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'यूपी में मिट्टी की गुणवत्ता में आई है कमी'

राज्य कृषि विभाग द्वारा मूल्यांकन का सुझाव देते हुए कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में पारंपरिक कृषि पद्धतियों में बदलाव की वजह से मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आई है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लिए मिट्टी के नमूनों की जांच में पाया गया कि जैविक सामग्री का अनुमानित स्तर 0.8 फीसदी की तुलना में 0.2 फीसदी ही है।

टाइम्स न्यूज नेटवर्क 27 Jun 2018, 2:08 am
शैलवी शारदा, लखनऊ
नवभारतटाइम्स.कॉम Farmers
सांकेतिक तस्वीर

राज्य कृषि विभाग द्वारा मूल्यांकन का सुझाव देते हुए कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में पारंपरिक कृषि पद्धतियों में बदलाव की वजह से मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आई है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लिए मिट्टी के नमूनों की जांच में पाया गया कि जैविक सामग्री का अनुमानित स्तर 0.8 फीसदी की तुलना में 0.2 फीसदी ही है।

फसल की खराब उपज को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से सोमवार को किसान पाठशाला का संस्करण लॉन्च किया गया। इस आयोजन की जानकारी को साझा करते हुए कृषि निदेशक सोराब सिंह ने बताया, 'वर्ष 2017 में शुरू किया किसान पाठशाला का कॉन्सेप्ट बहुत अच्छा है। इसके तहत किसानों को इस बात की जानकारी दी जाती है कि खेती करने के तरीके में महज कुछ परिवर्तन करने के साथ किस तरह से अच्छा लाभ कमाया जाए। यही नहीं, मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में
भी इस आयोजन के दौरान जानकारी दी गई।'

मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देते हुए कृषि अडिशनल डायरेक्टर आरएस जैसवारा ने बताया, 'मिट्टी के साथ मौजूद कार्बनिक पदार्थ को डेट्रिटस कहा जाता है, जो बीज को पौधे में परिवर्तित करता है और यही पौधे को उगाने के लिए सहायक माना जाता है।' उन्होंने कहा कि यूपी की मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा में पिछले कुछ दशकों में गिरावट आई है। उन्होंने बताया, 'लगभग 20 वर्ष पहले मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा लगभग 0.6 फीसदी थी, जो कि लगभग एक दशक पहले 0.4 फीसदी रह गया। लगभग पिछले पांच वर्षों पहले यह 0.3 फीसदी पहुंच गया।'

जैविक पदार्थों में गिरावट के पीछे संभावित कारणों के बारे विशेषज्ञों का कहना है, 'परंपरागत कृषि पद्धतियों में बदलाव, खास तौर पर ट्रैक्टर्स पर निर्भरता, प्राकृतिक खाद का खराब उपयोग, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता, फसल के अवशेषों को जलाना और वनों की कटाई मिट्टी के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

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