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दिल्ली ऐम्स में बना देश का अकेला बोन बैंक खाली

18 साल बाद भी ऐम्स के केडेवरिक बोन बैंक का मकसद पूरा होता नहीं दिख रहा है। लोगों ने अब तक सिर्फ 24 डेडबॉडीज ही डोनेट की हैं। जागरूकता की कमी और आस्था एवं अंधविश्वास की वजह से 18 साल बाद भी देश का इकलौता बोन बैंक बीमार लोगों के काम नहीं आ पा रहा है।

नवभारत टाइम्स 22 May 2017, 12:31 am
प्रमुख संवाददाता, नई दिल्ली
नवभारतटाइम्स.कॉम AIIMS
दिल्ली ऐम्स में है देश का एकमात्र बोन बैंक।

18 साल बाद भी ऐम्स के कडैवरिक बोन बैंक का मकसद पूरा होता नहीं दिख रहा है। लोगों ने अब तक सिर्फ 24 डेडबॉडीज ही डोनेट की हैं। जागरूकता की कमी और आस्था एवं अंधविश्वास की वजह से 18 साल बाद भी देश का इकलौता बोन बैंक बीमार लोगों के काम नहीं आ पा रहा है। बोन डोनेट करने के प्रति लोगों की सोच आज भी परंपरा की वजह से पीछे छूट रही है।

ऐम्स के आंकड़ों के अनुसार, 1999 में इस बैंक की शुरुआत हुई थी, तब से लेकर अब तक सिर्फ 24 डोनेशन मिले हैं। ऐम्स के ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट के एचओडी और ऐम्स ट्रॉमा सेंटर के चीफ डॉक्टर राजेश मल्होत्रा ने कहा कि लोगों में जानकारी की कमी के साथ-साथ गलत धारणाएं और धार्मिक भावनाएं ही इस मकसद को पूरा नहीं होने दे रही हैं। डॉक्टर ने कहा कि 1999 में बैंक बनने के बद साल 2001 तक हड्डियों के लिए कोई भी बॉडी दान नहीं की गई।

बॉडी नहीं होती खराब: उन्होंने कहा कि लोग सोचते हैं कि पार्थिव शरीर से हड्डियों को निकालने से डेडबॉडी खराब हो जाएगी, अंग इधर-उधर लटक जाएंगे। लेकिन यह सच नहीं है, डेडबॉडी से हड्डी निकालने के बाद उसे फिर से सही किया जाता है और लकड़ी के खपंचे रखकर और रुई की मदद से अंगों के आकार और साइज को सही किया जाता है। डॉक्टर मल्होत्रा ने कहा कि इसलिए सामान्य तौर पर 10 मिनट में हड्डियां निकालने के बाद शरीर में टांके लगाने में 30 मिनट लगते हैं ताकि यह सही दिखे, डॉक्टर डोनर की गरिमा बनी रहे। उन्होंने कहा कि मरने वाले के रिश्तेदारों को ये टांके उसी तरह दिखाई देंगे जिस तरह सर्जरी के बाद दिखाई देते हैं।

कैंसर रोगियों को मदद: इस बोन बैंक सेंटर में दी गई हड्डियों का इस्तेमाल कई उद्देश्यों से किया जा सकता है। डॉक्टर मल्होत्रा के मुताबिक, इससे किसी रोगी में कैंसर, संक्रमण या चोट की वजह से खराब हुई हड्डी के हिस्से को बदला जा सकता है। कैंसर के बड़े ऑपरेशन के बाद शरीर में बन गए छेदों को भरने में इन हड्डियों का इस्तेमाल होता है। भारत में हर साल हजारों कैंसर या दुर्घटना पीड़ित रोगियों में बोन ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है, लेकिन केवल 35 प्रतिशत को ही यह लाभ मिल पाता है।

मिलता है 12 घंटा का वक्त: मौत के 12 घंटे के अंदर हड्डियां निकालकर सुरक्षित रखनी होती हैं। अगर शव को रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है तो यह समय 38 घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। उसके बाद उनमें एचआईवी, हेपेटाइटिस या अन्य किसी संक्रमण की जांच होती है। मल्होत्रा ने बताया कि यह प्रक्रिया पूरी होने पर हड्डियों को -70 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखने के बाद करीब पांच साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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