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हाई कोर्ट में जजों की खाली सीट भरने में लग सकते हैं 15 साल

देशभर के 24 हाई कोर्ट में जजों की मौजूदा 427 रिक्तियों को भरने में 15 साल लग सकते हैं। फिलहाल जिस रफ्तार से नियुक्तियां चल रही हैं और अगर यह मानें कि हर साल तकरीबन 75-85 जज रिटायर होंगे तो इन रिक्तियों को भरने में 15 साल लग सकता है।

टाइम्स न्यूज नेटवर्क 16 Sep 2018, 7:21 am
प्रदीप ठाकुर, नई दिल्ली
नवभारतटाइम्स.कॉम प्रतीकात्मक तस्वीर।
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देशभर के 24 हाई कोर्ट में जजों की मौजूदा 427 रिक्तियों को भरने में 15 साल लग सकते हैं। फिलहाल जिस रफ्तार से नियुक्तियां चल रही हैं और अगर यह मानें कि हर साल तकरीबन 75-85 जज रिटायर होंगे तो इन रिक्तियों को भरने में 15 साल लग सकता है।

हाई कोर्ट में जजों की कुल स्वीकृत संख्या 1079 है। फिलहाल कार्यरत जजों की संख्या 652 है। 31 अगस्त को हाई कोर्ट में स्वीकृत संख्या की तुलना में जजों की रिक्तियां 40 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई। फिलहाल 427 पद खाली हैं।

सुप्रीम कोर्ट की अनुशंसाओं के बाद एनडीए सरकार ने हाल के सालों में हाई कोर्ट में सर्वाधिक जजों की नियुक्ति की है। इसके बावजूद अगर जजों की रिटायरमेंट दर को देखा जाए तो तेज नियुक्तियां भी हर साल मात्र अतिरिक्त 29 जजों की बहाली कर पा रही हैं। अप्रैल 2015 से लेकर मई 2018 के बीच कानून मंत्रालय ने 313 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति को अधिसूचित किया है।

यह पिछले सात वर्षों के दौरान सर्वोच्च है। औसतन देखें तो हर साल 104 जज नियुक्त किए गए हैं। ज्यादा संख्या में जजों की रिटायरमेंट के लिहाज से अगर ये तेज नियुक्तियां नहीं हुई होतीं तो हालात और भी खराब होते। 2012 से लेकर 2014 के बीच यूपीए के शासनकाल में 250 जजों की नियुक्ति हुई थी। उस दौरान जजों की नियुक्ति का औसत हर साल मात्र 83 रहा।

हाई कोर्ट में जजों की वैकंसी लगातार बढ़ रही है। अक्टूबर 2017 में 387 जजों की वैकंसी थी। इस साल मार्च तक यह संख्या 406 हो गई। 31 अगस्त तक आते-आते इसमें और इजाफा हुआ और फिलहाल यह संख्या 427 है। अगले तीन सालों में हाई कोर्ट के औसतन 65 जज हर साल रिटायर होने वाले हैं।

अभी इसमें उन जजों को शामिल नहीं किया गया है जिनकी शुरुआती नियुक्ति 2 साल के लिए होती है और फिर पर्मानेंट पोजिशन के लिए विचार किया जाता है। न्यायपालिका में इतनी भारी रिक्तियां इसलिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि अकेले हाई कोर्ट में 39.52 लाख केस पेंडिंग हैं। इसमें से 22 फीसदी मामले 10 साल से पुराने हैं।

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