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आज भी भेदभाव का दंश झेल रहे हैं HIV मरीज

कुछ समय पहले HIV पीड़ितों के लिए राज्यसभा में एक विधेयक पास हुआ था। इसमें कहा गया था कि अगर इन मरीजों के साथ कोई भेदभाव करता है तो उसके खिलाफ काननूी कार्रवाई की जाएगी। जेल तक भेजने का प्रावधान किया गया है। लेकिन विधेयक पास हो जाने के बाद भी ये मरीज भेदभाव का दंश झेल रहे हैं...

सांध्य टाइम्स 9 Jun 2017, 12:35 pm
नई दिल्ली
नवभारतटाइम्स.कॉम एचआईवी पीड़ित से भेदभाव जारी
एचआईवी पीड़ित से भेदभाव जारी

कुछ समय पहले HIV पीड़ितों के लिए राज्यसभा में एक विधेयक पास हुआ था। इसमें कहा गया था कि अगर इन मरीजों के साथ कोई भेदभाव करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए जेल भेजने का प्रावधान किया गया है, लेकिन विधेयक पास हो जाने के बाद भी ये मरीज भेदभाव का दंश झेल रहे हैं। पढ़िए निर्भय परीक्षित की रिपोर्ट-

नाम सुनते ही बना लेते हैं दूरी
एचआईवी संक्रमित एक व्यक्ति ने कहा कि वह बाराखंभा स्थित एक आईटी कंपनी में पिछले 5 सालों से काम कर रहे हैं। उनकी उम्र 35 साल है। 10 साल पहले उन्हें अपनी बीमारी के बारे में पता चला था। उस वक्त 2 कंपनियों ने जॉब से पहले मेरी मेडिकल रिपोर्ट मांगी थी, जिसमें बीमारी के बारे में लिखा था। रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। इसके बाद जब इस कंपनी में जॉब मिली तो लोगों ने बीमारी का पता चलने के बाद उनसे दूरी बनाना शुरू कर दिया।

साथ खाना भी नहीं खाते
एक पीड़ित ने बताया कि वह तीन सालों से नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) में कार्यरत हैं। ब्लड ट्रांसफ्यूजन की वजह से उन्हें एचआईवी हुआ। उनका इलाज चल रहा है। जब उनकी बीमारी के बारे में ऑफिस में पता चला तो लोगों ने उनके साथ खाना बंद कर दिया। जो लोग पहले खुशी-खुशी उनके साथ टिफिन शेयर करते थे, आज वही कुछ न कुछ बहाना बहाना बनाकर चले जाते हैं।

अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव
एक और पीड़ित ने अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा कि वह लोकनायक अस्पताल में पिछले 20 वर्षों से नर्स हैं। उन्हें काफी समय से यह बीमारी है, इलाज भी जारी है। वह कहती हैं कि भले ही डॉक्टर या अस्पताल में एड्स मरीजों के साथ भेदभाव नहीं होने की दलील दी जाती है, लेकिन भेदभाव तो होता ही है। प्रत्यक्ष रूप से न सही, अप्रत्यक्ष रूप से। जब से उनके स्टाफ को उनकी बीमारी के बारे में पता चला है, तब से वह अक्सर भेदभाव की शिकार होती हैं।

दुनियाभर में करीब 3.67 करोड़ लोग एचआईवी/एड्स से पीड़ित हैं जबकि भारत 21 लाख रोगियों के साथ दुनिया में सबसे ज्यादा एचआईवी पीड़ित लोगों की सूची में तीसरे नंबर पर आता है। साल 2015 में इस बीमारी की वजह से दुनिया में 11 लाख जबकि भारत में 68 हजार मौतें हुई हैं। दुनिया भर में एड्स पीड़ित लोगों के प्रति भेदभाव की घटनाएं भी लगातार सामने आती रही हैं। एक NGO के सर्वे के मुताबिक भारत में करीब 67% एड्स मरीजों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इन लोगों को या तो अपनी बीमारी को छुपाकर रखना पड़ता है या फिर सार्वजानिक जगहों पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

भारत सरकार ने 2030 तक एचआईवी/एड्स को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है। भारत सरकार के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के मुताबिक लगभग 18% एचआईवी पीड़ित अपने पड़ोसियों से भेदभाव के शिकार होते हैं, जबकि 9% को समुदाय या शिक्षण संस्थान में अपमान व प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है।

यह है नया विधेयक
लोकसभा और राज्य सभा में पेश हुए ‘मानव रोगक्षम अल्पता विषाणु और अर्जित रोगक्षम अल्पता संलक्षण (निवारण और नियंत्रण) विधेयक 2017 ‘ के अनुसार, एड्स पीड़ितों के साथ किसी भी प्रकार का उपचार संबंधी भेदभाव, सामाजिक भेदभाव और उनके खिलाफ दुर्भावना फैलाना दंडनीय अपराध है। एचआईवी पीडितों और उनके बच्चों का संपत्ति में हक कानूनी अधिकार के जरिए सुरक्षित करने के प्रावधान हैं। पीड़ितों के अधिकारों का उल्लंघन होने की स्थिति में विधेयक में एक ओम्बुडसमैन की व्यवस्था है, जहां शिकायत करने पर 30 दिन के भीतर कार्रवाई होगी। इसका अनुपालन नहीं करने पर 10 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। विधेयक में इस बात के भी प्रावधान किए गए हैं कि अदालती कार्यवाही, चिकित्सकीय उपचार और सरकारी रिकार्ड में पीड़ित मरीजों के बारे में गोपनीयता बरती जाएगी। उनके संबंध में जानकारी को सार्वजनिक करना कानूनन अपराध है।

हमारे यहां इलाज का संकट
यूएन के मुताबिक भारत में सिर्फ 36% लोगों को ही उपचार मिल पाता है, बाकी 64 % लोग इसके उपचार से वंचित रह जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2013 के बीच एड्स से हुई मौतों की संख्या में करीब 38% की गिरावट आई है। इसकी वजह उपचार के साधनों का विस्तार माना जाता है। एड्स के ज्यादातर मामले पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों में हैं। एचआईवी के इलाज का पेटेंट दवाओं की कंपनियों के पास होने की वजह से बाजार में जेनेरिक दवाएं नहीं मिल पाती हैं। इस कारण इलाज बहुत महंगा पड़ता है। इससे अफ्रीकी देशों में इलाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 1.9 करोड़ मरीज ऐसे हैं जिन्हें उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है।

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