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बूथ कैप्चरिंग और बोगस वोटिंग करने वालों के खिलाफ कड़ाई से पेश आया जाएगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि बूथ कैप्चरिंग और बोगस वोटिंग के खिलाफ कड़ाई से निपटा जाएगा। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने पोलिंग बूछ पर हिंसा के दोषी की अपील खारिज करते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।

Authored byराजेश चौधरी | Edited byअनुराग कुमार | नवभारत टाइम्स 23 Jul 2021, 9:57 pm
नई दिल्ली
नवभारतटाइम्स.कॉम ty
सांकेतिक तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बूथ कैप्चरिंग या बोगस वोटिंग के किसी भी प्रयास को कड़ाई से से डील किया जाएगा, क्योंकि ये लोकतंत्र और कानून के राज को प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड में पोलिंग बूथ पर दंगा-फसाद करने के मामले में दोषी करार दिए गए शख्स की अपील खारिज करते हुए उक्त टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र और स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव संविधान के बेसिक फीचर का पार्ट है। चुनाव ऐसा मैकेनिज्म है जिससे जनादेश का पता चलता है। किसी को भी इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करे। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने पहले के फैसले का हवाला देते हुए कहा, 'अभिव्यक्ति के अधिकार में वोट देने की स्वतंत्रता शामिल है। मतदान की जो व्यवस्था है उसके तहत ये सुनिश्चित होना चाहिए कि हर वोटर अपनी मर्जी से बिना किसी दबाव के वोटिंग करे। ऐसे में बोगस वोटिंग या बूथ कैप्चरिंग का कोई भी प्रयास बेहद कड़ाई के साथ डील किया जाएगा।'

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि गुप्त मतदान लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है। लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव में गोपनीयता बहुत जरूरी है और लोकतंत्र में जहां सीधे चुनाव होते हैं वहां वोटर के मत का बहुत ज्यादा महत्व है। कोर्ट ने कहा कि ये सुनिश्चित होना चाहिए कि जो मतदाता हैं वह बिना किसी डर और भय के वोट करें क्योंकि अगर उनके मत के बारे में जानकारी उजागर हुआ तो उन्हें परेशान किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने कहा, 'लोकतंत्र और स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव संविधान के बेसिक फीचर का पार्ट है। चुनाव ऐसा मैकेनिज्म है जिससे जनादेश का पता चलता है। किसी को भी इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती है कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को खराब करने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है।' सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्मण सिंह नामक शख्स की अर्जी खारिज कर दी। उसे आईपीसी की धारा-147 यानी दंगा फसाद और 323 (चोट पहुंचाने) के मामले में दोषी करार दिया गया था जिस फैसले को उसने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
लेखक के बारे में
राजेश चौधरी
राजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें

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