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उम्मीदों का बांध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गुजरात के केवडिया कस्बे में सरदार सरोवर बांध राष्ट्र को समर्पित किया। इस तरह 56 सालों से चली आ रही एक विवादास्पद परियोजना आखिरकार अपने मुकाम तक पहुंच गई।

नवभारत टाइम्स 19 Sep 2017, 8:39 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गुजरात के केवडिया कस्बे में सरदार सरोवर बांध राष्ट्र को समर्पित किया। इस तरह 56 सालों से चली आ रही एक विवादास्पद परियोजना आखिरकार अपने मुकाम तक पहुंच गई। इस बांध का मामला जिस तरह सरकारों और परियोजना का विरोध करने वालों के बीच झूल रहा था उससे कई बार यह आशंका होती थी कि पता नहीं यह कभी पूरा हो भी पाएगा या नहीं। वैसे तो सरदार सरोवर बांध का सपना आजादी के पहले ही देखा गया था, जब बड़े-बड़े बांध कृषि क्षेत्र में चमत्कारिक बदलाव और बिजली उत्पादन के सुरक्षित साधन के रूप में देखे जाते थे। हमारे देश में कई बांध इन उम्मीदों पर खरे भी साबित हुए लेकिन भाखड़ा नंगल बांध और सरदार सरोवर बांध के बीच बुनियादी फर्क यह है कि इनमें दूसरे वाले को बनते-बनते पांच दशक से भी ज्यादा वक्त गुजर गया। इतनी लंबी अवधि में प्रकृति से हमारा रिश्ता और पर्यावरण को लेकर हमारी सोच बदल गई है। बड़े बांधों के निर्माण की थिअरी पर अहम सवाल उठे हैं तो पुराने बांधों के नकारात्मक प्रभाव भी दर्ज किए गए हैं। इन वजहों से सरदार सरोवर परियोजना को लेकर देश में वह रोमांच नहीं देखा गया जो पहले देखा जाता रहा होगा।
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बावजूद इसके, परियोजना से लाभ की संभावना इससे होने वाले नुकसान की दलीलों पर भारी पड़ी। इससे गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाकों की करीब बीस लाख हेक्टेयर कृषि भूमि के लिए सिंचाई का पानी और लाखों लोगों के लिए पेयजल उपलब्ध हो सकेगा। करीब छह हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन भी इससे होगा। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि इसकी वजह से मध्य प्रदेश के 192, महाराष्ट्र के 33 और गुजरात के 19 गांवों का नामोनिशान मिट जाएगा। दरअसल विस्थापन और पुनर्वास के प्रश्न इस परियोजना की शुरुआत से ही उठते आ रहे हैं। इन मुद्दों पर एक प्रभावशाली आंदोलन चला जिसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ और विश्व बैंक ने इस परियोजना को दी जाने वाली सहायता रोक दी। जुडिशरी ने भी विस्थापितों के पक्ष में कई बार हस्तक्षेप किया। एक समय ऐसा लगा कि पूरा देश इसके पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है लेकिन फिर समर्थन का पलड़ा भारी होता गया। शायद इसीलिए नर्मदा बचाओ आंदोलन ने अपना मूवमेंट वापस लेते हुए अपना ध्यान विस्थापितों के पुनर्वास पर केंद्रित करने का फैसला किया है। परियोजना की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब बड़े पैमाने पर इसके लाभ आम लोगों तक पहुंचें। इस क्रम में विस्थापितों की शिकायत पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए और केंद्र सरकार की पहल पर उनकी समस्याएं दूर की जानी चाहिए।

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