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संपादकीय : कश्मीर में नए वोटरों पर सवाल, बेवजह न बढ़े विवाद

Jammu and Kashmir Voter News : जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले ही वोटर लिस्ट में नए नाम जोड़े जाने को लेकर विवाद पैदा हो गया है। इस पर जम्मू-कश्मीर के नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इसे जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील बताया है।

Produced byएनबीटी डेस्क | नवभारत टाइम्स 20 Aug 2022, 8:29 am
जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले ही वोटर लिस्ट में नए नाम जोड़े जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहां के मुख्य चुनाव अधिकारी ने बुधवार को बताया कि जो मतदाता सूची तैयार की जा रही है, उसमें 25 लाख नए वोटरों के नाम जोड़े जाने की उम्मीद है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र शासित प्रदेश में वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने के लिए डोमिसाइल सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होगी। इस पर जम्मू-कश्मीर के नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इसे जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील बताया है।
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पूर्व मुख्यमंत्री और नैशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूख अब्दुल्ला ने सोमवार 22 अगस्त को अपने आवास पर इस सिलसिले में एक बैठक बुलाई है। बैठक में बीजेपी को छोड़कर जम्मू-कश्मीर के सभी प्रमुख दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया है। इन नेताओं की इस तीखी प्रतिक्रिया का कारण यह है कि इन्हें लग रहा है इसके जरिए सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती है। कुछ बातें ऐसी हैं जो इस आशंका को हवा दे रही हैं। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 और 35ए समाप्त किए जाने से स्थानीय नागरिकों को जमीन, रोजगार और नागरिकता में मिली कथित सुरक्षा समाप्त हो गई। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में 15 साल से रह रहे तमाम भारतीय नागरिकों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट दिया जाने लगा।
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अब मुख्य चुनाव अधिकारी के मुताबिक मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए डोमिसाइल सर्टिफिकेट की भी जरूरत नहीं होगी। स्थानीय निवासियों को लग रहा है कि इन उपायों से 20-25 लाख (14 फीसदी से ऊपर) नए मतदाताओं के जरिए इस क्षेत्र का डेमोग्राफिक स्वरूप बदलने की कोशिश हो रही है। हालांकि मुख्य चुनाव अधिकारी के मुताबिक इनमें से बड़ा हिस्सा नए वोटरों का है, जिन्होंने इस बीच 18 साल की आयु सीमा पार की है। फिर यह बात भी है कि देश के अन्य हिस्से के जो लोग यहां रह रहे हैं, उन्हें वोट के अधिकार से वंचित रखने की वकालत नहीं की जा सकती।

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इसमें भी दो राय नहीं कि जो बदलाव किए जा रहे हैं, वे नियम कानूनों के अनुरूप ही किए जा रहे हैं। मगर इन सबकी सार्थकता तभी है, जब जम्मू-कश्मीर के लोगों को साथ लेते हुए, उनका भरोसा बनाए रखते हुए आगे बढ़ा जाए। यह बात सही है कि किसी खास दल या नेता को इस क्षेत्र की पूरी आबादी का प्रवक्ता नहीं माना जा सकता, लेकिन इसमें भी शक नहीं कि स्थानीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा इनसे जुड़ा रहा है, इन्हें वोट देता रहा है। ऐसे में इन्हें दरकिनार करने के बजाय बातचीत के जरिए इनकी आशंकाएं दूर करना और जहां तक संभव हो इन्हें साथ लेते हुए आगे बढ़ना उपयुक्त होगा।
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