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पार्षद बने नहीं, पदों के लिए भागदौड़!

जानकर हैरानी होगी कि वैधानिक तौर पर एमसीडी पार्षदों ने अभी तक शपथ नहीं ली है, इसके बावजूद बीजेपी की ओर से आधिकारिक तौर पर मेयर, डिप्टी मेयर व अन्य पदों के लिए नामांकन भरवा दिए गए हैं। निगम नियमों के अनुसार वहां नेता सदन व नेता विपक्ष का कोई पद नहीं होता...

रामेश्वर दयाल | सांध्य टाइम्स 13 May 2017, 1:17 pm
नई दिल्ली
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MCD में BJP को मिली है धमाकेदार जीत

जानकर हैरानी होगी कि वैधानिक तौर पर एमसीडी पार्षदों ने अभी तक शपथ नहीं ली है, इसके बावजूद बीजेपी की ओर से आधिकारिक तौर पर मेयर, डिप्टी मेयर व अन्य पदों के लिए नामांकन भरवा दिए गए हैं। निगम नियमों के अनुसार वहां नेता सदन व नेता विपक्ष का कोई पद नहीं होता, लेकिन नेता सदन का वहां के सरकारी कामकाज में खासा दखल रहता है तो नेता विपक्ष को कई सहूलियतें मिलती हैं।

तीनों नगर निगमों में चुनाव की प्रक्रिया तो पूरी हो चुकी है, लेकिन नए निगमों का गठन आगामी दिनों में होगा। तीनों निगमों की होने वाली पहली बैठकों में चुने एक प्रत्याशी वहां पार्षद के रूप में सदस्यता ग्रहण करेंगे, उसके बाद विधायी तौर पर वे संवैधानिक पद के हकदार हो जाएंगे। लेकिन मजेदार बात यह है कि प्रत्याशी अभी पार्षद नहीं बन पाए हैं, लेकिन उनकी ओर से मेयर, डिप्टी मेयर व अन्य वैधानिक पदों के लिए नामांकन भर दिए गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब चुने गए प्रत्याशियों ने पार्षद की शपथ नहीं ली है तो निगम सचिव द्वारा उनसे नामांकन क्यों भरवाए जा रहे हैं।

इस मसले पर साउथ दिल्ली के निगम सचिव कार्यालय के एक आला अधिकारी का मानना है कि तकनीकी तौर पर मेयर आदि का नामांकन नहीं किया जा सकता, न ही स्थायी समिति के सदस्यों के लिए सचिव कार्यालय में पर्चे भरे जा सकते हैं। लेकिन यह परंपरा सालों से चल रही है। यह पूछे जाने पर कि इस गड़बड़ी को चैलेंज किया जा सकता है, अधिकारी का कहना था कि अगर ऐसा हुआ तो इन पदों को लेकर सवाल खड़ा हो सकता है। उसका कारण सीधा सा है कि जब आप अभी तक पार्षद नहीं बन पाए हैं तो मेयर या अन्य संवैधानिक पदों के लिए नामांकन कैसे भर सकते हैं।

विशेष बात यह भी है कि डीएमसी ऐक्ट में नेता सदन का कोई पद नहीं बनाया गया है। लेकिन यह पद निगमों से सबसे अधिक पॉवरफुल है। उसका कारण यह है कि जब किसी भी योजना को कमिश्नर या स्थायी समिति पास करती है तो उस पर नेता सदन की मंजूरी जरूरी है। एमसीडी की आम बैठक में अगर नेता सदन ने इस योजना या प्रस्ताव को खारिज कर दिया तो उसे निरस्त मान लिया जाता है।

इसी तरह नियमों के अनुसार एमसीडी में नेता विपक्ष का भी कोई पद नहीं है, जैसा कि विधानसभा आदि में होता है। लेकिन निगमों में नेता विपक्ष की भी खासी चलती है। उन्हें लंबा-चौड़ा कार्यालय दिया जाता है और उसे चलाने के लिए बजट भी निर्धारित किया जाता है। इस मसले पर निवर्तमान नेता सदन सुभाष आर्य ने माना कि नियमों में इस तरह के पद नहीं है, लेकिन यह प्रावधान वर्ष 1958 से चल रहे हैं, जब निगम का गठन हुआ था। उन्होंने कहा कि जब राजनिवास की ओर से निगम चुनाव नोटिफाई हो जाता है तो चुने गए प्रत्याशियों को पार्षद मान लेने की परंपरा है, लेकिन उन्हें पास हस्ताक्षर करने की पावर नहीं होती।
लेखक के बारे में
रामेश्वर दयाल
रामेश्वर दयाल 2003 से सांध्य टाइम्स से जुड़े हैं और इनकी रुचि दिल्ली से जुड़े विषयों में है।... और पढ़ें

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