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Rare Surgery: 13 साल की बच्ची का कंधा 80 डिग्री तक झुक गया था, सर्जरी से किया सीधा

दिल्ली के डॉक्टरों ने स्मिथ-पीटरसन ऑस्टियोटॉमी तकनीक का सहारा लेकर एक 13 साल की बच्ची के झुके हुए कंधों को सीधा कर दिया। 80 पर्सेंट तक झुक गए कंधों की सफल सर्जरी की गई। डॉक्टरों का कहना है इस तकनीक में रीढ़ की हड्डी के आकार को बदल दिया जाता है, ताकि रीढ़ की हड्डी लचीली हो सके।

Authored byएनबीटी डेस्क | नवभारत टाइम्स 12 Feb 2022, 12:36 pm
विशेष संवाददाता, नई दिल्ली: 13 साल की बच्ची का कंधा 80 डिग्री तक झुक गया था। बच्ची की जिंदगी परेशानियों से भर गई थी। पीठ में असहनीय दर्द के कारण पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रही थी। उसकी कूबड़ वाली पीठ की वजह से उसमें ऊर्जा कम हो रही थी। लेकिन दिल्ली के डॉक्टरों ने बच्ची का सफल इलाज किया और उसका कंधा फिर से सीधा हो गया। डॉक्टरों ने उसके इलाज के लिए स्मिथ-पीटरसन ऑस्टियोटॉमी तकनीक का सहारा लिया और सर्जरी सफल रही।
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ऑपरेशन के बाद ठीक हुआ बच्चा का झुका हुआ कंधा


इंडियन स्पाइनल इंजरीज सेंटर (आईएसआईसी) के स्पाइन सर्जन डॉ. रजत महाजन ने कहा कि इस बीमारी में वर्टेब्रे (कशेरुक) स्पाइनल कॉलम बनाने वाली इंटरलॉकिंग हड्डियां सामान्य हड्डियों की तुलना में ज्यादा पीछे की ओर बढ़ती हैं। इससे काइफोटिक या कूबड़ की समस्या होती है। इस मरीज में कूबड़ का कोण (साइड-टु-साइड स्पाइनल घुमाव की डिग्री का माप) 80 डिग्री हो गया था और यह धीरे-धीरे बढ़ रहा था। इस बच्ची की सर्जरी के लिए स्मिथ-पीटरसन ओस्टियोटॉमी करने का फैसला किया। यह एक ऐसी तकनीक होती है, जिसमें रीढ़ की हड्डी के आकार को बदल दिया जाता है, ताकि रीढ़ की हड्डी लचीली हो सके। सर्जरी करने का मकसद आधुनिक स्पाइनल इंस्ट्रूमेंट्स जैसे स्क्रू और रॉड्स को लगाकर किफोसिस को कम करना था, जिससे स्पाइन को लचीला बनाया जा सके।

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डॉक्टर महाजन ने कहा कि भारतीय बच्चों में यह समस्या ज्यादा देखने को नहीं मिलती है। यह समस्या लड़कियों की तुलना में लड़कों में ज्यादा होती है। शेर्मन काइफोसिस बीमारी 10 से 15 साल की उम्र में ज्यादा होती है। सभी मामले में सर्जरी करने की जरूरत नहीं होती है। अगर आप किसी बच्चे में इस कूबड़ की समस्या को जानना चाहते हैं तो बच्चे को पैरों की उंगलियों को घुटने को सीधे रखे हुए छूने की कोशिश करें। अगर बच्चे में यह समस्या रहेगी तो उसमे कूबड़ दिख जाएगा। काइफोसिस की कुछ मात्रा हर बच्चे में (45 डिग्री तक) सामान्य होती है। शेर्मन काइफोसिस में यह सामान्य से ज्यादा हो जाती है। हालांकि इनमें से कई केसेज में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है। सामान्य काइफोसिस 45 डिग्री तक होता है। शेर्मन काइफोसिस में यह 100 डिग्री तक भी बढ़ सकता है।

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उन्होंने कहा कि एक बार काइफोसिस 75 डिग्री से ज्यादा हो जाए तो सर्जरी कराने की सलाह दी जाती है। इस स्थिति को पहचानना महत्वपूर्ण है। ब्रेसेस उन बच्चों में मददगार होता है जिनमें काइफोसिस 75 डिग्री से कम होता है। अधिकांश बच्चे में अगर सावधानी बरती जाए तो वे सर्जरी से बच सकते हैं। डॉ महाजन ने कहा कि हमने स्मिथ पीटरसन ओस्टियोटॉमी को अंजाम दिया। यह एक तरह की ऐसी सर्जरी होती है, जिसमें रीढ़ के जोड़ों को पीछे से हटा दिया जाता है, जिससे रीढ़ की हड्डी ज्यादा कोमल हो जाती है, इससे समस्या में सुधार होता है। यह पूरी प्रक्रिया सुरक्षित होती है और न्यूरोमॉनिटोरिंग के माध्यम से की जाती है। इसमें सर्जन पैरों की मोटर-पावर पर कड़ी निगरानी रखता है। इसलिए इस सर्जरी में कोई जोखिम नहीं होता और सर्जरी के बाद लकवा होने की संभावना लगभग शून्य होती है।
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एनबीटी डेस्क
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