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नई राह पर जापान

नतीजा यह हुआ कि एक तरफ दुनिया भर में जापानी कंपनियों का तूती बोलती रही और एक समय वह दूसरे नंबर की आर्थिक ताकत बन गया था, दूसरी तरफ सामरिक मामले में उसकी कहीं कोई गिनती ही नहीं थी। अब पिछले कुछ सालों से जापानी समाज को यह बात बेचैन कर रही है कि...

नवभारत टाइम्स 24 Oct 2017, 11:14 am
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे का प्रचंड बहुमत से जीतकर सत्ता में वापस लौटना पूरे एशियाई क्षेत्र के शक्ति समीकरण के लिहाज से अहम है। जीत के तुरंत बाद आबे ने उत्तर कोरिया की ओर से आ रही चुनौतियों से सख्ती से निपटने की बात कहकर जो संकेत दिया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दरअसल जापानी समाज लंबे अर्से से एक दुविधा में जीता आ रहा है। एक समय बेहद लड़ाकू तेवरों के साथ साम्राज्य विस्तार करने में जुटे इस समाज में दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिकाओं के बाद युद्ध और हिंसा को लेकर गहरी जुगुप्सा देखने को मिली। हालांकि मित्र राष्ट्रों की ओर से लादी गई संधि भी इस शांतिवाद का एक बड़ा कारण बनी, लेकिन इस संधि के खिलाफ कभी कोई तीखी भावना जापानी समाज में इस दौरान विकसित होती नहीं दिखी। मोटे तौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के सत्तर साल बाद तक जापान आर्थिक विकास को ही अपना एकमात्र ध्येय मान कर चलता रहा।
नवभारतटाइम्स.कॉम shinzo abe is the prime minister of japan and has been holding the position since 2012
नई राह पर जापान


नतीजा यह हुआ कि एक तरफ दुनिया भर में जापानी कंपनियों का तूती बोलती रही और एक समय वह दूसरे नंबर की आर्थिक ताकत बन गया था, दूसरी तरफ सामरिक मामले में उसकी कहीं कोई गिनती ही नहीं थी। अब पिछले कुछ सालों से जापानी समाज को यह बात बेचैन कर रही है कि असाधारण आर्थिक विकास के बावजूद वह ढंग से अपनी रक्षा करने की स्थिति में भी नहीं है। उत्तर कोरिया जैसा छोटा और अल्प विकसित राज्य भी उसे आंखें दिखाता रहता है। देश की प्राथमिकताओं में जिस बदलाव की वकालत शिंजो आबे करते रहे हैं, उसकी ताकत उन्हें समाज के इसी मिजाज से मिलती है। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुई संधि में बदलाव की राह आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें संसद के अलावा जनमत संग्रह में भी जीत हासिल करनी होगी।

इस अड़चन को पार करना आबे के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि सशस्त्रीकरण को लेकर जापानी समाज अब भी काफी बंटा हुआ है। बहरहाल, याद रखना चाहिए कि दो तिहाई से ज्यादा बहुमत वाली सरकारें संधि के शब्दों को बदले बगैर, उसकी अलग व्याख्या के जरिए भी काफी कुछ करती रही हैं। देखना होगा कि अपने नए कार्यकाल में आबे इस नई राह पर कितने कदम आगे बढ़ने का फैसला करते हैं।

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