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24 साल में फैसला

1993 के मुंबई बम धमाके मामले में टाडा कोर्ट ने अबू सलेम...

नवभारत टाइम्स 18 Jun 2017, 1:04 pm
1993 के मुंबई बम धमाके मामले में टाडा कोर्ट ने अबू सलेम और मुस्तफा डोसा सहित छह आरोपियों को दोषी करार दिया। यह आरोपियों का दूसरा बैच है, जिस पर इस मामले में फैसला सुनाया गया है। इससे पहले 123 आरोपियों का मुख्य मुकदमा 2006 में पूरा हो चुका है, जिसमें 100 आरोपी दोषी करार दिए गए थे। अब इस मामले में कोई आरोपी हिरासत में नहीं है, इसलिए तात्कालिक तौर पर माना जा सकता है कि यह इस मामले का अंतिम फैसला है। लेकिन दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मोहम्मद डोसा और टाइगर मेमन सहित 33 आरोपी आज भी फरार हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें इस मामले का मुख्य कर्ता-धर्ता कहा जा सकता है। जब तक ये कानून के फंदे से बाहर हैं तब तक यह नहीं माना जा सकता कि यह मामला अपनी तार्किक परिणति तक पहुंच गया है।
नवभारतटाइम्स.कॉम verdict of 1993 blasts
24 साल में फैसला


1993 का मुंबई सीरियल ब्लास्ट देश में अपनी तरह का पहला बड़ा आतंकी हमला था। इसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। तब दुनिया के अन्य किसी भी देश में आतंकवाद अपने मौजूदा स्वरूप में सामने नहीं आया था। करीब आठ साल बाद 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 हमले की तुलना 1993 के मुंबई हमले से की जा सकती है। अमेरिका उस हमले से कुछ वैसा ही विचलित हुआ, जैसा तब भारत हुआ था। मगर दोनों देशों की प्रतिक्रिया में अंतर साफ देखा जा सकता है। अमेरिका ने बौखलाहट में कौन-कौन से कदम उठाए और वे कितने सही या गलत थे, इस तरह के सवालों को फिलहाल छोड़ दें तो इतना साफ है कि आतंकी हमले के दोषियों को सजा देने में अमेरिकी हुकूमत काफी तत्पर रही। आखिर ओबामा के कार्यकाल में ओसामा बिन लादेन को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इसके उलट भारत में कभी इस तरह की बेचैनी नहीं दिखी। न तो तत्कालीन नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में, न ही बाद की सरकारों में इस बात को लेकर कोई संकल्प दिखा कि सभी दोषियों के गिरेबान तक कानून का हाथ पहुंचे और वे सजा पाते हुए दिखें।

इसी का नतीजा था कि इस कत्लेआम को अंजाम देने वाले बड़े अपराधी कभी भी भागते हुए, बचते हुए, परेशान होते हुए नहीं दिखे। वे अपने-अपने ठिकानों पर कारोबार करते, क्रिकेट मैच देखते नजर आए, जबकि मुंबई एक के बाद एक हमले झेलती रही। कभी ट्रेन में ब्लास्ट तो कभी किसी बाजार में। फिर 2008 के 26/11 हमले में सड़कों पर नाचती मौत भी इस बहादुर शहर के हिस्से आई। सरकारों के दावे आते रहे, पर इन 24 सालों में उस नेटवर्क को भी नेस्तनाबूद नहीं किया जा सका, जो आज भी दुबई और कराची से सक्रिय है और कभी नकली नोट तो कभी किसी और संदर्भ में जिसका जिक्र होता रहता है। हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर इससे दुखद टिप्पणी और क्या हो सकती है?

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