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जज चुनने का तरीका

जजों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कलीजियम सिस्टम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट सहमत हो गया है। याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए नई तय प्रक्रिया बनाए जाने की जरूरत बताई गई है।

Written byएनबीटी डेस्क | नवभारत टाइम्स 19 Nov 2022, 5:38 am
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के जजों की नियुक्ति प्रक्रिया का सवाल एक बार फिर बहस में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को मौजूदा कलीजियम सिस्टम को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया। जजों द्वारा जजों की नियुक्ति के इस सिस्टम पर बहस लंबे समय से चल रही है। आलोचक इसे इस आधार पर अनुपयुक्त करार देते हैं कि जज खुद ही जजों को चुनेंगे तो भाई-भतीजावाद को बढ़ावा मिलने का संदेह बना रहेगा, जिससे न्यायपालिका की असंदिग्ध विश्वसनीयता सुनिश्चित करने का उद्देश्य बाधित होगा। इस सिस्टम के पक्ष में यह कहा जाता है कि भारत में व्यवहार में यह व्यवस्था सही साबित हुई है और अब तक का अनुभव इसकी पुष्टि करता है। मगर बहस से एक कदम आगे बढ़ते हुए केंद्र सरकार ने इस व्यवस्था को समाप्त करने के उद्देश्य से 2014 में एक बिल लाकर नैशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमिशन का गठन भी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में उसे खारिज करते हुए कलीजियम सिस्टम को ही बहाल रखा। उस समय से लेकर अब तक केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के स्टैंड में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
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कलीजियम सिस्टम के खिलाफ याचिका


केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू हाल में भी कलीजियम सिस्टम की आलोचना कर चुके हैं। दूसरी ओर, याचिका को लिस्ट किए जाने पर हामी भरने से ठीक पहले बेंच की अगुवाई कर रहे सीजेआई जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने एक बार फिर ध्यान दिलाया कि 2015 में ही सुप्रीम कोर्ट कलीजियम सिस्टम को बहाल करने का फैसला कर चुका है। ऐसे में इस बात की संभावना बहुत कम है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका में से कोई इस अहम मसले पर अपना रुख बदलेगा।

वजह यह है कि जहां केंद्र सरकार जजों द्वारा जजों के चुने जाने को कई वजहों से गलत समझती है, वहीं सुप्रीम कोर्ट की मुख्य चिंता यह है कि किसी और व्यवस्था को अपनाने से कहीं जजों की नियुक्ति का अधिकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कार्यपालिका के हाथों में चला गया तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। जाहिर है, कोई बीच की राह निकल पाएगी ऐसा कम से कम पहली नजर में नहीं लगता। मगर तत्काल कोई हल न दिख रहे होने के बावजूद इस सवाल पर बहस और विचार-विमर्श जारी रहना चाहिए क्योंकि भविष्य में कोई भी बेहतर व्यवस्था इसी प्रक्रिया से उभरेगी।

इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि जब तक जजों की नियुक्ति की कोई वैकल्पिक और बेहतर व्यवस्था नहीं उभरती, तब तक एक तो नए जजों की नियुक्ति का काम अटकाए न रखा जाए और दूसरा, मौजूदा कलीजियम व्यवस्था को बेहतर बनाने का अजेंडा भी टाला न जाए। जजों के चयन में पारदर्शिता लाने और नए जज चुने जाने के आधार को ज्यादा तार्किक बनाने जैसे कई पहलू हैं जिन पर काम करके इसमें सुधार किया जा सकता है और इसी व्यवस्था से बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।
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एनबीटी डेस्क
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