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पापा ने दिए पंख

जिंदगी में हम जो भी कुछ हासिल करते हैं, उसके पीछे हमारे पिता की बहुत बड़ी भूमिका होती है। ऐसी तमाम शख्सियतें हैं, जो आज फलक पर हैं और उनके यहां तक आने में पिता का भी बहुत बड़ा संघर्ष रहा है...

नवभारत टाइम्स 19 Jun 2016, 8:14 am
जिंदगी में हम जो भी कुछ हासिल करते हैं, उसके पीछे हमारे पिता की बहुत बड़ी भूमिका होती है। ऐसी तमाम शख्सियतें हैं, जो आज फलक पर हैं और उनके यहां तक आने में पिता का भी बहुत बड़ा संघर्ष रहा है। इन लोगों से उनके करिअर में पिता के योगदान के बारे में जाना वीरेंद्र शर्मा ने:
नवभारतटाइम्स.कॉम players whose fathers played special role in their success
पापा ने दिए पंख


सारी परेशानी खुद झेली
साइना नेहवाल, बैडमिंटन प्लेयर
दुनिया की नंबर 1 बैडमिंटन प्लेयर रह चुकीं साइना नेहवाल अपनी कामयाबी का श्रेय अपने पापा को देती हैं। सायना के पैरंट्स बैडमिंटन के बेहतरीन खिलाड़ी थे। जब पापा कृषि वैज्ञानिक हरवीर नेहवाल का ट्रांसफर हिसार से हैदराबाद हो गया तो वहां सायना ने अपने स्पोर्ट्स करियर की शुरुआत जूडो से की। बाद में वह बैडमिंटन से जुड़ गईं। साइना बताती हैं, 'मुझे रोजाना सुबह 6 बजे स्टेडियम पहुंचना होता था। स्टेडियम मेरे घर से करीब 20 किमी दूर था। मम्मी रोज सुबह मुझे 4 बजे जगा देती थीं। पापा रोज मुझे स्कूटर पर बैठाकर स्टेडियम ले जाते थे। कई बार तो स्कूटर पर बैठे-बैठे मैं पापा की पीठ पर ही सिर रखकर सो जाती थी। इस तरीके से मेरी नींद पूरी होती थी।' कहीं बेटी स्कूटर से गिर न जाए, इसके लिए साइना की मम्मी भी स्कूटर पर साथ जाने लगीं। साइना बताती हैं कि पापा ने खेल के दौरान किसी भी चीज की कमी नहीं होने दी। कई बार ट्रेन और होटल का खर्च जुटाने के लिए उन्होंने अपने पीएफ से पैसे निकाले। जब मैं इंटरनैशनल टूर्नामेंट में उतरी तो खर्च काफी बढ़ गए, लेकिन पापा ने कभी मुझे परेशानियों का अहसास नहीं होने दिया। पापा जितना ख्याल मेरे खेल का रखते थे, उतना ही पढ़ाई का भी रखते थे। वह मेरे लिए बेहतरीन नोट्स जुटाते थे। पापा कभी डांटते नहीं थे, लेकिन उन्हें समय और पैसे का मिसयूज पसंद नहीं था। साइना का लंदन ओलिंपिक में मेडल जीतना पापा हरवीर के लिए सबसे ज्यादा खुशी का पल था। सायना चहकते हुए बताती हैं, 'जब लोग कहते हैं कि आप साइना के पापा हैं तो पापा बहुत खुश होते हैं।

पापा का संघर्ष ज्यादा बड़ा
दिव्या सैन, रेसलर
मेरे पापा वर्ल्ड के बेस्ट पापा हैं। उन्होंने मुझे आसमान में पहुंचाने के लिए जो संघर्ष किया है, उसे मैं बयान नहीं कर सकती, महसूस कर सकती हूं। तपती गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, पापा अपने दोनों कंधों पर भारी बैग लादे दंगल-दर-दंगल घूमते थे। पापा वहां पहलवानों के लंगोट बेचते थे और मेरे लिए दंगल करवाने की कोशिश आयोजकों से करते थे। उन दिनों दंगल में लड़कियां हिस्सा नहीं लेती थीं। मैं लड़कों से लड़ती और उन्हें हरा देती। इससे पापा एक तो यह साबित करते थे कि बेटे ही सब कुछ नहीं होते। बेटियां भी बहुत कुछ कर सकती हैं। दूसरा, इससे हमारे घर का भी खर्च चलता था। मैं जब अखाड़े में लड़कों से जीत जाती तो पुरस्कार राशि से ज्यादा पैसे तो मुझे दूसरे लोगों से इनाम में मिल जाते थे। इन पैसों से घर को बहुत सहारा मिलता था। जब मैं दंगल में लड़कों से लड़ती थी तो कुछ लोग हम पर हंसते, फब्तियां कसते तो कुछ मजाक के तौर पर मेरी कुश्ती देखते थे, लेकिन मैं और मेरे पापा डटे रहे। हमने किसी की परवाह नहीं की। मुझे गर्व है कि अपने पापा पर, जिन्होंने किसी की बात की परवाह न करते हुए मुझे कुश्ती में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और हर मुश्किल में मेरा साथ दिया। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें सबसे बड़ा योगदान मेरे पापा का है। अक्सर लोग पहले अपने बेटे को आगे बढ़ाते हैं और बेटी को पीछे रखते हैं लेकिन मेरे पापा ने इसका उलटा किया। उन्होंने मेरे भाई से ज्यादा मुझे तरजीह दी और मुझे आगे बढ़ाया। उन्हें मुझ पर विश्वास था कि मैं कुछ कर सकती हूं और मैंने भी उनके विश्वास को झूठा साबित नहीं किया। कुश्ती लड़ने के लिए बहुत खुराक चाहिए होती है। खूब सारा दूध और बादाम। ये सब तो दूर की चीज है। मुझे तो दो वक्त का खाना ही मिल जाए, वही काफी होता था। पापा मेडिकल स्टोर पर 15 रुपये में मिलने वाला ग्लूकोज लेकर आते थे। मेरे लिए वहीं प्रोटीन की खुराक थी। पहले मेरे दादाजी पापा से कहते थे कि बेटों को आगे बढ़ा, बेटी को बढ़ाने से क्या होगा? आज दादाजी मेरी तारीफ करते हुए नहीं थकते और सबसे कहते हैं कि मेरी पोती ने मेरा नाम रोशन कर दिया। मैंने पापा को सबसे बड़ा गिफ्ट तब दिया, जब पहली बार विदेश जाकर मंगोलिया में जूनियर कैडेट चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता। अब मेरे दो सपने हैं, एक ओलिंपिक में मेडल जीतना और दूसरा पापा को विदेश घुमाना।


मुझसे ज्यादा उन्हें था विश्वास
अर्जुन वाजपेयी, माउंटेनियर
17 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाले अर्जुन ने इस साल अपने चौथे प्रयास में माउंट मकालू को भी फतह कर लिया। इससे पहले की 3 कोशिशों में वह नाकाम रहे और उन्हें बीच में से ही लौटना पड़ा। लेकिन अर्जुन ने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य यानी मकालू को जीत कर ही दम लिया। अपनी इस सफलता के पीछे वह अपने पिता कैप्टन (रिटायर्ड) संजीव वाजपेयी का सबसे बड़ा योगदान मानते हैं। अर्जुन बताते हैं कि जब उन्होंने माउंटेनियरिंग शुरू करने के बारे में घर में बताया तो मम्मी मना करने लगीं, लेकिन पापा ने ही आगे बढ़कर मेरा सपोर्ट किया। स्टडी के दौरान जब अर्जुन के नंबर कम आते थे तो उनकी मम्मी चिंतित हो जाती थीं, लेकिन पापा कहते थे कि सब ठीक हो जाएगा। अर्जुन कहते हैं कि मुझ से ज्यादा पापा को यकीन था कि मैं माउंटेनियरिंग में कामयाब रहूंगा। मकालू चढ़ने में जब मैं 3 बार नाकाम हुआ तो पापा ने ही हर बार मुझे जबरदस्त मोटिवेट किया और कहा कि नाकामी में भी कामयाबी होती है। इससे तुम्हारे लिए नए रास्ते खुलेंगे और अगली बार गलतियां कम होंगी। अर्जुन बचपन की यादें ताजा करते हुए कहते हैं कि स्टडी के दौरान मैं और दूसरे खेलों में भी हिस्सा लेता था। इसके लिए मुझे सुबह जल्दी उठना पड़ता था। मुझे सुबह उठाने की जिम्मेदारी पापा की थी और उन्होंने उसे एक दिन भी मिस नहीं किया। अर्जुन फिट रहने की प्रेरणा अपने पापा से लेते हैं।


हर मुसीबत में दिया साथ
रानी रामपाल, हॉकी प्लेयर
हॉकी की स्टार प्लेयर हैं रानी रामपाल। दरअसल, भारत ने 36 साल बाद रियो ओलिंपिक के लिए क्वॉलिफाई किया है। इसके लिए रानी रामपाल ने मैदान पर बेहतरीन प्रदर्शन किया था। रानी अपनी इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ अपने पिता का मानती हैं और शायद यही वजह है कि उन्होंने पापा का नाम अपने नाम के पीछे लगा रखा है। हरियाणा के शाहाबाद मारकंडा की रानी रामपाल आज हॉकी के खेल में एक जाना पहचाना नाम हैं। इस खेल में उन्हें इतनी सफलता यूं ही नहीं मिल गई। इसके पीछे रानी और उनके पिता की अथक मेहनत है। बचपन में जब रानी ने हॉकी खेलने की बात घर में कही तो मां, पापा और भाई में से कोई राजी नहीं हुआ। पापा ने दो टूक मना कर दिया था, पर बाद में रानी के समझाने पर वह मान गए और परमिशन दे दी। रानी बताती हैं कि पापा ने तो हां कर दी लेकिन अब मोहल्ले वाले और रिश्तेदार पीछे पड़ गए। सब कहने लगे कि घर से निकल कर कल को लड़की ने कुछ बदनामी कर दी तो क्या होगा? पापा ठान चुके थे और अब उन्हें पीछे लौटना गंवारा नहीं था। उन्होंने एक दिन मुझे समझाया, 'रानी मैंने तुम्हें खेलने की परमिशन दी है क्योंकि मुझे तुम पर बहुत भरोसा है। इस विश्वास को कभी मत तोड़ना।' मैंने भी उसी दिन तय कर लिया था कि इतना चमकना है कि सबकी बोलती बंद हो जाए और मैंने कर दिखाया। मेरे दो भाई हैं और मैं घर में सबसे छोटी हूं, पर पापा मुझसे सबसे पहले मानते हैं, भाइयों से भी ज्यादा। बचपन में मैं पापा से कहती थी कि जब मैं खेलूंगी तो आपके लिए घर बनवाऊंगी तो पापा मेरी बात को मजाक में उड़ा देते थे। आज फादर्स डे पर मैं उन्हें नए घर का एक छोटा-सा तोहफा दूंगी। हालांकि उनके संघर्ष के आगे मेरा यह मामूली-सा तोहफा कुछ भी नहीं है।

पापा के साथ से मिली जीत
गीता फोगट, रेसलर
हमारे पापा अगर हमारे लिए गांववालों और रिश्तेदारों के तानों के सामने डटकर न खड़े हुए होते तो शादी करके हम भी कहीं रोटियां बना रही होतीं। लेकिन पापा ने कर्णम मल्लेश्वरी को देखकर ठान लिया था कि अपनी बेटियों को पहलवान बनाना है। उनका यह सपना साकार हो चुका है। यह कहना है कि मशहूर रेसलर गीता का। गीता लंदन ओलिंपिक में खेल चुकी हैं तो छोटी बहन बबीता और कजन विनेश रियो के लिए क्वॉलिफाई कर चुकी हैं। इसके अलावा फोगट बहनें कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। बकौल गीता, एक दौर था जब पापा को पूरे गांव का विरोध झेलना पड़ा, लेकिन आज गांव के लोग बेटियों को हमारा उदाहरण देते हैं। हमारे गांव बलाली के एंट्री गेट पर लिखा है - इंटरनैशनल महिला पहलवान गीता, बबीता, रितु के गांव बलाली में आपका स्वागत है। यह पहचान हमें अपने पापा महावीर फोगाट की मेहनत से मिली है। पापा के संघर्ष से प्रेरित होकर ही उन पर फिल्म बन रही है।' हालांकि शुरुआत में महावीर फोगट को अपने फैसले के लिए काफी मुखालफत झेलनी पड़ी। लोग कहते कि कुश्ती लड़ने के दौरान खिंचने से तुम्हारी बेटियों के कान लंबे हो जाएंगे। फिर उनसे शादी कौन करेगा? गांव के अखाड़े में फोगट बहनें प्रैक्टिस करतीं तो लोग वहां भी पहुंच जाते और बातें सुनाने लगते। इससे नाराज होकर महावीर ने बेटियों के लिए घर में ही अखाड़ा बना लिया। गीता बताती हैं कि पापा ने हम बहनों से बस एक ही बात कही कि अगर तुम सफल हो गईं तो यही लोग तुम्हारा सम्मान करेंगे और यह बात पूरी तरह सच साबित हुई।

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