ऐपशहर

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला बोले - नया संसद भवन वक्त की जरूरत, विवाद अनावश्यक

ओम बिरला के बतौर लोकसभा स्पीकर शनिवार को दो साल पूरे कर लिए। बतौर स्पीकर दो साल के अनुभव पर उन्होंने कहा कि अनुभव काफी अच्छा और सहयोगात्मक रहा। इस दौरान सदन की उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ सदस्यों की भागीदारी भी बढ़ी।

Authored byमंजरी चतुर्वेदी | नवभारत टाइम्स 19 Jun 2021, 5:59 am

हाइलाइट्स

  • बिरला बोले- सदन में जन-अपेक्षाओं की ज्यादा भागीदारी से लोगों का भरोसा बढ़ेगा
  • संसद में टकराव कम करने के लिए संवाद को बढ़ाने की जरूरत पर दिया जोर
  • एलजेपी मामले पर कहा - जो भी किया, व नियम प्रक्रिया के मुताबिक ही किया
सारी खबरें हाइलाइट्स में पढ़ने के लिए ऐप डाउनलोड करें
नवभारतटाइम्स.कॉम om birla
नई दिल्ली
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला का कहना है कि नया संसद भवन वक्त की जरूरत है। इस पर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है। जब यह फैसला हुआ था, तब किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं की थी और अब जब इसका 15 से 20 फीसदी निर्माण कार्य हो चुका है तो उस पर आपत्ति की जा रही है और ऐसा स्थापित करने की कोशिश हो रही है कि इस पर जो खर्च हो रहा, उसकी वजह से देश के बाकी काम रुक गए हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। ओम बिरला के बतौर स्पीकर शनिवार को दो साल पूरे हो रहे हैं। एनबीटी के साथ उन्होंने स्पीकर के रूप में अपने अनुभव साझा किए। बातचीत के प्रमुख अंश :
सवाल : बतौर स्पीकर आपका दो साल का अनुभव कैसा रहा?
जवाब : अनुभव काफी अच्छा और सहयोगात्मक रहा। इस दौरान सदन की उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ सदस्यों की भागीदारी भी बढ़ी। पहले सत्र में ही मैंने अधिकतम सदस्यों को बोलने का मौका दिया। मौजूदा लोकसभा में अब तक की सबसे ज्याद संख्या में चुनकर महिलाएं पहुंची थीं। सरकार की तरफ से सकारात्मक पक्ष य रहा कि पहले जहां उसकी तरफ से 50 से 60 फ़ीसदी सवालों के जवाब आता था, अब वह बढ़कर कर 90 - 95 फ़ीसदी हो चुका है। इसमें सभी का सहयोग रहा।

सवाल : इन दो सालों में आपको क्या बेहतर लगा और कहां आपको इसमें अभी सुधार की महसूस हुई?
जवाब : हमारे पुराने माननीय अध्यक्षों ने जो मानदंड स्थापित किए, उनके चलते आज सदन की अपनी गरिमा है। हम चाहते हैं कि इनमें और बदलाव हो, ताकि देश की जनता का संसद के प्रति विश्वास बढ़े। सदन का माहौल ऐसा होना चाहिए कि जहां लोगों को लगे कि हमारी समस्याएं वहां पहुंचती हैं और उनका निराकरण होता है। सदन में जन-अपेक्षाओं की जितनी ज्यादा भागीदारी होगी, उतना ही लोगों का भरोसा बढ़ेगा। इसीलिए हमारी कोशिश होती है कि सदन बार-बार बाधित न हो।

सवाल : कई बार देखा गया है कि सदस्यों की कम उपस्थिति या गैरमौजूदगी के चलते सदन की कार्यवाही में सक्रियता से हिस्सा नहीं लिया जाता। ऐसा कई सदस्यों को लेकर देखा जाता है, सदस्य सदन में भी आएं और सक्रियता भी दिखाएं, इसके लिए क्या कोई कदम आपकी तरफ से उठाए गए हैं?
जवाब : मैंने शुरू से ही सभी सदस्यों से आग्रह किया कि वह सदन में अपनी बात रखें। पहले सत्र से ही मैंने लोगों को ज्यादा से ज्यादा बोलने का मौका दिया। कई सदस्यों को अभ्यास नहीं था, बोलने में संकोच होता था तो मैंने उनसे कहा आप बोलिए। नतीजा हुआ कि आज हमारे माननीय सदस्य खुलकर अपनी बात रख रहे हैं।

सवाल : हाल के सालों में देखा गया है कि सदन के भीतर सदस्यों के बीच टकराव बढ़ा है, इसकी क्या वजह देखते हैं?
जवाब : मुझे लगता है कि कुछ संवाद और बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि संवादहीनता न रहे। मेरी कोशिश रहती है कि संसद के भीतर और बाहर दोनों ही जगह चर्चा और संवाद बना रहे, ताकि किसी मुद्दे पर आपसी सहमति बन कर ठीक से चर्चा हो सके। इस कोशिश का नतीजा भी दिख रहा है।

सवाल : कई बार पक्ष विपक्ष में संवादहीनता की स्थिति संसदीय परिसर से बाहर की भी रहती है। क्या उसका असर सदन में दिखता है? क्या स्पीकर इसमें कोई भूमिका निभा सकता है?
जवाब : मैं इसीलिए समय-समय पर सत्र के दौरान सभी दलों की मीटिंग बुलाता हूं। बीच में अगर कोई व्यवधान होता है तो भी मैं सभी दलों को बुलाकर उसे दूर करने की कोशिश करता हूं, ताकि सदन निर्बाध चल सके।

सवाल : सदन के अंदर बैठक के दौरान अनुशासन बनाए रखने को क्या कुछ नियमों में बदलाव की आवश्यकता महसूस करते हैं?
जवाब : इस बारे में हमारे राज्यों के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में भी चर्चा हुई है। कई विधानसभाओं व संसद में नियम है कि सदस्य वेल में न आएं, प्ले कार्ड न दिखाएं, नारेबाजी न करें। सभी पीठासीन अधिकारी सभी पक्षों से बात करके इसे सदन में लागू करने की कोशिश करते हैं। सदन सबका है, इसलिए सबकी सहमति से चलना चाहिए। हमारी कोशिश रहती है कि सदन के भीतर सदस्य स्व-अनुशासन से चलें।

सवाल : संसदीय समितियों को लेकर अक्सर सदस्यों की शिकायत रहती है कि समय पर इनकी मीटिंग नहीं होती। सुनने में आया है कि ऐसी कोई योजना बन रही है कि समितियों की फील्ड विजिट या टूर को बंद किया जाए।
जवाब : ऐसा नहीं है। कोवि काल से पहले संसदीय समितियां टूर पर गई हैं। जिस भी कमिटि ने इजाजत मांगी, हमने इजाजत दी है। समितियां ही तय करती है कि उन्हें कब और कहां जाना है उसके बाद वह हमें अपनी रिकमंडेशन भेजती हैं, जिस पर इजाजत दी जाती है। हमने ऐसा कोई प्रस्ताव अस्वीकृत नहीं किया है। जहां तक समितियों की बैठक का सवाल है तो इसका फैसला उसके अध्यक्ष काे करना होता है। बैठक के लिए भी हमने कभी नहीं रोका। कोविड के दौरान भी कुछ लोगों ने वर्चुअल मीटिंग की मांग की थी, लेकिन हमारी मौजूदा नियम प्रक्रिया 266 के तहत समिति की कार्यवाही को गोपनीय रखना होता है, जब तक जरूरी ना हो उसे सार्वजनिक नहीं किया जाता। हमारे यहां नियम कमिटी के सदस्यों का मानना रहा है कि संसदीय समिति के भीतर मुद्दों पर दल से ऊपर उठकर चर्चा होनी चाहिए, ताकि कार्यपालिका और अधि जवाबदेही से काम कर सके। कई संसदीय समितियों की सिफारिशों को सरकार ने न सिर्फ माना है, बल्कि उन पर कानून भी बने हैं।

सवाल : विपक्ष की ओर से कई बार सदन में आसन पर पक्षपात का आरोप भी लगता है। इसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब : मुझे नहीं लगता कि सामान्य रूप से मेरे साथ ऐसा हुआ हो। मैंने सबको बराबर से अपनी बात रखने का समय और मौका दिया है।

सवाल : सेंट्रल विस्टा को लेकर काफी विवाद चल रहा है, नया संसद भवन भी जिसका हिस्सा है। क्या आपको लगता है कि नई संसद की अभी इतनी जरूरत है?
जवाब : नए संसद भवन की चर्चा बहुत दिनों से चल रही है। फिलहाल मौजूदा भवन दुनिया की सबसे बेहतरीन इमारत है, जो हमारे लोकतंत्र व संविधान की आस्था का केंद्र है। यहीं हमने आजादी देखी, यहीं संविधान बना। जब मौजूदा संसद भवन बना था तो न सिर्फ सदस्यों की संख्या कम थी, बल्कि उनकी जरूरतें भी कम थीं। बदलती जरूरतों के मुताबिक सदन के मूल ढांचे में तो बदलाव नहीं हुआ, लेकिन आंतरिक रूप स समय-समय पर काफी बदलाव हुआ है। फिर भी कई समस्याएं बनी हुई हैं- जैसे प्लास्टर का गिरना, पानी जमा होना, सीलन। इनके अलावा सदन में भी बैठने की जगह काफी कंजेस्टेड है, जिसे देखते हुए सबका मानना था कि इस इमारत को 100 साल हो गए हैं और बदलती जरूरतों को देखते हुए अब नई इमारत बननी चाहिए। इसी को ध्यान में रखते हुए नई बिल्डिंग बन रही है। गत 5 अगस्त को जब मैंने इसके बारे में बताया था, तब किसी ने भी इस मुद्दे को नहीं उठाया। उसके बाद इससे जुड़ी सामान्य प्रयोजन समिति की मीटिंग में भी किसी सदस् ने यह नहीं कहा कि बिल्डिंग नहीं बननी चाहिए। मेरे रिकॉर्ड में ऐसा कोई बिंदु नहीं है। अब जबकि काम शुरू हो चुका है, इस पर फैसला लिया जा चुका है तो इसे रोकना न्यायोचित नहीं होगा। नई इमारत को लेकर टेंडर प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसका 15 से 20 फीसदी काम हो चुका है, उसके बाद अब इस मुद्दे पर बात होना ठीक नहीं है। फिर देश के भीतर कंस्ट्रक्शन व इंफ्रास्ट्रक्चर के का रुके नहीं है। यह 971 करोड का प्रोजेक्ट है। ऐसा तो है नहीं कि इस 971 करोड़ के कारण सरकार के दूसरे काम रुक गए हों। देश तो चलता है। जहां तक कोविड की बात है तो सरकार ने इसके इलाज, टीकाकरण या राहत आदि के लिए जहां जैसी जरूरत थी, उसे मुहैया कराया ही है।

सवाल : एलजेपी के भीतर अभी जो आपसी विवाद की स्थितियां बनी हुई हैं, उसे देखते हुए दोनों ही पक्ष आप तक पहुंचे हैं। चिराग पासवान ने कहा है कि वह कोर्ट भी जा सकते हैं। अगर यह मामला कोर्ट जाता है तो क्या इससे विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति नहीं बनेगी?
जवाब : इस बारे में कोर्ट ने अभी तक कुछ कहा नहीं है। कोर्ट जाने का अधिकार सबको है। जहां तक इस मामले की बात है, तो हमने जो भी किया, व नियम प्रक्रिया के मुताबिक ही किया। एलजेपी के लोकसभा संसदीय दल के छह में से पांच सदस्य हमारे पास आए और उन्होंने अपनी मीटिंग की प्रोसिडिंग्स का ब्यौरा दिया। उनके सचेतक ने चिट्ठी दी और कहा कि बहुमत के आधार पर हमने यह फैसला किया है। हमने चिट्ठी में मौजूद हस्ताक्षरों का अपने रिकॉर्ड में मिलान करवाया। उसके मुताबिक हमने रिकॉर्ड में बदलाव किया। हमारे पास दोनों ही पक्षों से चिट्टियां आई है। दूसरे पक्ष से कोई आपत्ति आती है तो हम उसकी भी समीक्षा करेंगे। किसी राजनीतिक दल का कौन अध्यक्ष है या बनेगा, यह मेरा अधिकार क्षेत्र नहीं है।

अगला लेख

Indiaकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर