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 पाकिस्तान को झटका

ऐन मौके पर सार्क सम्मेलन स्थगित हो जाने से पाकिस्तान की समझ में आ गया होगा कि आतंकवाद पर... 

नवभारत टाइम्स 28 Sep 2016, 11:27 pm
ऐन मौके पर सार्क सम्मेलन स्थगित हो जाने से पाकिस्तान की समझ में आ गया होगा कि आतंकवाद पर उसका खेल अब ज्यादा दिन नहीं चल सकता। दुनिया के सामने उसकी पोल खुल चुकी है और अब भी उसने अपना रवैया नहीं बदला तो एकदम अकेला पड़ जाएगा। उड़ी हमले के बाद पाक को अलग-थलग करने की भारतीय रणनीति रंग लाती दिख रही है। पिछले दिनों भारत ने साफ कर दिया था कि अगले महीने इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मेलन की बैठक में वह हिस्सा नहीं लेगा। इस घोषणा का मकसद पाकिस्तान को यह संदेश देना था कि हम उससे किसी भी तरह का संबंध तभी रखेंगे, जब वह आतंकी ढांचों को पालने-पोसने की अपनी नीति से बाज आएगा। उसके बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भी भारत का साथ देते हुए सम्मेलन में शामिल न होने का निर्णय किया। वैसे, एक देश के भाग न लेने से भी सार्क सम्मेलन टल जाता है, लिहाजा वर्तमान अध्यक्ष नेपाल ने इसे स्थगित करने का फैसला किया, हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इसका औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है।
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 पाकिस्तान को झटका


सार्क का बहिष्कार करके भारत ने पूरी दुनिया को जता दिया है कि क्षेत्र विशेष को जोड़कर रखने वाला अकेला तत्व उसका भूगोल नहीं होता। दूसरी चीजें उसकी एकता के लिए ज्यादा मायने रखती हैं। पाकिस्तान जैसा देश अगर पड़ोसी राष्ट्रों के लिए लगातार समस्या खड़ी करता रहे तो ऐसे किसी सामूहिक प्रयत्न का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। देखने की बात है कि ऐसी हरकतों ने आखिर सार्क को कहां पहुंचाया है? इसकी स्थापना 1985 में आपसी सहयोग के जरिए दक्षिण एशिया में शांति, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समृद्धि हासिल करने के उद्देश्य से की गई थी। 1994 में दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साटा) समझौते पर हस्ताक्षर हुए। लेकिन, पाकिस्तान के कारण कभी अमन-चैन का माहौल ही नहीं बन पाया, जिससे व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता।

यही कारण है कि साटा विश्व का सबसे कमजोर मुक्त व्यापार संगठन बना हुआ है। विश्व व्यापार में सार्क का हिस्सा 5 प्रतिशत से भी कम है। आज भी व्यापारिक लेन-देन की प्रक्रिया में बाधाएं बरकरार हैं। सार्क देशों के बीच लोगों और उत्पादों की आवाजाही काफी मुश्किल है। उनका आपसी व्यापार उनके कुल व्यापार का सिर्फ 10 फीसदी है। आसियान जैसे क्षेत्रीय संगठन जहां अपने मकसद में काफी आगे बढ़ गए, वहीं सार्क अपनी शुरुआती जगह पर ही कदमताल कर रहा है। दक्षिण एशिया के और देश भी इसे समझ रहे हैं। पिछले महीने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अपनी भारत यात्रा में पाकिस्तान की आतंकी भूमिका की कड़ी आलोचना की थी। बांग्लादेश भी समझ चुका है कि उसके यहां उत्पात मचा रहे कट्टरपंथियों को कहां से खुराक मिल रही है। हमें अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ सख्ती की शर्त पर ही पाकिस्तान को सार्क में शामिल रहने देना चाहिए।

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