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समाजवादी परिवार में झगड़े की इनसाइड स्टोरीज

जिस यादव परिवार की भव्यता देखते बनती थी, उसकी बुनियाद इतनी कमजोर होगी, इसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा हो। जब इमारत भरभरा कर गिरी तब पता चल रहा है कि रिश्तों की ईंट में तो भरोसे का मसाला कबका पकड़ खो चुका था। ऐसी परिस्थिति में इस इमारत का यही हश्र होना था।

नदीम | नवभारत टाइम्स 24 Oct 2016, 2:14 am

नई दिल्ली

नवभारतटाइम्स.कॉम inside story of feud in samajwadi party
समाजवादी परिवार में झगड़े की इनसाइड स्टोरीज

जिस यादव परिवार की भव्यता देखते बनती थी, उसकी बुनियाद इतनी कमजोर होगी, इसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा हो। जब इमारत भरभरा कर गिरी तब पता चल रहा है कि रिश्तों की ईंट में तो भरोसे का मसाला कबका पकड़ खो चुका था। ऐसी परिस्थिति में इस इमारत का यही हश्र होना था।

यहां से शुरू हुआ था समाजवादी परिवार में झगड़ा
मुलायम सिंह यादव की यह बात 100 फीसद सही है कि जब अखिलेश की दुनियादारी को समझने की उम्र भी नहीं थी, तब शिवपाल उनके साथ पार्टी खड़ी करने में पसीना बहा रहे थे। शिवपाल को मुलायम का स्वाभाविक तौर पर राजनैतिक उत्तराधिकारी समझा जाता था और पार्टी के अंदर उन्हें उसी अनुरूप महत्व भी मिलता था। 2009 में अखिलेश की राजनीति में एंट्री होती है। यूपी में 2012 के चुनाव से पहले राहुल गांधी की सक्रियता, युवाओं में उनकी बढ़ती घुसपैठ और राज्य में युवा वोटरों की भूमिका को देखते हुए मुलायम ने राज्य में अखिलेश यादव को पार्टी की कमान सौंप दी।

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अखिलेश को यह कमान शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाते हुए सौंपी गई थी। शिवपाल को उस वक्त यह बात अच्छी नहीं लगी थी, लेकिन उसे स्वीकार करना मजबूरी थी। 2012 के चुनाव में एसपी को जब बहुमत मिला तो परिवार में बहस शुरू हुई कि मुख्यमंत्री कौन बने। शिवपाल की चाहत थी कि अखिलेश यादव सीएम न होने पाएं। इसके लिए वह 2014 के लोकसभा चुनावों का हवाला देकर मुलायम को मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात कर रहे थे, लेकिन रामगोपाल अखिलेश को सीएम बनाए जाने के पैरोकार थे।

उन्होंने मुलायम को समझाया कि पिता होने के नाते वह अखिलेश को अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं तो इससे अच्छा मौका और नहीं होगा। अखिलेश सीएम हो गए, लेकिन परिवार में पाला खिंच गया। शिवपाल को यह बात टीसती रही और उनके लोग उन्हें समझाते रहे कि अगर आपने हक न मांगा तो अखिलेश के पीछे चलना आपकी मजबूरी बनी रहेगी।

2012 में वोट किसके नाम पर मिला
मुलायम कह रहे हैं कि 2012 के चुनाव में पार्टी को वोट उनके नाम पर मिला। वोटर्स और पार्टी दोनों ही उन्हें मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अखिलेश को बनवा दिया। यह सही है कि 2012 के चुनाव में सपा ने अखिलेश को सीएम पद के लिए उम्मीदवार नहीं घोषित किया था, लेकिन अखिलेश स्टार प्रचारक थे। तत्कालीन मायावती सरकार के खिलाफ उनकी साइकल यात्रा ने राज्य में समाजवादी पार्टी के लिए माहौल बनाया। अखिलेश के सौम्य चेहरे, नई सोच और कम उम्र ने राज्य में पार्टी के परम्परागत वोट बैंक (यादव और मुसलमान) के इतर दूसरी जातियों में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाई।

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वो ताजा हवा की मानिंद थे। जो लोग अलग-अलग वजहों से पार्टी को पसंद नहीं करते थे, उन्होंने भी अखिलेश के नाम पर साइकल को वोट कर दिया। कुछ लोगों ने ऐसा इस वजह से किया कि यह मुलायम वाली नहीं, अखिलेश यादव वाली एसपी है। कुछ लोगों का यह कहना था कि उन्होंने एसपी को नहीं, अखिलेश को वोट दिया है। शायद यही वजह थी कि मुलायम के राजनैतिक जीवन का यह पहला चुनाव था, जब उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। अगर अखिलेश उस वक्त मुख्यमंत्री नहीं बनते तो शायद वोटर्स के एक बड़े वर्ग को निराशा हाथ लगती।

मुलायम की नाखुशी की वजह
एक पिता के रूप में भावनाओं के तात्कालिक उभार ने उन्हें अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला करने को तो मजबूर कर दिया था, लेकिन वह मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा को खत्म नहीं कर सके। वह लगातार संदेश देने की कोशिश करते रहे कि सरकार का रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथ में है। उन्होंने सरकार के कामकाज में दखलअंदाजी बनाए रखी। दरअसल जिस पार्टी के वह राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उसका वजूद सिर्फ यूपी तक ही है। कहीं न कहीं उन्हें यह डर भी सालता रहा कि अगर उन्होंने अखिलेश को यूपी में पार्टी और सरकार पूरी तरह सौंप दी तो फिर वो एक तरह से रिटायर ही मान लिए जाएंगे।

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अपने महत्व को दिखाने के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अखिलेश सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने से गुरेज नहीं किया। उधर अखिलेश 2017 के चुनाव की तैयारी में अपने को रबर स्टांप की छवि से उबारने में जुटे तो मुलायम को लगा कि अखिलेश उनके हाथ से न निकल जाएं। इसके लिए उन्होंने शिवपाल को पार्टी का राज्य प्रभारी बना कर अखिलेश पर नियंत्रण करना चाहा। उसके बाद पार्टी में जो कुछ घटता गया वो अब सबके सामने है।

अमर फैक्टर का असर
अखिलेश यादव को लगता है कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटवाने में अमर सिंह का हाथ है। अमर सिंह उनके खिलाफ शिवपाल यादव को ताकत दे रहे हैं। अमर सिंह को मुलायम सबसे भरोसे और काम का आदमी मानते हैं। अमर जब पार्टी में नहीं थे तब भी मुलायम अमर सिंह की तारीफ करते थे और पार्टी में उनका कोई विकल्प न होने पर अफसोस भी जाहिर करते थे। अखिलेश का अमर को पसंद न करने की वजह यह है कि अमर अखिलेश को महत्व नहीं देते हैं। अमर की वापसी का अखिलेश इसीलिए विरोध कर रहे थे कि उन्हें इस बात का डर था कि वह उनके खिलाफ माहौल बनाएंगे। चूंकि वह नेताजी के विश्वासपात्र हैं, इसलिए उनसे निपटना आसान नहीं होगा। अमर की वापसी के बाद वही कुछ हुआ जिसका डर अखिलेश को था।

साधना यादव की भूमिका
मुलायम की दूसरी पत्नी और अखिलेश की सौतेली मां साधना यादव सार्वजनिक रूप से इसलिए चर्चा में हैं कि एमएलसी उदयवीर ने उन पर सीएम के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगा दिया है और शिवपाल को उनका राजनैतिक चेहरा बता दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि परिवार में बहुत दिनों से कलह चल रही है कि सब कुछ अखिलेश को मिलता जा रहा है, प्रतीक यादव (अखिलेश के सौतेले भाई) को क्या मिला? अखिलेश को सीएम बनाकर नेताजी ने एक तरह से उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

अखिलेश की पत्नी को सांसद बना दिया गया, लेकिन प्रतीक की पत्नी को कुछ नहीं मिला। कहा जाता है कि एक मां के रूप में साधना अपनी इस चिंता से कई बार मुलायम सिंह यादव को वाकिफ भी करवा चुकी हैं। इसी को देखते हुए प्रतीक की पत्नी को विधानसभा का टिकट दिया गया है और प्रतीक के लिए भी विकल्प तलाशने का वादा हुआ है। परिवार को करीब से जानने वाले कहते हैं कि साधना यादव और भाई प्रतीक से अखिलेश के रिश्ते कभी मधुर नहीं रहे। इधर शिवपाल यादव अपनी भाभी का पहले से कहीं ज्यादा भरोसा जीतने में कामयाब हुए हैं। इसी वजह से यह अटकलें लग रहीं हैं कि शिवपाल को नेताजी की तरफ से ज्यादा तवज्जो मिल रही है।

लेखक के बारे में
नदीम
नदीम नवभारत टाइम्स लखनऊ के स्थानीय संपादक हैं। लगभग तीन दशक से पत्रकारिता में हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने इस पेशे का चुनाव किया। दैनिक जागरण में बतौर ट्रेनी शुरू हुआ उनका सफर इसी अखबार में अलग-अलग पदों से गुजरता हुआ मई 2013 में स्टेट ब्यूरो चीफ के पद पर खत्म हुआ। मई 2013 में ही उन्होंने नवभारत टाइम्स में बतौर सहायक सम्पादक अपनी नई पारी शुरू की। वह इसी अखबार में नैशनल पॉलटिकल एडिटर भी रहे। कलम के जरिए कमजोरों को ताकत देने की हर मुमकिन कोशिश उनका शौक है। सत्ता के मद में चूर लोगों को हकीकत का आइना भी दिखाने का काम करते रहे हैं। उन्होंने यह सीख पढ़ाई के दौरान ली थी जब छात्रों के हकों के लिए लड़ने के उनके जज्बे ने उन्हें कब उनका नेता बना दिया, यह पता नहीं चला। वह लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के लिए निर्वाचित हुए। बाद में उन्होंने छात्र राजनीति को अलविदा कह पत्रकारिता को ही अपना धर्म मान लिया।... और पढ़ें

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