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तमिलनाडु चुनाव 2021: राहुल गांधी पहुंचे तो संगठन में आई थी फुर्ती, जाते ही सुस्‍त पड़ी कांग्रेस

Tamil Nadu Elections 2021: प्रदेश में चुनाव की तैयारियों की स्थिति व असलियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हाइकमान ने राज्य को लेकर वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में ऑब्जर्वर्स की जो टीम बनाई थी, वो अभी एक बार भी राज्य में नहीं पहुंच पाई है।

Reported byमंजरी चतुर्वेदी | नवभारत टाइम्स 2 Mar 2021, 12:25 pm

हाइलाइट्स

  • तमिलनाडु कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं, अंर्तकलह से जूझ रही पार्टी
  • आपसी गुटबाजी और असंतोष से संगठन नहीं हो पा रहा एकजुट
  • पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गांधी के दौरे के बाद से फिर वैसे ही हालत हुए
  • प्रदेश कांग्रेस चीफ केएस अलागिरी के खिलाफ खासी नाराजगी
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नई दिल्ली
एक तरफ तमिलनाडु में चुनाव प्रकिया शुरू हो चुकी है तो दूसरी तरफ वहां कांग्रेस के घर में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा। प्रदेश कांग्रेस में आपसी गुटबाजी और खासा असंतोष है। जिसके चलते वहां कांग्रेस का चुनावी प्रचार अभियान तक जोर नहीं पकड़ पाया है। बताया जाता है कि पिछले दो-तीन महीनों से जहां राज्य में सत्तारूढ़ एआईडीएमके व डीएमके का प्रचार अभियान अपने पूरे जोरों शोरों पर है, वहीं कांग्रेस का अभियान सिरे ही नहीं चढ़ पाया। सूत्रों के मुताबिक, पिछले तीन दिन जब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य का दौरा कर रहे थे, उस दौरान जरूर माहौल बना।
प्रदेश अध्‍यक्ष के खिलाफ है नाराजगी
इससे पहले पहले भी राहुल के दौरे के आसपास कांग्रेस इकाई में तेजी देखने को मिली, लेकिन उसके बाद माहौल ठंडा दिखाई देने लगता है। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश इकाई में प्रदेशाध्यक्ष के एस अलागिरी के खिलाफ खासी नाराजगी है। इस नाराजगी के पीछे कई वजह हैं। जनवरी में चुनाव को देखते हुए कांग्रेस हाइकमान ने प्रदेश इकाई की लंबी चौड़ी टीम का ऐलान किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि अलागिरी की सलाह पर प्रभारी दिनेश गुंडूराव के साथ मिलकर सारी चीजें तय कीं। जिसमें प्रदेश के सीनियर नेताओं से कोई सलाह मशवरा नहीं किया गया था। उस समय कार्ति चिदंबरम ने तो बाकायदा इस बदलाव का विरोध तक किया था।

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जमीनी स्‍तर पर मजबूत नहीं हुई पार्टी
वहीं प्रदेश चीफ पर इस टीम में कुछ पद बेचने का आरोप भी लग रहे हैं। कहा जाता है कि जिस अलागिरी को आगे बढ़ाने में पूर्व केंद्रीय पी चिदंबरम की अहम भूमिका रही, वो भी आजकल उनके असंतुष्ट बताए जाते हैं। दूसरी ओर प्रदेशाध्यक्ष पर कई तरह के आरोप लग रहे हैं, जिनमें पैसे से जुड़े मामलों से लेकर उनके निजी कारणों को लेकर भी हैं। पार्टी में एक बड़ी नाराजगी है कि अलागिरी पिछले दो साल से कांग्रेस की कमान देख रहे हैं, लेकिन इस दौरान उन्होंने जमीनी स्तर पर पार्टी की मजबूती के लिए कोई काम नहीं किया।

वोट ट्रांसफर न होने का है डर
प्रदेश के एक नेता के मुताबिक, अगर दो सालों में जमीन पर पार्टी व काडर को मजबूत किया जाता तो उसका फायदा डीएमके साथ सीट शेयरिंग में होता। पार्टी मजबूत जमीन के आधार पर डीएमके पर दबाव डाल सकती थी। वहीं चर्चा है कि डीएमके कांग्रेस को 20 के आसपास सीट दे रही है, जो कांग्रेस को स्वीकार नहीं है। इसके पीछे वजह है कि अगर 10 फीसदी से कम सीट पर कांग्रेस तैयार होती है तो पार्टी को डर है कि उस स्थिति में वोट ट्रांसफर नहीं होगा। वह इधर आने की बजाय दूसरी ओर चला जाएगा। दूसरी ओर डीएमके का रुख देखकर उन तमाम उम्मीदवारों में नाराजगी है, जो अपने टिकट के लिए उम्मीद लगाए हुए हैं और पिछले काफी समय से अपने इलाकों में काम कर रहे हैं। वहीं पार्टीजनों के भीतर आशंका है कि इतनी कम सीटों में भी कुछ सीटें पैसों के बदले तय होंगी।

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असम जैसे राज्य में भूपेश बघेल की टीम पिछले एक महीने से लगातार दौरे व कार्यक्रम आयोजित कर रही है। प्रदेश के एक रणनीतिकार का कहना था कि यह टीम पिछले दिनों पुद्दुचेरी तक आकर लौट गई थी, जहां पिछले दिनों कांग्रेस की नारायणसामी सरकार संकट में थी।

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