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विशुद्ध राजनीति: एक ने विदा ली, एक विदा चाहता है!

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और तिवारी सरकार में औद्योगिक विकास राज्यमंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर उपाध्याय गांधी परिवार के करीबी माने जाते रहे हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में वह टिहरी से चुने गए थे और फिर 2007 में दोबारा विधायक चुने गए।

Authored byएनबीटी डेस्क | नवभारत टाइम्स 17 Jan 2022, 6:16 am
नई दिल्ली
नवभारतटाइम्स.कॉम swami prasad maurya and kishore upadhyay

यूपी की योगी सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य इस वक्त इसलिए चर्चा में हैं कि चुनाव से ठीक पहले उन्होंने बीजेपी छोड़कर न केवल सत्तारुढ़ दल को झटका दिया, बल्कि सरकार के कई अन्य मंत्रियों को ऐसा करने के लिए प्रेरित कर दिया। उधर उत्तराखंड में कांग्रेस नेता किशोर उपाध्याय पार्टी नेतृत्व के लिए पहेली बने हुए हैं। नेतृत्व के लिए उनकी मंशा जान पाना मुश्किल हो रहा है। दोनों राजनीतिक चेहरों के बारे में बता रहे हैं मनीष श्रीवास्तव और महेश पांडेय :

बहनजी के सबसे खास थे स्वामी
स्वामी प्रसाद मौर्य पिछली बार बीएसपी से बीजेपी में आए थे, तो इस बार वह बीजेपी से एसपी में गए हैं। पर इन दलों पर भरोसा करने से पहले वह 2016 में ‘लोकतांत्रिक बहुजन मंच’ भी बना चुके हैं। इस पार्टी के बैनर तले उन्होंने कई जिलों का दौरा किया लेकिन जब पार्टी जमीन पर खड़ी नहीं हो पाई तो बीजेपी में शामिल हो गए। लंबे समय तक बीएसपी में रहे मौर्य पार्टी प्रमुख मायावती के खास सिपहसालार थे। बीएसपी में एक वक्त ऐसा भी था, जब या तो मायावती बयान देती थीं या फिर स्वामी प्रसाद मौर्य। उन्हें मायावती ने दो बार नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बड़ा दर्जा दिया था। मौर्य 1996 में बीएसपी में आए थे। उन्हें पार्टी ने प्रदेश महासचिव बनाया। बीएसपी के टिकट पर पहली बार रायबरेली के डलमऊ से उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा। इस सीट से चुनाव जीतकर वह विधायक बने। उसके बाद 2009 में पडरौना विधानसभा से उपचुनाव लड़ा।

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यहां केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह की मां को हराया। वह मई 2002 से अगस्त 2002 तक दर्जा प्राप्त मंत्री रहे और अगस्त 2002 से सितंबर 2003 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। वह 2007 में बनी बीएसपी सरकार में भी 2007 से 2009 तक मंत्री रहे। जनवरी 2008 में उनको बीएसपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। बीएसपी को 2012 में मिली हार के बाद मायावती ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर नेता प्रतिपक्ष बनाया। उसके बाद 2016 में वह बीएसपी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए। 2017 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद श्रम मंत्री बने। उन्होंने अपनी बेटी संघमित्रा मौर्य को भी बदायूं से बीजेपी का सांसद बनवाया। प्रतापगढ़ में पैदा हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एलएलबी और एमए की पढ़ाई की और फिर 1980 में राजनीति में कदम रखा। वह इलाहाबाद युवा लोकदल के सदस्य बने। जून 1981 से लेकर 1989 तक वह महामंत्री रहे। इसके बाद 1989 से 1991 तक प्रदेश लोकदल के मुख्य सचिव रहे। वह 1991 में प्रदेश जनता दल के महासचिव बने और 1995 तक इस पद पर रहे। बीएसपी से बीजेपी और फिर बीजेपी से समाजवादी पार्टी में जाने के पीछे यह भी चर्चा है कि अब वह अपने बेटे उत्कर्ष मौर्य को टिकट दिलाना चाहते हैं और बीजेपी से बात न बनने पर एसपी में गए हैं।

पार्टी की मुश्किलें बढ़ाते किशोर

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और तिवारी सरकार में औद्योगिक विकास राज्यमंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर उपाध्याय गांधी परिवार के करीबी माने जाते रहे हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में वह टिहरी से चुने गए थे और फिर 2007 में दोबारा विधायक चुने गए। वर्ष 2008 से 2012 तक प्रदेश प्रवक्ता के साथ कांग्रेस विधानमंडल दल के सचेतक के रूप में भी काम कर चुके हैं, लेकिन उत्तराखंड विधानसभा चुनाव, 2012 में वह एक निर्दलीय प्रत्याशी से चुनाव हार गए। फिर 2014 से 2017 तक उत्तराखंड प्रदेश पार्टी अध्यक्ष रहे। उन्होंने यशपाल आर्य के बाद पदभार संभाला था। उनके कार्यकाल में पार्टी में एक बड़ा विद्रोह हुआ था। इसमें 9 विधायक सहित कई मंत्री भी शामिल थे और वे सारे बीजेपी से जुड़ गए।

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2017 के चुनावों में उन्होंने अपनी पुरानी सीट छोड़ सहसपुर से अपनी किस्मत आजमाई। लेकिन वह इस सीट से भी हार गए। किशोर उपाध्याय पर अब आरोप है कि वह पार्टी द्वारा लगातार दी जा रही चेतावनी के बाद भी पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो रहे हैं। दरअसल वह रेसकोर्स इलाके में बीजेपी के एक नेता से मुलाकात को लेकर सुर्खियों में आ गए। उसके बाद कांग्रेस असहज सी स्थिति में दिखाई दी। प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव ने उनको पार्टी के सभी पदों से हटा दिया। पार्टी के केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव की ओर से उनको इस बाबत एक पत्र जारी कर कहा गया है कि वह बीजेपी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ लगातार तालमेल बनाए हुए हैं। कई बार चेतावनी दी गई, लेकिन इसके बावजूद वह पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे।

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पार्टी प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव ने अपने पत्र में जिस सख्त लहजे का इस्तेमाल किया है, उससे साफ है कि पार्टी में किसी भी स्तर पर गुटबाजी या पार्टी विरोधी गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। कांग्रेस ने किशोर को चुनाव संचालन के लिए बनाई गई तमाम समितियों के सदस्य के साथ ही समन्वय समिति के चेयरमैन की जिम्मेदारी भी दी थी। बीजेपी के साथ-साथ उनके लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी मुलाकात की बात कही जाती है। किशोर कई मौकों पर ऐसे बयान भी देते दिखे, जिससे लगा कि वह पार्टी लाइन से बाहर जा रहे हैं।
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