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बच्चे को समय पर सुलाएं, मोटापे से बचाएं

एक रिसर्च से पता चला है कि जो बच्चे समय पर सोते हैं, समय पर जागते हैं, खेलने के लिए भी जिनका तय समय होता है, उनका कॉन्फिडेंस लेवल दूसरे बच्चों के मुकाबले हाई होता है। ऐसे बच्चे मोटापे से भी बचे रहते हैं। यही नहीं, इनकी सोच भी पाॉजिटिव रहती है।

नवभारतटाइम्स.कॉम 26 May 2017, 12:07 pm
एक रिसर्च से पता चला है कि जो बच्चे समय पर सोते हैं, समय पर जागते हैं, खेलने के लिए भी जिनका तय समय होता है, उनका कॉन्फिडेंस लेवल दूसरे बच्चों के मुकाबले हाई होता है। ऐसे बच्चे मोटापे से भी बचे रहते हैं। यही नहीं, इनकी सोच भी पाॉजिटिव रहती है।
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एक नई रिसर्च में कहा गया है कि अगर बच्चा एक तय समय पर सोता है, तय समय पर जागता है और उसके खेलने का समय भी तय है, तो ऐसे बच्चों की सेहत ताउम्र अच्छी बनी रहती है। यही नहीं, समय पर सोने वाले बच्चे मोटापे से भी बचे रहते हैं।

अमेरिका के ओहायो स्टेट विश्वविद्यालय के लेखक सारा एंडरसन का कहना है कि ‘इस रिसर्च में कहा गया है कि छोटी उम्र के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है उनका रूटीन बनाना और उसे उनसे फॉलो करवाना।’ शोधकर्ताओं ने तीन साल की आयु वाले 3000 बच्चों के रूटीन का निरीक्षण किया। उनके समय से सोने जाने, समय से खाने और उनके समय से टीवी या फिल्म देखने (एक घंटे या कम) का विश्लेषण किया गया। इसमें रिसचर्स ने पैरेंट्स की रिपोर्ट से बच्चों के दो प्वाइंट्स पर फोकस किया।

इस रिसर्च का प्रकाशन पत्रिका ‘ओबेसिटी’ में भी किया गया। एंडरसन ने कहा, ‘हमने पाया कि जिन बच्चों को तीन साल की उम्र में एक शेड्यूल के तहत नहीं चलाया गया, उनमें 11 साल की उम्र में मोटापे की संभावना ज्यादा रही।’ रिसचर्स ने पाया कि समय से रोजाना बिस्तर पर नहीं जाने वाले बच्चों में 11 साल की उम्र में मोटापे की आशंका ज्यादा होती है।

यही नहीं, इस रिसर्च में यह भी पता चला कि जिन बच्चों का सोने का कोई समय नहीं होता, उनका आगे चलकर मोटापे का शिकार होना तय है। वहीं समय पर सोने वाले बच्चे हमेशा हेल्दी और स्लिम ट्रिम होते हैं। इस रिसर्च में यह भी पता चला है कि रूटीन पर चलने वाले बच्चे हमेशा पॉजिटिव होते हैं और उनका कॉन्फिडेंस लेवल भी दूसरों के मुकाबले अधिक होता है।

बच्चों को पसंद होता है म्यूजिक
म्यूजिक बच्चे को खुश कर देता है। आप नोटिस करेंगे तो पाएंगे कि अगर बच्चा रो रहा है और आप गाने चला देते हैं, तो वह कई बार अचानक चुप हो जाता है।

बोतल से दूध पिलाना
बच्चे के मुंह पर बोतल लगाई और खुद लग गए दूसरे कामों में। भले ही यह आपके लिए आरामदायक हो, लेकिन यह बच्चे के बीमार होने की खास वजह बनता है। बोतल से दूध पीने से बच्चों में पेट से जुड़ी कई बीमारियां जैसे डायरिया, दस्त आदि भी हो सकती हैं।

जहां तक हो सके कोशिश करें कि बोतल से दूध न पिलाएं। अक्सर ऐसा होता है कि बच्चा दूध पीते समय सो जाता है और कुछ ही देर में दोबारा उठकर रोने लगता है। ऐसा इसलिए होता है कि मां को लगता है कि उसका पेट भर गया और वह सो गया लेकिन सही मायनों में उसका पेट नही भरता है। ऐसे में उसके तलवों को अंगुली से गुदगुदाते रहें, ताकि वह भरपेट दूध पी सके।

बच्चे को छूने से पहले हाथ धोएं
बच्चे को जब भी गोद में उठाएं, उससे पहले हाथ धो लें। दरअसल, बच्चे की स्किन बेहद सॉफ्ट होती है। कई बार आपकी समझ में नहीं आता कि बच्चे के बार-बार बीमार होने की वजह क्या है, लेकिन यह वजह होती है इन्फेक्शन, जो आपके हाथों, कपड़ों के जरिए उस तक पहुंचती है।

गोदी में पकड़ना
पहले माना जाता था कि बच्चों को ज्यादा देर गोद में पकड़ने से उसकी आदतें खराब हो जाती है लेकिन यह सब सही नहीं है। बच्चा आपकी गोदी में सिक्योर फील करता है, जो आगे चलकर उसको ताउम्र सिक्योरिटी देता है।

बाहर का दूध पिलाने से पहले डॉक्टर से सलाह लें
मां के दूध से बेहतर दूध दूसरा कोई बच्चे के लिए हो नहीं सकता, लेकिन अगर आप किसी वजह से अपने बच्चे को दूध नहीं पिला पा रही हैं, तो जरूरी है यह समझना कि बच्चे के लिए मार्केट का कौन सा दूध बेहतर रहेगा। अक्सर मांओं को लगता है कि बच्चे को सोया मिल्क पिलाना बेहतरीन विकल्प है, जबकि ऐसा नहीं है। आप जब भी अपने बच्चे को सोया मिल्क पिलाएं, तो उससे पहले एक बार डॉक्टर से जरूर पूछ लें।

आमतौर पर डॉक्टर 6 महीने से कम आयु के बच्चों को सोया मिल्क पिलाने की इजाजत नहीं देते। अगर बच्चे को गाय के दूध से एलर्जी हो, तो आप सोया मिल्क को विकल्प के तौर पर चुन सकती हैं, लेकिन आपको यह बताते चलें कि सोया मिल्क एलर्जी न होने की गारंटी नहीं है। असल में यह जानना आवश्यक है कि आपके बच्चे के लिए कौन सा दूध सही है। यदि उसे एनिमल दूध से एलर्जी है, तो डॉक्टर की सलाह के मुताबिक कब और कितना सोया मिल्क देना है, अच्छी तरह समझ लें।

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