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पी के बनर्जी : अब केवल यादों में रहेगा देश का यह बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी

नयी दिल्ली, 22 मार्च :भाषा: क्रिकेट और हॉकी के कई दिग्गजों से भरे हमारे देश के खेल इतिहास में फुटबॉल के दिग्गज प्रदीप कुमार बनर्जी का नाम सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में शुमार है। विश्व फुटबॉल के नक्शे पर भारत ने जो गिनी चुनी सफलताएं हासिल की हैं उनमें पीके का एक बड़ा योगदान रहा। वह एशिया के एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्हें फीफा के सर्वोच्च सम्मान फीफा आर्डर ऑफ मेरिट से नवाजा गया। बंगाल रियासत, जिसे अब पश्चिम बंगाल कहा जाता है, के जलपाईगुड़ी में 23 जून 1936 को जन्मे प्रदीप कुमार की प्रारंभिक शिक्षा जलपाईगुड़ी जिला स्कूल में हुई और उसके बाद

भाषा 22 Mar 2020, 12:35 pm
नयी दिल्ली, 22 मार्च :भाषा: क्रिकेट और हॉकी के कई दिग्गजों से भरे हमारे देश के खेल इतिहास में फुटबॉल के दिग्गज प्रदीप कुमार बनर्जी का नाम सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में शुमार है। विश्व फुटबॉल के नक्शे पर भारत ने जो गिनी चुनी सफलताएं हासिल की हैं उनमें पीके का एक बड़ा योगदान रहा। वह एशिया के एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्हें फीफा के सर्वोच्च सम्मान फीफा आर्डर ऑफ मेरिट से नवाजा गया। बंगाल रियासत, जिसे अब पश्चिम बंगाल कहा जाता है, के जलपाईगुड़ी में 23 जून 1936 को जन्मे प्रदीप कुमार की प्रारंभिक शिक्षा जलपाईगुड़ी जिला स्कूल में हुई और उसके बाद उन्होंने जमशेदपुर स्थित के एम पी एम स्कूल से आगे की पढ़ाई की। पीके को भारतीय फुटबॉल के पर्याय के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने एक खिलाड़ी, कोच और मैनेजर के रूप में भारतीय फुटबॉल को जी-भर संवारने का काम किया और उसी का नतीजा है कि 1961 में जब अर्जुन अवार्ड की स्थापना की गई तो उन्हें सबसे पहले यह पुरस्कार प्रदान किया गया। उनके बाद भले ही सैकड़ों खिलाड़ियों को उनकी उपलब्धि के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया, लेकिन कतार में सबसे आगे पीके बनर्जी का नाम रहेगा। 15 वर्ष की आयु में पीके बनर्जी ने संतोष ट्राफी में बिहार का प्रतिनिधित्व किया और राइट विंग से खेले। 1954 में वह कोलकाता चले गए और आर्यन की तरफ से खेले। बाद में वह पूर्वी रेलवे की ओर से खेले। इस दौरान उनके खेल की ऐसी धूम रही कि 19 वर्ष का होते होते उन्होंने डक्का :अब ढाका: में खेले गए अन्तरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय फुटबॉल के लिए विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने के मौके कम ही आए हैं, लेकिन वह चाहे जकार्ता एशियाई खेलों में 1962 में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम हो या 1960 में रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ मैच बराबरी पर समाप्त करने वाली और या फिर क्वालालाम्पुर के मर्डेका कप में 1959 में रजत और 1964 में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम हो, पीके बनर्जी का नाम उसमें प्रमुखता के साथ शामिल रहा। उन्होंने भारतीय टीम में खिलाड़ी, कप्तान, कोच और तकनीकी निदेशक के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। उन्हें 1990 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया, लेकिन उनकी उपलब्धियों का सबसे बड़ा सम्मान उन्हें 2004 में मिला जब फीफा ने उन्हें अपने सबसे बड़े सम्मान फीफा आर्डर ऑफ मेरिट से नवाजा और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले वह एशिया के एकमात्र फुटबॉलर हैं। 20 मार्च को 83 वर्ष की आयु में वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों के कारण पी के बनर्जी का निधन हो गया। उनके निधन पर पूर्व और वर्तमान खिलाड़ियों ने शोक प्रकट किया और उस महान खिलाड़ी को अपने अपने अंदाज में श्रद्धांजलि अर्पित की जिसने फुटबॉल के चाहने वालों को मुस्कुराने के कई मौके दिए।

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