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नेहरू प्लेनेटेरियम की डायरेक्टर एन. रत्नाश्री का कोविड से निधन

साइंस कम्यूनिकेटर अमिताभ पांडे कहते हैं, जब 1999 में रत्नाश्री नेहरू प्लेनेटेरियम की डायरेक्टर बनी थीं, तभी से मेरी उनसे मुलाकात थी। मैं अमैच्युअर्स एस्ट्रॉमर्स असोसिएशन दिल्ली का हिस्सा था, जिसे उन्होंने बहुत सपोर्ट किया। इसके अलावा, आमतौर पर स्कूली स्टूडेंट्स प्लैनेटेरियम में जाते हैं, मगर रत्नाश्री ने कॉलेज स्टूडेंट्स को जोड़ने के लिए काफी काम किया।

Authored byकात्यायनी उप्रेती | नवभारत टाइम्स 13 May 2021, 12:19 pm

हाइलाइट्स

  • स्टूडेंट के लिए किया काफी काम, जंतर-मंतर के इंस्ट्रूमेंट की मार्किंग में जुटी थीं
  • उन्होंने एस्ट्रोनॉमी को स्टूडेंट्स के बीच पॉप्युलर बनाया, वेबीनार का आयोजन
  • कोविड होने के बावजूद भी काफी एक्टिव थीं और लगातार काम कर रही थीं
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नेहरू प्लेनेटेरियम की डायरेक्टर एन रत्नाश्री का कोविड से निधन (फाइल फोटो)
नई दिल्ली
कोविड-19 के लंबे लॉकडाउन के दौरान एस्ट्रनॉमी एजुकेटर एन. रत्नाश्री ने अंतरिक्ष के कई राज स्टूडेंट्स के बीच खोले। उनकी वेबिनार सीरीज 'एस्ट्रो अड्डा', लॉकडाउन में घरों में बंद स्टूडेंट्स के लिए अंतरिक्ष को करीब से जानने का खास मौका थी। मगर कोविड से संक्रमित नेहरू प्लेनेटेरियम की डायरेक्टर एन रत्नाश्री ने रविवार को दुनिया को 57 साल की उम्र में अलविदा कह दिया। एस्ट्रनॉमी से जुड़े उनके साथियों का कहना है कि उन्होंने स्टूडेंट्स के लिए कई प्लान रखे थे, जो अधूरे छूट गए। दिल्ली का जंतर-मंतर भी डॉ रत्नाश्री की लैब थी, वह इसके सदियों पुराने इंस्ट्रुमेंट की मार्किंग के लिए बतौर एक्सपर्ट काम कर रही थीं।
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एन रत्नाश्री के बारे में स्टेम एंड स्पेस की चीफ साइंटिफिक ऑफिसर मिला मित्रा कहती हैं, वह बहुत एक्टिव थीं। स्टूडेंट्स के साथ उन्हें काम करने में मजा आता था। उन्होंने एस्ट्रनॉमी को स्टूडेंट्स के बीच पॉपुलर किया। एस्ट्रोफिजिक्स पर कई प्रोग्राम, वर्कशॉप रखीं। उनसे मेरी मुलाकात बच्चों के जरिए ही हुई थी, क्योंकि मैं भी इस फील्ड में बच्चों के बीच काम कर रही थी। मिला बताती हैं, लॉकडाउन में 'एस्ट्रो अड्डा सीरीज के साथ उन्होंने कई दिलचस्प टॉपिक पर वेबिनार किए। लोगों की मुलाकात कई साइंटिस्ट से भी करवाई। अपने आखिरी दिनों में भी वो अपने पैशन के साथ थीं। मुझे एक साथी ने बताया कि कोविड ने उन्हें घेरा हुआ था और वे एक शॉल ओड़े एक वेबिनार में बोल रही थीं।साइंस कम्यूनिकेटर अमिताभ पांडे कहते हैं, जब 1999 में रत्नाश्री नेहरू प्लेनेटेरियम की डायरेक्टर बनी थीं, तभी से मेरी उनसे मुलाकात थी। मैं अमैच्युअर्स एस्ट्रॉमर्स असोसिएशन दिल्ली का हिस्सा था, जिसे उन्होंने बहुत सपोर्ट किया। इसके अलावा, आमतौर पर स्कूली स्टूडेंट्स प्लैनेटेरियम में जाते हैं, मगर रत्नाश्री ने कॉलेज स्टूडेंट्स को जोड़ने के लिए काफी काम किया। स्टूडेंट्स के प्रोजेक्ट में वो उन्हें सिर्फ गाइड नहीं करती थीं, बल्कि उनके साथ ही काम पर लग जाती थीं। यह उनकी खासियत थी।

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उन्होंने प्लेनेटोरियम को भी नया और रोचक रूप दिया था। डॉ रत्नाश्री जंतर-मंतर के इंस्ट्रुमेंट को सहजने में खास रोल निभा रही थीं। अमिताभ पांडे बताते हैं, जंतर-मंतर के इस्ट्रुमेंट डैमेज हो रहे हैं। उनकी मार्किंग मिट चुकी हैं। रीमार्किंग का काम एएसआई के साथ चल रहा है, जिसमें रत्नाश्री एक एक्सपर्ट के तौर पर काम रही थीं। बहुत ही कम लोग ही इस मार्किंग की जानकारी रखते हैं। मगर कोविड की वजह से पिछले डेढ़ साल से यह काम बंद है। दुख की बात है कि इस खास काम को पूरा करने से पहले वो चली गईं। इसे लेकर वह उत्साहित थीं। रत्नाश्री की गाइडेंस में दिल्ली के कुछ स्टूडेंट्स ने मिलकर एस्ट्रनॉमी का एक ग्रुप भी बनाया। स्टूडेंट्स ग्रुप 'स्टेलर एस्ट्रनॉमी' के एडमिनिस्ट्रेटर सौरभ कहते हैं, वो बहुत शांत थीं। अंतरिक्ष को जानने का पैशन उनकी शख्सियत में था। उनकी सलाह पर ही मैंने 'स्टेलर यूनिवर्स' शुरू किया, जिसमें आज देशभर से 500 मेंबर हैं। इस ग्रुप के साथ वो काम करती थीं और हमें मोटिवेट करतीं। अप्रैल आखिरी हफ्ते में भी तीन दिन की ऑनलाइन कोडिंग वर्कशॉप भी उन्होंने प्लान की थी। मगर कोविड होने की वजह से इसे उन्होंने पोस्टपोन किया। मेरी उस वक्त उनसे बात हुई थी, ठीक उसके बाद वो हॉस्पिटल में एडमिट हुईं। सौरभ कहते हैं, वो देश में शायद अकेली थीं जो इस फील्ड में काफी एक्टिव थी। खासतौर पर स्टूडेंट्स के बीच बहुत काम कर रही थीं। वो पॉपुलर थीं। उनका जाना एक खालीपन दे गया।

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