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क्या 20 साल का वनवास खत्म कर पाएंगे जावड़ेकर?

बीजेपी आलाकमान ने दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बड़ा गेम खेला है

रामेश्वर दयाल | नवभारतटाइम्स.कॉम 10 Aug 2019, 12:19 pm

रामेश्वर दयाल

बीजेपी आलाकमान ने दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बड़ा गेम खेला है। पहली उसने तीन बड़े नेताओं को दिल्ली में पार्टी की बागडोर संभालने का जिम्मा सौंपा है। लेकिन सवाल यह है कि यह प्रभावी नेता दिल्ली में बीजेपी का 20 साल का वनवास खत्म कर पाएंगे। कहा यह भी जा रहा है कि दिल्ली में प्रदेश बीजेपी की टीम कमजोर है और उसमें अपने बूते ‘चमत्कार’ करने की क्षमता नहीं है, ऐसे में नए नेताओं को खासी मेहनत करनी होगी। वैसे बीजेपी को इस बार दिल्ली में ‘संभावनाएं’ नजर आ रही हैं, अगर कुछ ‘अवरोधों’ से आलाकमान की यह तिकड़ी पार पा ले।

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प्रदेश बीजेपी के नए प्रभारी बने हैं प्रकाश जावड़ेकर

पहली बार प्रभारी के साथ सह प्रभारी

बीजेपी आलाकमान ने अपने जमीन से जुड़े नेता प्रकाश जावड़ेकर को दिल्ली का प्रभारी नियुक्त किया है। इसके अलावा दो सह प्रभारी के रूप में हरदीप पुरी व नित्यानंद राय भी नियुक्त किए हैं। बीजेपी सूत्रों का कहना है कि यह पहली बार हुआ है कि जब दिल्ली में प्रभारी के साथ दो सह प्रभारी भी नियुक्त किए गए हैं। वरना हमेशा प्रभारी ही नियुक्त करने की परंपरा है। इन तीनों नेताओं की बात करें तो जावड़ेकर को पार्टी का बड़ा रणनीतिकार माना जाता है, जबकि हरदीप पुरी को दिल्ली के पंजाबी वोटरों को साधने व बिहार के नेता राय को दिल्ली के पूर्वांचल वोटरों को रिझाने के लिए नियुक्त किया गया है। वैसे तो प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी खुद भी पूर्वांचल से आए हैं। इसलिए माना जाता है कि इन दोनों की ‘ट्यूनिंग’ दिल्ली के करीब 40 प्रतिशत मतदाताओं को साध पाएगी।

कमजोर टीम को साधना सबसे बड़ी चुनौती

बीजेपी आलाकमान बड़े नेताओं को तो दिल्ली में उतार दिया है, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली बीजेपी की कमजोर टीम को मजबूत करना होगा। दिल्ली की कार्यकारिणी में अधिकतर नेताओं की पूरी दिल्ली में स्वीकार्यर्ता नहीं है, जैसे पहले कभी मदनलाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा, ओमप्रकाश कोहली, जगदीश मुखी, पवन शर्मा आदि नेताओं की हुआ करती थी। प्रदेश के नेता भी मान रहे हैं कि दिल्ली के टीम के ये नेता प्रफेशनल तो माने जा सकते हैं, लेकिन उन्हें जननेता माना नहीं जा सकता। कार्यकारिणी के इन नेताओं ने न तो दिल्ली में बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया है और न ही वोटरों को साधने में अपनी कलाकारी दिखाई है। ऐसे में देखना यह होगा कि ये आलाकमान के ये नेता प्रदेश टीम में बदलाव करते हैं या उसे मजबूत करने के लिए ‘ठोस कदम’ उठाते हैं।

चुनाव तो मोदी और केजरीवाल के बीच होगा

दिल्ली की राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि इस बार का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत छवि, कश्मीर को लेकर उनके द्वारा उठाए कदमों पर तो लड़ा ही जाएगा, साथ ही दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के हक या उनके विरोध को लेकर होगा। प्रभारियों को इसके लिए मेहनत करनी होगी कि वे किस रणनीति के तहत काम करेंगे। उन्हें यह देखना होगा कि मोदी मैजिक दिल्ली में काम करेगा या वह एके सरकार के विरोध में बिगुल बजाएंगे। पार्टी के एक आला नेता के अनुसार साल 2014 में मोदी के चलते दिल्ली में सातों लोकसभा सीटें बीजेपी के खाते में चली गई थी, लेकिन आठ महीने बाद विधानसभा के हुए चुनाव में बीजेपी को करारी मात झेलनी पड़ी थी। लेकिन उस वक्त केजरीवाल का इतिहास शून्य था, जबकि उसमें अब कई किंतु-परंतु लगे हुए हैं। ऐसे में टीम को देखना होगा कि वह कौन सा गेम खेले। माना यह जा रहा है कि बीजेपी के लिए दिल्ली में ‘संभावनाएं’ दिख रही हैं, लेकिन सवाल यही है कि क्या उसका 20 साल का वनवास खत्म हो पाएगा।

लेखक के बारे में
रामेश्वर दयाल
रामेश्वर दयाल 2003 से सांध्य टाइम्स से जुड़े हैं और इनकी रुचि दिल्ली से जुड़े विषयों में है।... और पढ़ें

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