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उस रोज यूपी में भी CM बनने को थे कई नाम...लेकिन अचानक आया एक चेहरा और बना दिया गया मुख्यमंत्री

1999 के उस दौर में बीजेपी का आंतरिक गतिरोध चरम पर था। यूपी में बीजेपी के नेताओं के बीच सीएम पद के लिए कई नाम थे, लेकिन अचानक एक ऐसा नाम सामने आया, जिसे अचानक से सीएम बना दिया गया।

नवभारतटाइम्स.कॉम 12 Mar 2021, 12:33 pm
राजनीति को अनंत संभावनाओं का खेल यूं ही नहीं कहा जाता। उत्तराखंड में सरकार के नेतृत्व परिवर्तन के बाद जिन लोगों को संभावित मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा था, उनमें से किसी के हाथ यह पद नहीं आया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, पूर्व में भी कई राज्यों में ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जब नेतृत्व परिवर्तन के लिए विकल्प की तलाश में बाजी ऐसे नेताओं के हाथ लगी, जो कहीं रेस में नहीं थे। ऐसे ही दो मुख्यमंत्रियों की कहानी बता रहे हैं नदीम:
नवभारतटाइम्स.कॉम story of ram prakash gupta who became cm of up coincidently
उस रोज यूपी में भी CM बनने को थे कई नाम...लेकिन अचानक आया एक चेहरा और बना दिया गया मुख्यमंत्री



मायावती के साथ चल रही थी सरकार

वह साल 1997 था। यूपी में कल्याण सिंह मायावती के साथ छह-छह महीने के एग्रीमेंट पर सीएम बने थे। जब मायावती ने अपना समर्थन वापस लेने का फैसला किया तो उन्होंने विधायकों को तोड़कर बगैर मायावती के समर्थन के सरकार बना ली। लेकिन 1999 आते-आते उनका अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव शुरू हो गया। अंतत: केंद्रीय नेतृत्व ने तय कर लिया कि उन्हें हटाया जाएगा। हटाने का फैसला करना जितना मुश्किल था, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल साबित हुआ यह तय करना कि उनकी जगह किसको बनाया जाए?

राजनाथ समेत कई नेता थे लिस्ट में शामिल

सीएम की रेस में बड़े-बड़े चेहरे थे- राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, केशरीनाथ त्रिपाठी, लाल जी टंडन, ओम प्रकाश सिंह, विनय कटियार। इन सबके बीच 36 का आंकड़ा। कोई किसी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था। केंद्रीय नेतृत्व को पता था कि इनमें से किसी एक को सीएम बनाया तो बाकी उसकी सरकार नहीं चलने देंगे।

अचानक 77 साल के रामप्रकाश गुप्ता बन गए सीएम

इससे बचने को 12 नवंबर 1999 को पार्टी नेतृत्व ने चौंकाने वाला फैसला किया। 77 साल के रामप्रकाश गुप्त को सीएम बना दिया गया। यह चौंकाने वाला फैसला इसलिए था कि वह करीब डेढ़ दशक से राजनीति की मुख्यधारा से बाहर होकर घर में रिटायरमेंट वाला जीवन जी रहे थे। किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। पार्टी का कोई नेता शायद ही कभी उनके घर की तरफ रुख करता रहा हो लेकिन उनकी पहचान यह थी कि वह जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में थे। चरण सिंह की कैबिनेट में डेप्युटी सीएम रह चुके थे। 1977 में यूपी में जनता पार्टी की सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर थे। चूंकि उन्हें रिटायर मान लिया गया था, इसलिए पार्टी के अंदर न तो उनका कोई गुट था और न ही वह किसी गुट का हिस्सा माने जाते थे।

अटल-आडवाणी जानते थे, यही होगा सही फैसला

बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में शामिल अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी समेत तमाम सीनियर नेता ये जानते थे कि संकट के उस मौके के लिए उनसे बेहतर और कोई विकल्प नहीं हो सकता था। मुख्यमंत्री बनने के बाद पता चला कि उम्र उन पर इतनी हावी हो चुकी है कि वे अपने मंत्रियों के नाम भी भूल जाते हैं। वे किसी भी सियासी सिफारिश पर ‘ना’ नहीं करते थे। कुछ ही दिन में उन्हें सबसे कमजोर मुख्यमंत्री कहा जाने लगा, उस पर भी उन्हें एतराज नहीं हुआ। उन्होंने खुद कहा था कि ‘कमजोर सबको स्वीकार होता है।’ यह बात अलग है कि उन्हें एक साल के अंदर ही मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ गया था।

जब उमा भारती को छोड़नी पड़ी कुर्सी और MP में बदले समीकरण

दूसरी ओर एमपी में साल 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में बीजेपी राज्य में लगातार दस साल से सत्तारूढ़ कांग्रेस को पराजित कर सत्ता में पहुंची थी। उमाभारती का मुख्यमंत्री बनना स्वाभाविक था। उन्होंने शान-औ-शौकत के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली लेकिन महज दस महीने के अंदर उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया। दरअसल एक पुराने मामले में उनके खिलाफ अदालत ने वारंट जारी कर दिया था। विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ गया। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि केंद्रीय नेतृत्व को उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहना पड़ा लेकिन वह इस्तीफा देने को तभी राजी हुईं जब केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी यह शर्त मान ली कि अगला मुख्यमंत्री उनकी ही पसंद का होगा। उमा भारती ने यह शर्त इसलिए लगाई थी कि वह अपनी वापसी का रास्ता खुला रखना चाहती थीं। उनकी इच्छा थी कि जैसे ही वारंट वाला मामला निपटे, वह दोबारा सीएम पद पर वापसी कर लें।

गंगाजल की शपथ दिलाकर बाबूलाल से कहा- इस्तीफा देना होगा

उनके इस्तीफे के बाद जो अन्य लोग रेस में थे, उनमें शिवराज चौहान भी शामिल थे, उनसे वह यह उम्मीद नहीं कर रहीं थीं कि वे उनके कहने पर इस्तीफा देंगे। इसके लिए उन्होंने बाबू लाल गौर का नाम चुना। वह इस पद की रेस में थे ही नहीं। उन्होंने कभी ऐसी महत्चाकांक्षा दिखाई भी नहीं थी। वह पिछड़ी जाति (यादव) से आते थे लेकिन उन्होंने सरनेम लगाकर ओबीसी वोटबैंक को गोलबंद करने की कोशिश तक नहीं की। इन्हीं सब बातों के मद्देनजर उमा भारती ने उनसे अपने लिए कोई खतरा नहीं देखा था। राजनीतिक गलियारों में उस वक्त यह चर्चा आम थी कि मुख्यमंत्री पद के लिए संविधान की शपथ लेने से पहले उमा भारती ने बाबू लाल गौर को गंगा जल लेकर शपथ दिलवाई थी कि जब वह कहेंगी तो उन्हें इस्तीफा देना होगा। इस शपथ के बाद अगस्त 2004 में बाबू लाल गौर ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में वह उमा भारती के ‘रबर स्टैंप’ की छवि से बाहर निकलने में जुटे तो दोनों के रिश्ते अच्छे नहीं रह गए। पार्टी की अंदरूनी उठापटक के चलते उन्हें 15 महीने के अंदर ही इस्तीफा देना पड़ा लेकिन उमा भारती की वापसी नहीं हो पाई, उनके इस्तीफे के बाद शिवराज चौहान सीएम बने थे।

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