिस्टर्ब करना चाहता हूं, उसके सामने एक समानांतर सौंदर्य बोध रखना चाहता हूं। तो ऐसे किरदारों को अगर फिक्शन जगह नहीं देगा तो कौन देगा।
लेखक के बारे में
सरोज सिंह
सरोज सिंह नवभारटाइम्स.कॉम में असिस्टेंट एडिटर हैं. 20 साल से पत्रकारिता में हैं और इनकी विशेषज्ञता ऑनलाइन मीडिया में है। लाइफस्टाइल और एंटरटेनमेंट जुड़ी खबरों में इनकी रुचि है और ये फ़ीचर टीम को लीड कर चुकी हैं. फिलहाल यह न्यूज टीम का हिस्सा हैं.... और पढ़ें

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