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पैरेंट्स की बताई इन 5 आदतों से, दोस्‍तों और फैमिली में पॉपुलर हो सकता है आपका बच्‍चा

बच्‍चों की परवरिश का पहला जिम्‍मा पैरेंट्स का होता है और वही उसके पहले टीचर और दोस्‍त भी होते हैं। आप ही हैं जो अपने बच्‍चे को अच्‍छी चीजें सिखा सकते हैं। आपको अपने बच्‍चे को सोशल स्किल्‍स भी सिखाने होंगे जिससे उसके रिश्‍ते मजबूत हो सकें और वो एक बेहतर इंसान बन सके। इस आर्टिकल में कुछ ऐसे सोशल स्किल्‍स के बारे में बताया गया है जो पैरेंट्स को अपने बच्‍चे को सिखाने चाहिए।

नवभारतटाइम्स.कॉम 4 Feb 2022, 9:10 am
बेहतर रिश्‍ते बनाने के लिए अच्‍छे सोशल स्किल्‍स होना बहुत जरूरी होता है। आपको दोस्‍त बनाने हों या सहकर्मियों या परिवार के साथ कहीं बाहर जाना हो, अच्‍छे सोशल स्किल्‍स आपको हर जगह वाहवाही दिलाते हैं। बच्‍चों में सोशल स्किल्‍स डालने मुश्किल हो सकते हैं लेकिन बढ़ते हुए बच्‍चों के लिए यह बहुत जरूरी भी है।
नवभारतटाइम्स.कॉम 5 social skills that parents should teach their kids at an early age
पैरेंट्स की बताई इन 5 आदतों से, दोस्‍तों और फैमिली में पॉपुलर हो सकता है आपका बच्‍चा


कम उम्र में ही अगर बच्‍चे इस चीज को सीख जाएंगे, तो इसका फायदा उन्‍हें आगे चलकर भी होगा। ऐसे में 5 जरूरी सोशल स्किल्‍स हैं, तो हर पैरेंट्स को अपने बच्‍चे को सिखाने चाहिए। यहां हम आपको उन्‍हीं 5 सोशल स्किल्‍स के बारे में बता रहे हैं, जो पैरेंट्स को कम उम्र में अपने बच्‍चे को सिखानी चाहिए।

शेयरिंग

शेयरिंग ही केयरिंग है, बच्‍चों को शेयरिंग सिखाने से रिश्‍ते मजबूत हो सकते हैं। इससे बच्‍चे समझौता करना और निष्‍पक्ष रहना भी सीखते हैं। इससे बच्‍चों को यह सीखने में मदद मिलती है कि अगर वो दूसरों के लिए थोड़ा भी करते हैं, तो बदले में उन्‍हें भी कुछ मिल सकता है।

अध्‍ययनों की मानें तो दो साल की उम्र के बच्‍चे तभी कुछ शेयर करते हैं, जब उनके पास कुछ ज्‍यादा हो।

उम्र के हिसाब से शेयरिंग

वहीं तीन और छह साल के बच्‍चे थोड़े स्‍वार्थी होते हैं और सात या आठ साल के बच्‍चे दूसरों के साथ शेयर करते हैं और निष्पक्षता पसंद करते हैं।

फोटो साभार : istock

​सहयोग करना

सहयोग करने का मतलब है किसी लक्ष्‍य को पाने के लिए एक-दूसरे का सहयोग करना या तालमेल बिठाना। इस स्किल के साथ आप दूसरों के साथ अच्‍छे रिश्‍ते बना सकते हैं। इससे आप दूसरों की भावनाओं और विचारों को जानना भी सीखते हैं।

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​दूसरों की बात सुनना

बच्‍चों समेत कई लोगों में दूसरों की बात सुनने का सोशल स्किल नहीं होता है। सुनने का ये मतलब नहीं है कि दूसरे के बोलने पर आपको चुप रहना है बल्कि आपको उनकी बात सोचनी और समझनी है। बातचीत में बोलना ही नहीं बल्कि सुनना भी महत्‍वपूर्ण होता है।

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​पर्सनल स्‍पेस दें

हर रिश्‍ते की कुछ शारीरिक और भावनात्‍मक सीमाएं होती हैं। हर इंसान के लिए ये अलग हो सकती हैं और हमें इन्‍हें स्‍वीकार करना चाहिए। कई बार फ्रेंडली होने के चक्‍कर में ज्‍यादातर लोग अपनी सीमा को पार कर सकते हैं। फ्रेंडली होने का ये मतलब नहीं है कि आप किसी के पर्सनल स्‍पेस में दखल दें। अपने बच्‍चे को भी य‍ह स्किल सिखाएं और उसे अपने लिए भी कुछ सीमाएं बनाने के लिए कहें।
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​अच्‍छी आदतें

अच्‍छी आदतें दिखाना भी सोशल स्किल्‍स का हिस्‍सा हैं। कब थैंक्‍यू बोलना है, कब सॉरी, आपको ये बस अपने बच्‍चे को सिखाना होगा। स्‍कूल के अलावा घर पर पैरेंट्स को भी बच्‍चे में यह स्किल डालने की कोशिश करनी चाहिए।

इस आर्टिकल को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्‍लिक करें

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