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कुछ अदालती फैसलों से लगता है जूडिशरी का हस्तक्षेप बढ़ा है: उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने बुधवार को कहा कि कुछ अदालती फैसलों से ऐसा जाहिर होता है जैसे कार्यपालिका के काम में जूडिशरी का दखल बढ़ रहा है। उन्होंने दिवाली पर पटाखों पर बैन और जजों की नियुक्ति में केंद्र को भूमिका देने से इनकार करने जैसे फैसलों का उदाहरण दिया।

भाषा 25 Nov 2020, 6:52 pm

हाइलाइट्स

  • उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कुछ फैसलों का उदाहरण देते हुए कहा है कि ऐसा लग रहा है कि न्यायपालिका का दखल बढ़ रहा
  • गुजरात के केवडिया में एक कार्यक्रम में नायडू ने पटाखों पर बैन जैसे अदालती फैसलों का दिया हवाला
  • उन्होंने कहा कि सरकार के तीनों अंगों- कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को एक दूसरे के काम में दखल नहीं देना चाहिए
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नवभारतटाइम्स.कॉम naidu
केवडिया (गुजरात)
पटाखों पर अदालत के फैसले और जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार करने का उदाहरण देते हुए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने बुधवार को कहा कि कुछ फैसलों से लगता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है। उन्होंने कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के तहत परिभाषित अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य हैं।
वह 'विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण समन्वय - जीवंत लोकतंत्र की कुंजी' विषय पर अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। नायडू ने कहा कि तीनों अंग एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किए बगैर काम करते हैं और सौहार्द बना रहता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इसमें आपसी सम्म्मान, जवाबदेही और धैर्य की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से ऐसे कई उदाहरण हैं जब सीमाएं लांघी गईं। नायडू ने कहा कि ऐसे कई न्यायिक फैसले किए गए जिसमें हस्तक्षेप का मामला लगता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा, 'स्वतंत्रता के बाद से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने ऐसे कई फैसले दिए जिनका सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों पर दूरगामी असर हुआ। इसके अलावा इसने हस्तक्षेप कर चीजें ठीक कीं। लेकिन यदा-कदा चिंताएं जताई गईं कि क्या वे कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं।' उन्होंने कहा, 'इस तरह की बहस है कि क्या कुछ मुद्दों को सरकार के अन्य अंगों पर वैधानिक रूप से छोड़ दिया जाना चाहिए।'

नायडू ने कुछ उदाहरण देते हुए कहा कि दिवाली पर पटाखों को लेकर फैसला देने वाली न्यायपालिका कलीजियम के माध्यम से जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार कर देती है। नायडू ने कहा, 'कुछ न्यायिक फैसलों से प्रतीत होता है कि हस्तक्षेप बढ़ा है। इन कार्रवाइयों से संविधान की तरफ से तय रेखाओं का उल्लंघन हुआ जिससे बचा जा सकता था।'

नायडू ने कहा कि कई बार विधायिका ने भी रेखा लांघी है। इसे लेकर उन्होंने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव को लेकर 1975 में किए गए 39वें सविधान संशोधन का जिक्र किया।

विधायिका के कार्यों में आ रही अकसर बाधाओं पर चिंता जताते हुए नायडू ने कहा कि लोकतंत्र के मंदिर की 'शालीनता, गरिमा और शिष्टाचार' को तभी बरकरार रखा जा सकता है जब तीन 'डी' --बहस (डिबेट), चर्चा (डिसकस) और फैसला (डिसाइड) का पालन किया जाए।

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