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यूपी: गठबंधन की खिचड़ी, फिर रही कड़वी

यूपी में चुनाव से पहले सत्ता के लिए बने राजनीतिक दलों के गठबंधन के 2 दशक का इतिहास नुकसान का गवाह रहा है। इस बार फिर हुई पुनरावृत्ति। प्रदेश की जनता ने राजनीतिक दलों की ओर पकाई गई गठबंधन की खिचड़ी को अपने मतों से कड़वा साबित कर दिया है।

दिनेश मिश्र | नवभारत टाइम्स 14 Mar 2017, 2:54 pm
लखनऊ/वाराणसी
नवभारतटाइम्स.कॉम alliance of political parties again failed in up
यूपी: गठबंधन की खिचड़ी, फिर रही कड़वी

यूपी में चुनाव से पहले सत्ता की चाभी हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों के बीच पकी गठबंधन की खिचड़ी एक बार फिर कड़वी ही साबित हुई है। प्रदेश की जनता ने राजनीतिक दलों की ओर पकाई गई गठबंधन की खिचड़ी को अपने मतों से किस तरह कड़वा साबित कर दिया है, इसका जायका कांग्रेस, सपा के साथ बीएसपी से भी बेहतर कोई नहीं बता सकता है।

सूबे में सियासी दलों के गठबंधन की खिचड़ी के दो दशक के इतिहास बताता है इसके स्वाद को कड़वी कही जाए तो गलत नहीं होगा। कड़वे स्वाद के बाद सत्ता का स्वाद चखने के नारे-सिद्धांत को ताक पर रखकर हुए चुनावी गठबंधन में इस बार भी वोट की चोट से सबसे ज्यादा घाव सपा,कांग्रेस व बीएसपी से बड़े राजनीतिक दलों को ही हुआ है।

देश की सबसे बड़े व पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस को चुनावी गठबंधन में वोटरों ने नुकसान की कितनी गांठ लगायी? इसे देखने के लिए 1996 में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम को देखना होगा। इस चुनाव में कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन करने के साथ ही राष्ट्रीय लोकदल का पार्टी में विलय करवा लिया था। इस चुनाव में कांग्रेस 29.13 प्रतिशत वोट के साथ 33 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। कुछ समय बाद गठबंधन में मनमुटाव की गांठ लगने से इसमे शामिल रालोद के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह कांग्रेस से नाता तोड़कर अलग हो गये।

गठबंधन से नुकसान का सबक लेकर 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले लड़ने का फैसला लिया। इसका परिणाम आया तो पता चला कि कांग्रेस का पारंपारिक दलित वोट बैंक उसके पास से खिसककर जो बसपा में गया था, वह लौटा ही नहीं। इस चुनाव में कांग्रेस को वोट की सबसे बड़ी चोट लगने के साथ सीट का भी नुकसान हुआ। वोट प्रतिशत 29.13 प्रतिशत से घटकर 8.99 फीसदी हो गया वहीं सीटें 33 से घटकर 25 हो गयी।

कांग्रेस ने 2012 में एक बार फिर रालोद से गठबंधन किया, लेकिन कुछ खास नहीं कर सकी, न वोट प्रतिशत बढ़ा न ही सीटें बढ़ीं। इस तरह 1996 में बसपा से हाथ मिलाने से हुए सबसे बड़े नुकसानकी भरपाई कांग्रेस आज तक नहीं कर सकी, एक बार फिर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की खिचड़ी पकी। 27 साल यूपी बेहाल का नारा देने के साथ शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के बाद इस बार भी गठबंधन को वोट की गहरी चोट लगी। इस चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत आधे से ज्यादा 06.02 फीसदी हो गया वहीं सीट एक चौथाई होकर मात्र 7 रह गई।


गठबंधन ने निकाली साइकल की हवा
सियासत के मैदान में जोड़तोड़ में माहिर मुलायम सिंह यादव नब्बे के दशक में जब समाजवादी पार्टी बनाने के साथ पहली बार चुनाव मैदान में उतरे उस समय देश जाति-धर्म की आग में जल रहा था। एक तरफ आरक्षण की आग दूसरी तरफ राममंदिर आंदोलन की हवा। ऐसे माहौल में समाजवादी पार्टी ने 1993 में बसपा के मुखिया कांशीराम के साथ समझौता किया। देश में साम्प्रदायिक शक्तियों को रोकने के लिए हुए इस गठबंधन में सपा 256 सीट पर चुनाव में उतरी तो 109 सीट पर सफलता मिली। नारा गूंज रहा था मिले मुलायम-कांसीराम, हवा हो गए जयश्रीराम।

सपा-बसपा का गठबंधन जल्द टूट गया। 1996 में वामपंथी सहित कई दलों के साथ समझौता करके मैदान में फिर मुलायम उतरे तो न सिर्फ एक सीट का इजाफा हुआ बल्कि वोट प्रतिशत भी बढ़ा। 2002 में गठबंधन से सपा को वोट की चोट लगी। सीट की संख्या बढ़कर 143 हो गयी लेकिन वोट प्रतिशत पांच फीसदी गिर गया। 2007 में गठबंधन के बाद वोट प्रतिशत जस का तस रहा लेकिन सीट घटकर 97 हो गयी।

2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के चेहरे संग युवा को लुभाने वाले वादे न सिर्फ कारगर साबित हुए बल्कि 224 सीट पर ऐतिहासिक सफलता मिली वहीं पिछले चुनाव की तुलना में वोट प्रतिशत भी बढ़ा। 2014 के चुनाव सपा के लिए गठबंधन की खिचड़ी सबसे ज्यादा कड़ी साबित हुई। कांग्रेस से गठबंधन के बाद चुनाव मैदान में उतरी सपा के मतों में आठ फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी वहीं सीटें भी मात्र 47 ही हिस्से में आयी।


गठबंधन बगैर भी हाथी गई पिचक
चुनावी गठबंधन से कांग्रेस व सपा को जहां गहरी चोट लगी वही कभी इससे सत्ता की सीढ़ी हासिल करने वाली बीएसपी इस बार अकेले दम पर चुनाव लड़ी लेकिन उसकी हाथी बहुत पिचक यूपी में 1991 के विधानसभा चुनावों में बसपा 10.26 फीसदी मतों के साथ सिर्फ 12 सीटों तक ही सीमित थी। पांच साल बाद 1996 में जब कांग्रेस ने सहयोगी दल बनाया तो बसपा का ग्राफ तेजी से ऊपर पहुंच गया। बसपा का वोट 10.26 फीसदी से बढ़कर 27.73 फीसदी हो गया, वहीं सीटों की संख्या 12 से बढ़कर 67 हो गयी। गठबंधन से वोट का प्रतिशत के साथ बढ़ी सीट को बसपा ने सत्ता की सीढ़ी के रूप में उपयोग किया।

2007 में बसपा ने अकेले दम पर न सिर्फ चुनाव लड़ा बल्कि पूर्ण बहुमत से सरकार में आ गयी। गठबंधन से मिले फायदे को सत्ता की सीढ़ी बना चुकी बसपा इससे कांग्रेस और भाजपा को हुए नुकसान का इतिहास देखते हुए किसी से गठबंधन नहीं करने का फैसला किया। 2017 में अकेले चुनाव लड़ी बीएसपी की सोशल इंजीनियिरंग बीजेपी के मोदी लहर के आगे फेल हो गयी। चार फीसदी वोटों में गिरावट दर्ज होने के साथ सीटों एक चौथाई भी नहीं नसीन हुई। इस चुनाव में बीएसपी को 22.2 प्रतिशत वोट ही जहां मिले वहीं 19 सीट ही उसके हिस्से में आई।


गठबंधन के कीचड़ में खिला कमल
चुनावी गठबंधन से कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा चोट खाने वाली पार्टी बीजेपी है। रामलहर के दौरान 1991 में कल्याण सिंह की अगुवाई में बीजेपी ने चमत्कार किया। इस चुनाव में वोट प्रतिशत 31 प्रतिशत होने के साथ 415 में से 221 सीटों पर कमल खिला। दो साल बाद 1993 में जब फिर चुनाव हुआ तो बीजेपी का वोट 3.30 फीसदी बढ़ा लेकिन लेकिन 422 में से 177 सीट पर सिमट गयी। इस चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने सत्ता से उसको दूर कर दिया।

1996 में बीजेपी फिर अकेले दम पर 414 सीटों पर चुनाव लड़कर 174 सीटें मिलीं। गठबंधन की चोट बीजेपी को 2002 में लगी। बीजेपी राजनाथ सिंह की अगुवाई में राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल, लोकतांत्रिक कांग्रेस और जदयू से गठबंधन कर 320 सीटों पर खुद चुनाव मैदान में उतरी। इस चुनाव में सीटें घटकर जहां 88 हो गयी वहीं वोट भी नीचे लुढ़ककर 25.31 प्रतिशत हो गया। 2007 में बीजेपी अपना दल के साथ गठबंधन करके उसको 37 सीट देकर खुद 350 सीटों पर उतरी। इस बार बीजेपी को सीटों का नुकसान हुआ वह 88 से गिरकर 51 सीट हो गयी।

2012 में जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन करके 398 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन महज 47 सीट ही हाथ लगी। इस बार भाजपा फिर अपना दल (अनुप्रिया गुट), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से दोस्ती करके मैदान में उतरी। पिछले गठबंधन से लगी चोट को इस बार मोदी लहर ने न सिर्फ बराकर कर दिया बल्कि वोट प्रतिशत में दोगुना से ज्यादा बढ़ोत्तरी के साथ सीटों में ऐतिहासिक इजाफा होकर 312 पर पहुंच गई।
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दिनेश मिश्र

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