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पिछले चुनाव परिणाम बताते हैं वोटों का गणितः दल नहीं जाति को वोट करता है गैर यादव पिछड़ा वर्ग

राजनीतिक आंकड़े देखें तो उत्तर प्रदेश में लगभग 52 फीसदी वोट पिछड़ा वर्ग का है। इसमें से 43 फीसदी वोट बैंक गैर यादव बिरादरी का है। प्रदेश के पिछले चुनाव आंकड़ों की गणित देखें तो पता चलता है कि गैर यादव पिछड़ा वर्ग दल को नहीं जाति को वोट करता है।

सूर्य प्रकाश शुक्ला | नवभारत टाइम्स 16 Jan 2019, 7:46 am
लखनऊ
नवभारतटाइम्स.कॉम सांकेतिक चित्र
सांकेतिक चित्र

जातीय आधार पर वोट बैंक का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं है लेकिन राजनैतिक दलों के पास मौजूद आंकड़ों पर गौर करें तो संख्या के लिहाज से यूपी में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का है। राजनैतिक दलों के आंकड़ों की माने तो लगभग 52 फीसदी पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक में 43 फीसदी वोट बैंक गैर यादव बिरादरी का है। लेकिन, यूपी के चुनाव परिणामों पर नजर डाले तो खुलासा होता है कि पिछड़ा वर्ग के वोटर समूह के तौर पर वोटिंग नहीं करता। चुनाव में उनका वोट जाति के आधार पर पड़ता है। यही कारण है कि छोटे हो या फिर बड़े दल, सभी की निगाहे इस वोट बैंक पर रहती है।

दिशा तय करता है 43 फीसदी वोट बैंक
यूपी की राजनीति में जब बात ओबीसी की आती है तो यादव को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियां कहीं अलग खड़ी नजर आती हैं। जानकारों की मानें तो यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों पर गैर यादव ओबीसी का वोट पांच लाख से लेकर साढ़े आठ लाख तक है। वोटों की प्रमुखता के हिसाब से देखें तो यही वोट बैंक उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका अदा करता है। गैर यादव ओबीसी नेताओं की बात करें, लगभग सभी दलों में इन जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता हैं। इनमें बेनी प्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल, केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य, राम अचल राजभर, लालजी वर्मा, सुखदेव राजभर, आरएस कुशवाहा, नरेश उत्तम, स्वतंत्रदेव सिंह, धर्म सिंह सैनी, अनिल राजभर, उमा भारती, विनय कटियार, अनुप्रिया पटेल, कृष्णा पटेल जैसे कई कद्दावर नेता हैं। यादव और कुर्मी को छोड़ ओबीसी वर्ग के बाकी जातियों पिछले कई दशकों से आरक्षण के वर्गीकरण की मांग करती आ रही हैं।

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यादव वोटबैंक ने तोड़ा था भ्रम

यूपी में यादव वोट बैंक नौ फीसदी माना जाता है। इस वोटबैंक पर समाजवादी पार्टी का एकाधिकार माना जाता है, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में यह भ्रम कुछ हद तक टूटा। नौ फीसदी यादवों के वोट बैंक में 27 फीसदी वोट भारतीय जनता पार्टी को मिला। हालांकि, 2007 के विधानसभा चुनाव में एसपी को 72 फीसदी, 2009 के लोकसभा चुनाव में एसपी को 73 फीसदी और 2012 के विधानसभा चुनाव में एसपी को 66 फीसदी वोट मिला था, लेकिन 2014 के चुनाव में एसपी को सिर्फ 53 फीसदी यादवों को वोट मिला।

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गैर यादव ओबीसी और उनका बहुमत
गैर यादव ओबीसी वोटबैंक की बात करें, तो दूसरे नंबर पर पटेल और कुर्मी वोट बैंक आता है। यूपी की जातीय अंकगणित में सात फीसदी वोटबैंक इसी जाति का है। जातिगत आधार पर देखें तो यूपी के सोलह जिलों में कुर्मी और पटेल वोट बैंक छह से 12 फीसदी तक है। इनमें मीरजापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती जिले प्रमुख हैं। यादव और कुर्मी के अलावा ओबीसी वोटबैंक में करीब डेढ़ सौ और जातियां हैं, जिन्हें अति पिछड़ों की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें ओबीसी की कुशवाहा जाति का तेरह जिलों का वोटबैंक सात से 10 फीसदी है। इन जिलों में फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर देहात, जालौन, झांसी, ललितपुर और हमीरपुर हैं। ओबीसी में एक और बड़ा वोट बैंक लोध जाति का है। यूपी के 23 जिलों में लोध वोटबैंक का दबदबा है। इनमें रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामायानगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा ऐसे जिले हैं, जहां लोध वोट बैंक पांच से 10 फीसदी तक है।

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एसबीएसपी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने बताया कि वर्गीकरण के नाम पर ओबीसी का गैर यादव और गैर कुर्मी वोट बैंक पिछली कई सरकारों से धोखा खाता आया है। अगर बीजेपी ने ओबीसी के आरक्षण का वर्गीकरण नहीं किया, तो आगामी लोकसभा चुनाव पर इसका भारी असर देखने को मिलेगा। वहीं अपना दल एस के अध्यक्ष आशीष सिंह पटेल ने बताया कि 2014 और 2017 के चुनावों में गैर यादव ओबीसी का झुकाव बीजेपी की ओर था। जैसे ही 2019 के चुनाव की कमान मोदी और शाह संभालेंगे, ओबीसी वोटबैंक फिर बीजेपी के पक्ष में खड़ा नजर आएगा।

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